बदसूरत बाजार - इज़रायल एम. किर्जनर

आधुनिक पूंजीवाद के सर्वाधिक पेचीदे विरोधाभास हैं घृणा, भय और अवमानना: जिसके साथ इसे आमतौर पर जोड़ कर देखा जाता है। समकालीन समाज की हर बुराई के लिए व्यवसाय, निजी लाभ के प्रयास और निजी स्वामित्व पर सीधे तौर पर आरोप मढ़ दिया जाता है। वे लोग जो बाजार के आलोचकों द्वारा डाले गए घृणा और अज्ञानता के आवरण को भेद डालते हैं, वे जाहिर तौर पर अपने आप से पूछेंगे कि इतना मूल्यवान सामाजिक संस्थान ऐसे सार्वभौमिक अवमानना और नापसंदगी का शिकार क्यों है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका अपने आप में एक वैज्ञानिक आकर्षण है। पर सवाल की महत्ता, वैज्ञानिक उत्सुकता कहीं आगे तक जाती है। जैसा कि माइसेज ने कहा है, ''एक सामाजिक व्यवस्था कितनी ही लाभग्राही क्यों न हो, काम नहीं कर सकती यदि उसे जनमत का समर्थन प्राप्त न हो।''

जो लोग इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि समाज के पास, उपलब्ध संसाधनों को जुटाने एवं उसके विकास के लिए विशिष्ट तौर पर सक्षम, एक बाजार व्यवस्था है जो अपने सदस्यों की राजनीतिक व आर्थिक आजादी की रक्षा करते हुए एवं उसे प्रोत्साहन देते हुए, उनकी इच्छाओं को सर्वाधिक निष्ठा के साथ दर्शाने में सक्षम है, वे बहुत पहले ही इस वक्तव्य की दुर्भाग्यपूर्ण वैधता को जान चुके हैं। समाज की सेवा करने की बाजार की सक्षमता को, इसके वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा किए जा रहे प्रहारों द्वारा और इन प्रहारों का सामना करने में जनसाधारण की अशक्तता की वजह से कमतर आंका गया है और यह सिलसिला चल रहा है। जनमत ऐसी दिशा में आकार ले रहा है जो बाजार की प्रवृत्ति के ठीक विपरीत है। ''पूंजीवादी मानसिकता'' आम लोग-जो बाजार के मुख्य लाभग्राही हैं, बुद्धिजीवी और समाज विज्ञानी-जिनके इसके मुख्य वक्ता और समर्थक होने की आशा हो, साथ ही साथ उद्यमियों व व्यापारी नेताओं-जो इसके मुख्य साधन हैं, सबकी सोच में रच-बस जाने के लिए सामने आई है। निश्चित तौर पर बाजार व्यवस्था की असाधारण ऊर्जा और क्षमता को यह एक श्रद्धांजलि है कि ऐसे गहरे अविश्वास के सामने और उसे कुचल देने को आतुर हस्तक्षेप के सामने (मोटे तौर पर इस पूंजीवाद विरोधी मानसिकता से लिया हुआ), यह व्यवस्था अब भी एक अत्यधिक जटिल वितरण को समर्थन देने तथा वस्तु व सेवाओं के एक अभूतपूर्व प्रवाह को उत्पन्न करने में लगी हुई है। ऐसा कब तक संभव है कि यह इस व्यवस्था की योग्यता और नैतिकता के प्रति व्यापक अविश्वास के सामने टिका रहे। इससे उन लोगों को अत्यधिक दुख पहुंचेगा जो इस व्यवस्था के बने रहने के लिए चिंतित हैं।

अत: इस पूंजीवाद विरोधी मानसिकता की प्रकृति और इसके स्रोत को समझना नितांत जरूरी है। अगर इस मानसिकता को परे हटाना है तो इसके मुख्य अवयवों को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना होगा और इसके स्रोतों की पहचान करनी होगी। कई विद्वानों ने इस काम का जिम्मा खुद ले लिया। दो दशक पूर्व हयेक के संपादन में विभिन्न लेखकों द्वारा अध्ययपत्रों की एक श्रृंखला प्रकाशित हुई जिसमें इतिहासकारों के पूंजीवाद विरोधी झुकाव की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था और इसे 18वीं व 19वीं शताब्दी में पूंजीवाद के आरंभिक उद्भव- जिसकी कल्पना उस समय के आभिजात वर्ग और बुद्धिजीवियों ने की थी- के प्रति वैर-भाव से जोड़ कर देखा गया। लगभग चार दशक पूर्व हट्ट ने पूंजीवाद विरोधी मानसिकता के अस्तित्व की तुलना में कहीं कुशलता के साथ इसकी वजहों का विश्लेषण किया। इसके साथ ही उन्होंने प्रतिस्पर्धात्मक बाजार प्रक्रिया के लाभग्राही संचालन के बारे में जनमत को एक दिशा देने के संदर्भ में अर्थशास्त्रियों की आश्चर्यजनक असमर्थता के कारणों पर भी प्रकाश डाला। हाल के समय में माइसेज और स्टिगलर, दोनों ने ही बाजार पद्धति के प्रति बुद्धिजीवियों - जिनके इस पद्धति के सर्वाधिक उत्साही समर्थक के तौर पर पेश आने की अपेक्षा थी - समेत अन्य लोगों में उभरती घृणा की वजहों पर रोशनी डालने का प्रयास किया है। आर्थिक विचारधारा वाले इतिहासकारों ने निजी संपत्ति आधारित एक विकेंद्रीकृत निर्णय प्रणाली की सामाजिक उपयोगिता को लेकर स्वयं अर्थशास्त्रियों की सनकी प्रवृत्ति को आड़े हाथों लिया है और निश्चित रूप से वे आगे भी ऐसा ही करते रहेंगे।

पूंजीवाद विरोधी मानसिकता से संबद्ध अधोलिखित चर्चा से उन तीन स्पष्ट स्तरों को पहचानने की कोशिश की जाएगी जिसके मुताबिक इस मानसिकता के विश्लेषण की जरूरत है : पहला, हम पूंजीवाद के आलोचकों द्वारा जोर-शोर से उठाई गई आपत्तियों पर गौर करेंगे। इन्हीं आरोपों, आलोचनाओं और सार्वजनिक भर्त्सना के जरिये पूंजीवाद विरोधी मानसिकता प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति पाती है। दूसरा, हम उस विश्लेषणात्मक आधार-वाक्य की पहचान करेंगे जो पूंजीवाद विरोधी मानसिकता को अभिव्यक्त करने वाली कथित आलोचना के बारे में सूचना देता हो (या गुमराह करता हो)। निश्चित रूप से पहले स्तर की आलोचनाओं का जवाब देने की किसी भी कोशिश से देर-सबेर इन आलोचनाओं के विश्लेषणात्मक आधार की खामियाँ-दूसरे स्तर पर- सामने आएंगी। तीसरा, हम उन गहन प्रवृत्तियों पर गौर करेंगे जिन्होंने विभिन्न प्रकार की पूंजीवाद विरोधी मानसिकता को प्रेरित किया है। पूंजीवाद की जो कुछ भी विशिष्ट सार्वजनिक भर्त्सना हो, और ऐसी भर्त्सना में आर्थिक विश्लेषण की जो कुछ भी गलती निकाली गई हो, पूंजीवाद विरोधी मानसिकता की व्यापक समझ से ही अंतत: गहरे पैठे उन पूर्वाग्रहों तथा कट्टर विचारों का पता चलेगा जो बाजार व्यवस्था के प्रति दिखाई गई उदासीनता के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही तौर पर जिम्मेदार हैं। अब हम उन तीन स्तरों को एक-एक कर उठाएंगे जिनकी ऊपर पहचान की गई है।

घोषित आलोचनाएं

बाजार प्रणाली की आलोचनाओं की सूची जानी-पहचानी और खासी लंबी है। इसके दायरे में वे आलोचनाएं भी शामिल हैं जो बाजार प्रणाली को नैतिक आधार पर निशाना बनाती हैं, और वे भी, जो संकीर्ण आर्थिक आधार पर की जाती हैं। हम इस सूची को महज बांचने के अलावा और कुछ करने की कोशिश नहीं करेंगे। यहाँ हमारा मुख्य उद्देश्य इन आलोचनाओं को निशाना बनाना नहीं बल्कि यह दर्शाना है कि पूंजीवाद विरोधी मानसिकता की अभिव्यक्ति का दायरा कैसा है और इससे भी महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इन घोषित आलोचनाओं और इन पूंजीवाद विरोधियों की सैद्धांतिक अवधारणाओं व अनकही प्रवृत्तियों में कितना अंतर है।

ऐसा माना जाता है कि आधुनिक समाज के भौतिकवादी पहलुओं  के लिए बाजार पद्धति ही जिम्मेदार है और वही इसे बढ़ावा भी दे रही है। इस पर आरोप लगता है कि यह स्वार्थ और लोभ  को प्रोत्साहन दे रही है। इस पर धोखाधड़ी युक्त आचरण को प्रोत्साहन देने का आरोप लगता है। इसकी भर्त्सना की जाती है कि यह लोगों की रुचि को विज्ञापन और बहकावे से खराब कर उन्हें ऐसे उत्पादों और सेवाओं की माँग करने के लिए भड़काता है, जो दरअसल नुकसानदायक या निम्नस्तरीय हैं। इसे पर्यावरण की बर्बादी का कारण माना जाता है। इसकी आलोचना की जाती है कि यह समाज के अंदर गहरे विरोध, खिन्नता और निराशा, साथ-ही-साथ असुरक्षा व दुश्चिताओं को जन्म देता है जिससे कामगारों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। पूंजीवादी देशों में आय की जो असमानता है, उसकी आलोचना करते हुए यह कहा जाता है कि वह एक बुराई है और समाज के लिए हानिकारक परिणाम उत्पन्न करती है। इस असमानता की भर्त्सना की जाती है क्योंकि यह बाजार व्यवस्था में निहित बुनियादी अन्याय का उदाहरण पेश कर रही है; इसे आर्थिक दमन और शोषण का द्योतक माना जाता है। बाजार पद्धति को ऐसा बनाया गया है कि यह जातिभेद, लिंगभेद और राजशाही की जिम्मेदारी वहन करे। अपने विशुद्ध रूप से आर्थिक कार्यों के संदर्भ में इसे असफल श्रेणी में डाल दिया गया है। यह एक ऐसी पद्धति के रूप में देखा जाता है जो उपभोक्ता के उपयोग के बजाय व्यवसायी के लाभ के लिए हानिकारक और खतरनाक उत्पादों का उत्पादन करता है। इसे जरूरत से ज्यादा उत्पादन, बेरोजगारी और वित्तीय संकट के उथल-पुथल भरे प्रकोप को जन्म देने वाला माना जाता है। इसे राजनीतिक लोकतंत्र के संचालन को अस्थिर करने वाला बताया जाता है। आर्थिक शक्तियों के खतरनाक केंद्रों को घनीभूत करने और सरकारी भ्रष्टाचार के लिए इस पर आरोप लगाए जाते हैं।

कोई शक नहीं कि यह सूची अधूरी है। फिर भी यह पूंजीवाद विरोधी रूढ़ोक्ति के विस्तार को प्रस्तुत करती है जिससे हम सभी वाकिफ हैं। देर-सवेर पूंजीवाद विरोधी मानसिकता इन आरोपों, आलोचनाओं व भर्त्सना के जरिये अभिव्यक्त होगी। इन आलोचनाओं के सैद्धांतिक आधार की समीक्षा करने से पहले यह जरूरी है कि इस पर एक नजर डाली जाए। ऐसा है कि जहाँ ज्यादातर मामलों में यह दोषारोपण सिर्फ खास सैद्धांतिक दृष्टिकोणों के संदर्भ में ही रखे जा सकते हैं (ताकि इन दृष्टिकोणों में भ्रांतियों का प्रकटीकरण इन आपत्तियों को हानि रहित कर दे), वहीं खुद ये आपत्तियाँ आम तौर पर बिना किसी प्रत्यक्ष सैद्धांतिक ढाँचे के लाभ के बिना उठाई जाती हैं। पूंजीवाद वास्तविकता के एक अवांछित पहलू के तौर पर देखा गया है, चाहे बात व्याप्त धोखाधड़ी, लोभ, जातिभेद, या फिर बेरोजगारी की हो। यह पहलू, पुन:, अदोषदर्शी तौर पर खुद पूंजीवाद की ही एक विशेषता है।

इस शोध के अनुसार पेशेवर अर्थशास्त्री का पारंपरिक प्रशिक्षण आर्थिक मामलों पर मुक्त उद्यमी दृष्टिकोण के प्रति चीजों की प्रकृति, पूंजीवादी वास्तविकता के अवांछनीय अवयवों या फिर उस संदर्भ में किसी भी अन्य वास्तविकता में जो परिस्थिति मौजूद है, वह नए वेश में पूंजीवाद के पुराने दोषारोपणों के लगातार पुन: प्रकट होने का कारक है, उनके पूर्व खंडन के बावजूद।

पूंजीवाद विरोधी सिद्धांत-दि स्टिगलर-ज्विग शोध

अब हम उन सैद्धांतिक आधारों की जांच करते हैं जो बाजार पद्धति के प्रत्यक्ष दोषारोपणों का पोषण करते हैं, जैसा कि ऊपर वर्णित है। यहाँ पर हम खुद को उन (अक्सर जो सिर्फ अंतर्निहित रहते हैं) पूंजीवाद विरोधी दृष्टिकोणों तक ही सीमित रखेंगे जो आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल के सामने बेहद असुरक्षित लगते हैं। मैं दोबारा कहना चाहूँगा कि मोटे तौर पर हमारा प्रयोजन ऊपर जिक्र की हुई आपत्तियों से निपटना नहीं है। न ही आवश्यक रूप से हम यह मानते हैं कि ये आपत्तियाँ बेवजह थीं, पर पूंजीवाद विरोधी मानसिकता द्वारा अभिव्यक्त की गई विश्लेषणात्मक ''अंत:दृष्टि'' की जाँच करते वक्त हम इसके बस उन पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित करना उपयुक्त समझते हैं जिन्हें, हमारा मानना है, निष्पक्ष विचार गलत ठहराते हैं। दरअसल, पूंजीवाद विरोध के सैद्धांतिक अवलंब को व्यक्त करने के पीछे हमारा प्रयोजन उस बात की व्याख्या करना है जिसे स्टिगलर-ज्विग शोध माना जा सकता है। यह शोध कहता है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्री का पारंपरिक प्रशिक्षण उसमें आर्थिक मामलों पर मुक्त उद्यमी दृष्टिकोण के प्रति पहले से ही एक झुकाव भर देता है। वैचारिक परिदृश्य के अंतर्गत इस शोध को एक तिहाई से भी अधिक का समर्थन प्राप्त है। 12 साल पहले स्टिगलर ने एक जाने-माने समाचार पत्र में इस शोध को प्रस्तुत किया था: ''अर्थशास्त्र का व्यावसायिक अध्ययन किसी व्यक्ति को राजनीतिक दृष्टि से संकीर्ण बनाता है'' (यहां पर ''संकीर्ण'' शब्द से तात्पर्य है वह व्यक्ति ''जो चाहता है कि ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां निजी प्रतिष्ठानों द्वारा पूरी की जाएं, और जो यह मानता है कि प्रतिस्पर्धा की शक्तियों द्वारा निजी ताकत की बुराइयों को आम तौर पर नियंत्रित कर लिया जाएगा और प्रगति व कुशलता को आम तौर पर प्रोत्साहन मिलेगा'')। अभी हाल में नव वामपंथियों की तरफ से माइकल ज्विग ने ऐसे ही दृष्टिकोण को अभिव्यक्त किया है जिसे रूढ़िवादी अर्थशास्त्र के समाजवादी आलोचक काफी समय से कहते रहे हैं: वह सीमांतवादी विश्लेषण (जिसके साथ रूढ़िवाद अर्थशास्त्र को पूरी तरह जोड़कर देखा जाता है) न सिर्फ ''अप्रासंगिक'' है बल्कि यह ''घातक'' हो सकता है क्योंकि ''सीमांतवाद बुनियादी रूप से क्रांतिकारी है''। एक लेख, जिसमें लेकैचमेंट समेत कितने ही नव वामपंथियों और पुराने वामपंथियों की ओर से अच्छी-खासी अध्ययन सामग्री प्रस्तुत की गई, में लेकैचमेंट ने कहा है कि सीमांतवादी एक ''अत्यधिक रूढ़िवादी मान्यता'' है।

पूंजीवाद विरोधी मानसिकता के सैद्धांतिक बुनियादी कार्य का सर्वेक्षण इस शोध की पुष्टि करेगा। हम यह पाएंगे कि अर्थशास्त्रीय विश्लेषण में जो कुछ भी अंतर्निहित है, उसके साथ यह सैद्धांतिक दृष्टि असंगत है (कम-से-कम भी कहें तो)। ताकि पूंजीवाद विरोधी मानसिकता कि इस  स्तर की चर्चा में इसे अर्थशास्त्र वंचन  के रूप में जाना जाए, जैसा कि माइसेज ने बार-बार कहा है।

यह देखा गया है कि स्टिगलर ज्विग शोध, या इसकी कोई भी शाखा न सिर्फ विशुद्ध रूप से आर्थिक प्रकृति वाले इन पूंजीवाद विरोधी आपत्तियों के सैद्धांतिक आधारों के लिए प्रासंगिक है बल्कि उनके लिए भी मायने रखती है जो बाजार व्यवस्था की नैतिकता से सरोकार रखने वाले दोषारोपणों का आधार है। अर्थशास्त्रीय विश्लेषण द्वारा पैदा की गई सोच पद्धति किसी व्यक्ति को इस योग्य बनाती है कि वह उन आचारगत निर्णयों को लेने से परहेज करे जो परस्पर असंगत हैं या दूसरे शब्दों में तार्किक रूप से अनुचित नींव पर खड़े हैं।

यदि उपरोक्त कही बातों में पूंजीवाद पर किए गए दोषारोपणों की एक सुस्पष्ट सूची व्यक्त की गई है तो आने वाले पन्नों में उन भ्रांतियों का ब्योरा मौजूद होगा जिसकी कलई खोलने के लिए आरंभिक अर्थशास्त्रीय सिद्धांत के शिक्षक बार-बार बाध्य होंगे।
   
(क) एक व्यक्ति का नुकसान दूसरे का लाभ होता है: अर्थशास्त्र की निश्छलता अक्सर सबसे स्पष्ट तरीके से तब अभिव्यक्त हुई है जब वह इस बात को मानने से इनकार करता है कि मुक्त विनिमय किसी भी सौदे के समय अनिवार्यत: दोनों पक्षों के लिए लाभग्राही पाया गया हो (कम से कम संभावनाओं के हिसाब से)। बाजार में लाभ किसी और की कीमत पर होना चाहिए, इस विचार को प्रश्रय देने की भूल के कारण ही बाजार पर अत्यधिक दोषारोपण किए जाते हैं। इसमें खरीदारों द्वारा विक्रेताओं पर शोषण का आरोप (जैसे कि श्रम का मामला), और विक्रेताओं द्वारा खरीदारों पर शोषण का आरोप (जैसे कि मकान मालिक-किरायेदार संबंधों में)। यह गलती पूंजीवाद के आलोचकों की उस चिर स्थायी इच्छा की जिम्मेदार है जिसके तहत वे विनिमय को निषेधित करना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार इसमें कोई एक पक्ष असाधारण लाभ पा रहा होता है। इसके अलावा यह गलती आम तौर पर लाभ, चूंकि अब तक यह लाभ अभिप्रेरण का एक सामाजिक प्रकटीकरण रहा है, इस लिहाज से पूरी बाजार व्यवस्था की भर्त्सना का आधार बनती है।

(ख) मोटापे का दोष वेटर पर मढ़ना: बाजार में जिस सीमा तक उपभोक्ता स्वायत्तता संबद्ध धारणा खुद को प्रकट करती है, उसे समझने में विफल होना उस सोच के लिए जिम्मेदार है जिसे स्टिगलर के शब्दों में मोटापे का दोष वेटर पर मढ़ना कहते हैं। इस भ्रांति के निहायत सीधे-साधे स्वरूपों में बाजार पद्धति उस कुशलता और प्रचुरता के लिए दोषी ठहराई जाती है जिसके साथ यह उपभोक्ता की रुचियों की देखभाल करती है जिसका साझा आलोचक नहीं करता। पूंजीवाद को ''भौतिकवाद'' के लिए दोषी ठहराया जाना बहुत हद तक इस भटकाव का द्योतक है। (यह ध्यान देने वाली बात है कि न सिर्फ बाजार को अपने भौतिकवाद के लिए दोषी ठहराया गया है बल्कि इसके  समर्थक  अर्थशास्त्रियों की भी निंदा की गई है कि ऐसे निम्नस्तरीय विषय के प्रति उनकी दिलचस्पी उनके मानव-अस्तित्व के भौतिक पक्ष का प्रतीक है।) निम्न कोटि और हानिकारक उत्पादों के उत्पादन के लिए कारोबार को दोषी ठहराया जाना कुछ हद तक उस सफलता को दर्शाता है जहाँ पर कोई यह नहीं समझ्र पाता कि उपभोक्ता उच्चस्तरीय गुणवत्ता और सुरक्षा का लाभ उठाने के लिए आवश्यकता के अनुसार त्याग करने का इच्छुक नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि वातावरण पर पूंजीवाद द्वारा डाले गए प्रभाव के लिए की जा रही उसकी मौजूदा भर्त्सना, कुछ हद तक, अनिवार्यत: एक ऐसे रूप में देखी जानी चाहिए जो वातावरण की गुणवत्ता के लिए तय किए गए मानक को दर्शाती है जो आमतौर पर उपभोक्ता द्वारा निर्धारित मानक से उच्चस्तरीय है।

एक खास सीमा तक, पूंजीवाद के खिलाफ लिंगभेद और जातिभेद के आरोप वैसी ही दृष्टि का परिचायक है जिसकी तर्ज पर बाजार प्रक्रिया में कारण और परिणाम जुड़े हैं। कुछ हद तक एक कम नासमझ बातचीत के स्तरों पर, ''मोटापे का दोष वेटर पर मढना'' भ्रांति आमतौर पर विज्ञापन और बिक्री प्रयास पर एक आक्रमण के रूप में पुन: प्रकट हुई है। सिर्फ वेटर ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता बल्कि रेस्तरां के बाहर नियॉन संकेत, या वहां से निकल रही भोजन की मोहक खुशबू, ये सब खलनायक सरीखे हैं। इसकी वजह शायद यह है कि चूंकि प्रारंभिक अर्थशास्त्र, दरअसल, आमतौर पर बाजार की आवश्यकता पूरी करने के प्रयास की उद्यमी प्रक्रिया में बिक्री प्रयत्न की भूमिका को स्पष्ट करने में असफल रहा है, इसलिए मोटापे संबद्ध भ्रांति का यह खास स्वरूप उन अर्थशास्त्रियों द्वारा, जिन्हें बेहतर जानकारी हासिल करनी चाहिए थी, इतने विजयभाव के साथ सामने रखा गया है।

(ग) झुंझलाहट, मूल्यों पर (अभाव को नकारना): आश्चर्यजनक रूप से, पूंजीवाद-विरोध संबद्ध आलोचनाएं उन मूल्यों के प्रति अधैर्य को दर्शाने का ऐसा जरिया मात्र साबित हुई हैं जो अनिवार्यत: इच्छित लक्ष्यों को प्राप्त करने से जुड़ा है। बाजार की असफलता के प्रमाण के रूप में आर्थिक परिदृश्य के अवांछनीय अवयवों को बार-बार उद्धृत किया गया है। (प्रासंगिक रूप से, वही भ्रांतियां, अवश्य ही, समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं की पूंजीवाद समर्थक आलोचनाओं के सिलसिले में भी अक्सर रखी गई हैं। यहां पर आलोचक का उपभोक्ताओं के सिद्धान्तों से असहमत होना या उसे नजरअंदाज कर देना तो नहीं पर उसका साधारणत: इस बात को मानने से किया गया इनकार, कि अपेक्षाकृत ऊंचे समादृत लक्ष्यों को हासिल करने की दक्षता शायद दूसरे संदर्भों में महत्वपूर्ण लक्ष्यों के सुविचारित परित्याग को शायद अनिवार्य बना सकती है, अपेक्षाकृत कम अत्यावश्यक मूल्यांकित किया गया है। प्रारंभिक अर्थशास्त्र हमें सिखाता है कि कार्य की लंबी अवधि, कार्य करने की खराब स्थितियां, पर्यावरणीय सौंदर्य का अभाव उस आर्थिक व्यवस्था (चाहे पूंजीवादी हो या समाजवादी) की अपने लक्ष्यों को हासिल करने की असफलता का नहीं बल्कि उस दक्षता की विफलता का परिचायक है जिसके साथ यह संसाधनों को कम अहम लक्ष्यों से दूर कर उनकी ओर ले जाता है, जो ज्यादा अहम माने जाते हैं। आलोचकों ने कामगार-स्वामित्व परिवर्तन के तौर पर जिसकी निंदा की है या बाजार के सहभागियों द्वारा महसूस की गई असुरक्षा और व्यग्रता के कुछ निश्चित तौर पर भिन्न रूप में ऑंके जाते यदि उन्हें श्रम विभाजन के अपरिहार्य कीमतों के तौर पर देखा जाता या एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था के रूप में माना जाता जिसमें प्रतिस्पर्धियों के प्रवेश की स्वतंत्रता एक मुख्य अभिप्रेरण-बल होती। थोड़े और गूढ़ स्तर पर आधुनिक विज्ञापन की व्याप्ति और उसके  भड़कीलेपन, जिसकी अक्सर निंदा की गई है, जब एक ऐसी सामाजिक कीमत के तौर पर देखी जाती है जिसे उत्पादों की भीड़ ने ही जरूरी बना दिया हो जिससे सफल पूंजीवाद में जी रहे उपभोक्ता आवश्यक रूप से चुन पाएं, तब यह दूसरी ही पहलू अख्तियार कर लेती है। पूंजीवाद की यह प्रचुरता, ऐसा सिद्ध होता है, एक नए वेश को दर्शाती है जिसमें अभाव खुद को प्रकट करता है, उपलब्ध धन का कितना उपभोग करना है, से संबद्घ सूचना की कमी। यह सिद्ध हुआ है कि पूंजीवाद विरोधी आलोचक प्रारंभिक अर्थशास्त्र की इस अंत:दृष्टियों को समझ पाने में असमर्थ हैं।

(घ) अराजकता का भय: जैसा कि हयेक ने बार-बार कहा है कि हमारे समय की एक रूढ़ोक्ति हर चीज में कोई-न-कोई त्रुटि देखती है कि ''जान-बूझकर समग्र रूप से इसे निर्दिष्ट नहीं किया गया'', कि यह ''इसके अविवेक और इसे जान-बूझकर तैयार की गई प्रणाली द्वारा पूर्णत: प्रतिस्थापित करने की जरूरत का प्रमाण है''। खास कर यह भ्रांति उस ''अयोग्यता'' से संबद्ध है- जो सामाजिक घटना के एक संयोजित सिद्धांत के अभाव के कारण जन्म लेती है- जिसके जरिये यह समझा जा सके कि अनेक लोगों की स्वतंत्र क्रिया कैसे संगत समग्रताओं और संबंधों की हठी संरचनाओं का निर्माण कर सकती है जो परिणाम हासिल करने के लिए तो नहीं रची गईं, फिर भी महत्वपूर्ण मानवीय प्रयोजनों की पूर्ति करती है। इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि ''सामाजिक घटना के संयोजित सिद्धांत का अभाव'' वह विचार है जो पूंजीवाद विरोधी आलोचना के विशाल आकार में अंतर्निहित है। यह स्पष्ट है कि पूंजीवाद विरोधी मानसिकता बहुत हद तक अर्थशास्त्रीय सिद्धांत द्वारा प्रकट की गई बाजार व्यवस्था की अंतर्दृष्टि की अज्ञानता के साथ-साथ जी रही होती है या इसे मानने से इनकार करती है। जब एक बार इसे सत्य मान लिया जाता है कि सिरे से ही अनियोजित समाज एक अविछिन्न अव्यवस्था जरूर उत्पन्न करेगा, तो उन लक्ष्यों को साधना, पर्याप्त रूप से आसान हो जाता है जो उस अव्यवस्था के उदाहरण के सदृश खड़े हो सकते हैं। ऐसा है कि पूंजीवाद के आलोचक बाजार शक्तियों के निश्चयात्मकता को मानते तो हैं, फिर भी वे उसे एक लिहाज से अव्यवस्थापूर्ण ही समझते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ये शक्तियां सामाजिक रूप से अवांछनीय दिशाओं की ओर ले जाती हैं।

(च) लोभ के नतीजों का भय: उपरोक्त जिक्र किए गए विश्लेषणात्मक पूर्वाग्रह से बिल्कुल साथ-साथ जुड़ी बात वह है जिसकी प्रवृत्ति होती है अवांछनीय परिणामों के लिए बाजार को जिम्मेदार ठहराना। इसकी आसान-सी वजह यह है कि बाजार लोभी और स्वार्थी व्यक्तियों को अपने आवेगों के अनुसार काम करने का अनुमति दे देता है। चूंकि व्यापार को स्वतंत्रता देने का अर्थ है: लोभ और स्वार्थ के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता। अत: ऐसा माना जाता है कि अहस्तक्षेप-नीति के परिणाम आवश्यक रूप से द्वेषपूर्ण, पाशविक और जंगल जैसे होंगे। इस संदर्भ में समग्र रूप से जिसे नकारा जा रहा है, वह है बाजार प्रक्रिया की वह योग्यता जिसके बूते अपने भागीदारों के लोभ पर वह लगाम कसे रहती है ताकि अन्य भागीदारों की इच्छाएं पूरी हो। बाजार द्वारा व्यक्तिगत क्रियाओं पर डाले गए नियंत्रणों को समझने से इनकार करना पूंजीवाद विरोधियों को अर्थशास्त्रीय परिदृश्य के उन पहलुओं को स्पष्ट करने की अनुमति देता है, जिनकी लोभ और स्वार्थ पर आधारित एक सामाजिक पद्धति के एकमात्र संभावित अमंगलकारी परिणामों के रूप में वे निंदा करते हैं।

(छ) हस्तक्षेप के लिए बाजार पर आरोप लगाना: जैसा कि सर्वविदित है बाजार व्यवस्था समकालीन आर्थिक समाज के उन अवयवों के लिए बार-बार आलोचना का शिकार होती है जो दरअसल बाजार में राज्य के हस्तक्षेप के साथ जोड़कर देखी जाती है। बेशक, कुछ हद तक यह समकालीन पूंजीवाद है जिस पर आक्रमण होता है। इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। फिर भी बार-बार यह सिद्ध हुआ है कि पूंजीवाद संबद्ध ऐसी आलोचनाएं दरअसल बाजार प्रक्रिया पर केंद्रीय हस्तक्षेप के विरुद्ध नहीं बल्कि खुद बाजार व्यवस्था पर आक्रमण करने के लिए तैनात की गई हैं। आधुनिक पूंजीवाद के जटिल त्रिकोण के तहत इसके बाजार तत्वों को गैर-बाजार अधिमिश्रणों के तत्वों से अलग न पहचान पाने की एक सामान्य विश्लेषणात्मक असफलता हमारे सामने खड़ी है। यह विश्लेषणात्मक असफलता खुद को पूंजीवाद के प्रति आरोपित कई आपत्तियों में प्रकट करती है जो प्रवेश पर सरकार द्वारा लगाए गए अवरोधों (या अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लगाया गया अंकुश) की वजह से प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति से संबद्ध है, या उस कुसमायोजन से संबद्ध है जो सरकार द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रकार के मूल्य नियंत्रणों से उत्पन्न होते हैं या फिर उस चक्रीय कुसमायोजन से (इसमें बड़े पैमाने की बेरोजगारी भी शामिल है) जो सरकार के वृहत वित्तीय विस्तार से उत्पन्न होती है। इन सारी आलोचनाओं में जो मुद्दा उभरकर आता है, वह है आलोचकों द्वारा (शायद समग्र रूप से) कायम रखा गया सिद्धांत कि जिन अवांछनीय अवयवों को अनावृत किया जा रहा है उन्हें बाजार के विचलन से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि खुद बाजार प्रक्रिया की बाधारहित कार्यप्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए।

(ज) "निर्वाण भ्रांति": विश्लेषणात्मक भ्रांति की हमारी सूची (नि:संदेह अपूर्ण) की आखिरी कड़ी के तौर पर प्रोफेसर डेमसेज द्वारा पुकारे गए ''निर्वाण रुख'' को प्रस्तुत करती हैं (दरअसल हम इसे डेमसेज द्वारा दी गई पहचान से वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करेंगे।) डेमसेज कहते हैं ''जो निर्वाण दृष्टिकोण को अपनाता है वह आदर्श और वास्तविक के बीच की विसंगतियों को खोजने का प्रयास करता है। यदि विसंगतियां मिल जाती हैं, तब वह यह निष्कर्ष निकालता है कि वास्तविक अकुशल है।'' इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद के कई आलोचक इसकी दक्षता या नैतिकता को किसी आदर्श मानक के साथ तुलना के आधार पर परख रहे हैं जो वास्तविक समस्याओं के लिए बहुत कम प्रासंगिक हो सकता है। ऐसा करते वक्त वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर जाते हैं कि किसी अपूर्ण दुनिया की पृष्ठभूमि में ही उस अपूर्ण दुनिया को विकसित करने का कार्य आरंभ किया जा सकता है। यह सामान्यत: असंभव ही है कि पूरी पद्धतियों को उनकी संपूर्णता में फिर से गढ़ा जाए; यदि कहीं ऐसा संभव है भी तो इसे पूरा करने में आने वाला खर्च शायद अपूर्णता को ही अपेक्षाकृत ज्यादा मोहक और दक्ष ठहराए। कई पूंजीवाद विरोधी की निर्वाण प्रवृत्ति खुद को विभिन्न तरीकों से व्यक्त करती है। इस तरह बाजार बार-बार आय के वितरण के लिए दोषी ठहराया जाता है जिसे वह ऊपर ही बढ़ाता जाता है, बिना उस परिस्थिति पर ध्यान दिए कि बाजार संसाधन-स्वामित्व के कुछ आरंभिक वितरण को पहले से ही मान बैठा होता है (खासकर खुद मनुष्यों में विद्यमान संसाधनों के संदर्भ में) या जहाँ से सीमांत विश्लेषण पर सांस्थानिक संरचना, जिसके अंतर्गत सीमांत समायोजन को बनाने की अपेक्षा की गई हो, को बिना किसी चुनौती के स्वीकार लेने का अभ्यारोप लगाया गया है (इसमें मौजूदा संपत्ति अधिकार व्यवस्था शामिल है), वहाँ सामाजिक व्यवस्था के पुनर्निर्माण की लागत (लेनदेन और नीति निर्धारण) को लेकर कोई जागरूकता नहीं है। या, पुन:, जैसा कि डेमसेज ने दर्शाया है, जिन आलोचकों ने अकुशलता को दर्शाना वाले बाह्याचारों या अन्य परिस्थतियों की ओर इशारा किया है, उन्होंने अपनी गणनाओं में संसाधनों की उस लागत को बार-बार नजरअंदाज किया है जो इन अकुशलताओं को ठीक करने के लिए आवश्यक होंगी।

पूँजीवाद विरोधी मानसिकता के स्रोत

बाजार की पूंजीवाद विरोध पर किया गया हमारा सर्वेक्षण और विश्लेषणात्मक भ्रमों - जिन्होंने इन आलोचनाओं को बारम्बार समर्थन दिया है - की हमने पहचान की है। इस मानसिकता को बढ़ावा देने वाली उन अंतर्निहित मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों और पूर्वाग्रहों की समीक्षा करने के कार्य को विशेष तौर पर दिलचस्प बनाते हैं। पूंजीवाद विरोधी इन बेहिसाब आलोचनाओं के सैद्धांतिक अवलंबों में भरे इन भ्रमों की पहचान इस बात को स्पष्ट करती है कि ऐसी आलोचना गंभीरता से थामे गए आदर्शों व पूर्वाग्रहों से ही पोषित हो सकती है। कई अतिरिक्त स्रोतों के साथ मिलकर उपरोक्त उद्धृत बातें  प्रवृत्तियों की इस अधोलिखित सूची को प्रदर्शित कर रही हैं जहां से पूंजीवाद विरोध के आसानी से उठ खड़े होने की अपेक्षा हो।

  1. माइसेज ने अप्रसन्नता के बारे में विस्तार से कहा है कि वे कुंठित महत्वाकांक्षा से जन्म ले सकती हैं, उन्होंने बुद्धिजीवियों की ईर्ष्या के बारे में लिखा है; अच्छी किस्मत वाले वेतनभोगी कामगारों की बात कही है जिसका आनंद सफल उद्यमी उठाते हैं।
  2. महत्वपूर्ण संदर्भों में उन विस्तृत दृष्टिकोणों की भी परख होनी चाहिए जिसके अनुसार आर्थिक असामनाताएं कुछ हद तक अनैतिक हैं और अपने में गंभीर रूप से अवांछनीय हैं। यहां पर धनी वर्ग में अक्सर पाई गई परार्थकृत ईर्ष्या और गरीबों के प्रति सहानुभूति को इन असमानताओं के स्रोतों के ''अमंगलकारी'' व्याख्याओं के प्रति पूंजीवादी असामनताओं के पूर्ववृत्तिक प्रेक्षक के रूप में परखा जाना चाहिए।
  3. लोभ और आत्मकेंद्रित गतिविधियों के लिए गहरे पैठी भर्त्सना पूंजीवाद के बारे में बदतर सोच लेने को तैयार हो जाने के लिए स्पष्ट रूप से जिम्मेदार है।
  4. आम लोगों की निम्न रुचियों के लिए भी लगभग ऐसी ही गहरे पैठी भर्त्सना मौजूद है और वे व्यापारी, जो इन निम्न रुचियों का पोषण करते हैं, वे बाजार को गंवारू और मूर्खतापूर्ण मानने के लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल, आम लोगों की रुचियों के गंवारपन के लिए उन व्यापारियों पर आरोप लगाना, जिनके द्वारा यह परोसा जा रहा है, बड़ा ही आसान बन जाता है।
  5. आम लोगों की रुचियों को तिरस्कारपूर्ण नजर से देखने के साथ ही जुड़ा है- मनुष्य का आडंबर की अपेक्षा प्राकृतिक के लिए प्रेम, शहरी संकुलता और जटिलता की अपेक्षा ज्यादा खुली जगह के लिए उसकी ओर से दिया गया प्रश्रय। चूंकि औद्योगिक पूंजीवाद की शानदार सफलता के साथ जुड़ा है सरल और प्राकृतिक जीवन- जिसकी हममें से कई कामना करता है- का ह्रास, इसलिए पूँजीवाद खुद-ब-खुद एक खलनायक बन गया है।
  6. पुन: मनुष्य की दक्ष होने के लिए बाध्य किए जाने से जुड़ी गहरे पैठी अनिच्छा के साथ सरलता की आकांक्षा खड़ी है। आधुनिक पूंजीवाद से घृणा और भय होता है क्योंकि यह सामाजिक रूप से जरूरी प्रयोजनों की पूर्ति के लिए उपलब्ध संसाधन सफलतापूर्वक जुटाता है।
  7. आर्थिक शक्ति का भय  जो व्यापक रूप से मौजूद है, पूंजीवाद विरोध के लिए जिम्मेदार प्रवृत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। एक तरफ प्रोफेसर पेत्रो ने हाल ही में जिसे ''आर्थिक शक्ति लक्षण'' करार दिया है, वही अक्सर एक बहिर्गत सैद्धांतिक अवस्था के साथ जुड़ी दिखाई देती है जो उपभोक्ता स्वत्तता की भूमिका को नकारता है। यह स्पष्ट दिखता है कि बहुत सारे उदाहरणों में यह लक्षण दरअसल इसका समर्थन करने वाली जरूरी सैद्धांतिक अवस्थाओं का पूर्वगामी है। कुशल और बड़े पैमाने की उत्पादक ईकाइयों की व्यवस्था करने में पूंजीवाद की वह सफलता ही दरअसल उन आशंकाओं के लिए जिम्मेदार है, जिसकी वजह से इसके वजूद पर करारा प्रहार होता रहा है।
  8. प्रोफेसर हट्ट ने कहा है कि अर्थशास्त्र के विरोधी अक्सर रूढ़िगत चिंतन, उनके अनुसार, या बौद्धिक जड़ता के शिकार हैं। निश्चित तौर पर रूढ़िगत चिंतन एक से अधिक दिशा में काम कर सकता है। पर आर्थिक भ्रांतियों की उपरोक्त सूची, जिस पर पूंजीवाद विरोधियों की सहमति थी, यह बतलाती है कि बौद्धिक जड़ता ने, सही, में शायद पूंजीवाद विरोधी मानसिकता के मामले में, कोई कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई होगी।
  9. आखिर में हम गौर करते हैं कि बहुत सारी प्रारंभिक भ्रांतियों के बने रहने के पीछे ''हितवश दृष्टिकोण का भ्रष्ट किया जाना'' की भूमिका है। प्रोफेसर हट्ट ने इस संदर्भ में ''शक्ति चिंतन'' की भूमिका की एक पूर्ण समीक्षा प्रसतुत की है। यहां पर पुन: दृष्टिकोण हितवश बेशक एक से ज्यादा दिशाओं में भ्रष्ट किए जा सकते हैं। पर जब कोई व्यापारियों के बारे में सोचता है, जो घरेलू व विदेशी प्रतिस्पर्धा के खिलाफ सरकारी सुरक्षा के जरिये लाभ पाने के लिए खड़ा हो और उन कई लोगों के बारे में जो, सही या गलत तरीके से, ऐसा मानते हैं कि चीजों की एक भिन्न व्यवस्था उनके लाभ को चार-चांद लगा देगी, तब इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि यह पूंजीवाद विरोध का एक अहम स्रोत गिना जाएगा।

पूंजीवाद विरोधी मानसिकता के साथ द्वंद्व

पारंपरिक रूप से पूंजीवाद के क्षमा याचकों ने बाजार के निंदकों द्वारा पेश किए गए आरोपों और विशिष्ट तौर पर की गईं आपत्तियों का सामना किया है। ऐसा करने के दौरान बेशक उन्होंने उन तर्कसंगत भ्रांतियों को ढूंढ़ निकालना आवश्यक समझा जो इन आपत्तियों का समर्थन करते हैं। इसी के साथ ज्यादा गहरे पैठे पूर्वाग्रहों के प्रति जागरूकता, जो पूंजीवाद विरोधी मानसिकता की सतत जीवंतता के लिए जिम्मेदार दिखती है, बाजार के वैचारिक बचाव के लिए खड़ी इस रणनीति की प्रभावकारिता पर संदेह करती है। इस पत्र में स्पष्ट किए गए पूंजीवाद मानसिकता के त्रिस्तरीय चरित्र की मान्यता, उसकी पहचान करने में मददगार साबित होगी, जिसका सामना अनिवार्य रूप से होना है। व्यक्त आपत्तियों के स्तर पर मानसिकता के संभावित प्रकटीकरण के वृहत प्रकार हैं। किसी खास आपत्ति का किसी एक रूप में खंडन, उसे किसी अन्य स्वरूप में पुन: प्रकट होने से नहीं रोक पाता है। स्पष्ट रूप से इसी कारण बाजार की भर्त्सना और संभावित आपत्तियों के संपूर्ण समूह के लिए जिम्मेदार विश्लेषणात्मक भ्रांतियों का खंडन करने में सिद्धांत अहम भूमिका निभाता है। दूसरी तरफ सैद्धांतिक विचार-विमर्श की सामान्यता की वजह से पूंजीवाद के आलोचक यह नहीं देख पाते कि सिद्धांत किस तरह से बाजार के विशेष अवयवों से संबद्ध है जो आलोचना को निमंत्रण देता प्रतीत होता है। इस सिद्धांत का उचित प्रयोग निश्चित तौर पर सिद्धांत बनाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है।

इसके अतिरिक्त अर्थशास्त्रीय सिद्धांत, पूंजीवाद विरोध का सामना करने के मामले में बहुत सारे कारणों से पूर्ण रूपांतरति नहीं हैं। सिद्धांतवेत्ता वैज्ञानिक होते हैं। अपने कार्य में आदर्श स्वतंत्रता  बनाए रखने के उनके प्रयास, ऐसा लगता है, उन्हें सामाजिक संगठन की एक खास व्यवस्था के समक्ष क्षमा-याचक के रूप में सेवा करने के लिए बिना किसी तैयारी छोड़ देते हैं। पुन: आधुनिक सिद्धांत का परिष्करण शायद ही चहेती गलत धारणाओं का सहायक है। (हमें याद है कि एडिवन कानन ने इसी वजह से सरल अर्थशास्त्र के लिए आवाज बुलंद की थी। इस बात को मानने के आधार मौजूद हैं कि अपेक्षाकृत समकालीन सिद्धांत का चरित्र, खासकर जब यह संतुलनकारी अवस्थाओं पर जोर डालता है, बाजार के सामाजिक कार्यों की व्याख्या के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसा जान पड़ता है कि वैचारिक स्तर पर पूंजीवाद विरोधी मानसिकता के खिलाफ बचाव को नई स्थितियों के मुताबिक बुनियादी सिद्धांत के लगातार नए प्रयोगों की जरूरत पड़ती है।

पर दूसरी ओर सैद्धांतिक भ्रांति की भूमिका के प्रति और बाजार के विशिष्ट दोषारोपणों की जमात के असर के प्रति हमारी जागरूकता यह विचार करते समय हमें आवश्यक रूप से सजग रखती है कि पूंजीवाद विरोधी मानसिकता वैसे किसी भी युक्ति से दूर की जा सकती है, जो इसके प्रकटीकरण के हर एक स्तर पर काबिज होने में असफल रहती है। एक या एक से अधिक पूँजीवाद विरोधी पूर्वाग्रहों को कितनी ही सफलतापूर्वक उदासीन क्यों न कर दिया जाए, तार्किक गलती की आशंका हमेशा बनी रहती है और पूंजीवाद में प्रत्यक्षत: अवांछनीय अवयवों की मौजूदगी- जो इसके दोषारोपणों में प्रयुक्त होने के लिए तैयार रहती है- अब भी खत्म नहीं हुई है। पूंजीवाद विरोधी पूर्वाग्रहों की विकट सूची इस संभावना से संबद्ध संदेह खड़ी करती है कि वे किसी भी साधारण माध्यम द्वारा सफलतापूर्वक उदासीन कर दिए जाएंगे। निश्चित रूप से यदि किसी प्रगति का मूल्य स्वीकार्य है तो प्रगति वांछनीय है। लेकिन पूंजीवाद विरोधी मानसिकता पर एक स्पष्ट छाप छोड़ने के लिए प्रगति के जिस स्तर की जरूरत है, वह आवश्यक रूप से किसी भी प्रस्ताव से जुड़ी कीमत सर्वाधिक सावधानीपूर्वक की गई सजग परीक्षा की माँग करती है।

पूंजीवाद के कई विद्यार्थियों ने यह ध्यान दिलाया है कि इसके फायदों के बावजूद अन्य व्यवस्थाओं द्वारा इसकी प्रतिस्थापना की भविष्यवाणी करने वाले आधार मौजूद हो सकते हैं। इस संदर्भ में स्कमपीटर के शोध पर ध्यान जाता है। पूंजीवाद को अस्थिर मानने की दलील के पीछे एक संभावित वजह यह है कि यह एक सामाजिक व्यवस्था है जो एक नकारात्मक जनमत को इतने शक्तिशाली रूप में उत्पन्न करता है कि यही अंतत: इसके विनाश का कारक बन जाए। इस पत्र में इसी प्रवृत्ति के स्रोतों को पहचानने का प्रयास किया गया है। इन ताकतों की प्रकृति और शक्ति को स्वीकार करते हुए, धैर्यपूर्ण शिक्षण व विचार-विमर्श के जरिये ही मुक्त बाजार को घेर रखी घृणा और अज्ञानता को हम दूर भगाने की आशा कर सकते हैं।