ईगो की करामात -आयन रैंड का उपन्यास फाउंटैन हैड

ईगो पालना और स्वार्थी होना अच्छा नहीं माना जाता, मगर आयन रैंड की मानें तो यही दो गुण इंसानी तरक्की की चाबी हैं। रैंड ने 1943 में अपना मशहूर नॉवेल द फाउंटेन हैड लिखकर ऑब्जेक्टिविज्म की थअरी को स्थापित किया। नॉवेल का नायक हावर्ड रोर्क एक आदर्शवादी युवा है, जो पेश से आर्किटेक्ट है। अपने विचारों से समझौता करने के बजाय वह संघर्षों का रास्ता चुनता है। परंपरावादी दृष्टिकोण से इमारतें बनाने से उसे सख्त चिढ़ है। पूरे नॉवेल में हावर्ड के इर्द-गिर्द के किरदार एक दार्शनिक निष्पत्ति देने वाला कथानक बुनते हैं। इस नॉवेल की पांडुलिपि को 12 प्रकाशकों ने खारिज किया था। मगर फिर एक नौजवान एडिटर ने अपनी कंपनी से कहा कि अगर हम इस नॉवेल को प्रकाशित नहीं कर सकते, तो मैं आज से तुम्हारा एडिटर नहीं। शुरुआत में आलोचकों ने नॉवेल को सिरे से खारिज कर दिया। मगर एक बार जबानी पब्लिसिटी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अभी तक नहीं थमा है। 1949 में नॉवेल पर इसी नाम से फिल्म भी बनाई गई। हम आपके लिए लाए हैं किताब के कुछ ऐसे स्टेटमंट्स, जिनमें रैंड की थिअरी का जलवा नजर आता है : 

किताब के कुछ फंडू कोट
  • स्वार्थी होना अच्छी बात है। दूसरों के आदर्शों के दबाव में आने के बजाय अपने विचारों पर कायम रहना और अपनी सोच के मुताबिक आगे बढ़ना ही स्वार्थ है। अब तक ये टर्म्स नेगेटिव सेंस में यूज होते रहे हैं, लेकिन जो स्वार्थी नहीं है, वह हमेशा दूसरों के सामने झुकने के लिए, उनकी बातें मानने के लिए तैयार रहता है।
  • दुनिया का हर आदमी अपने आप में एक हीरो है और उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद है खुश रहना। यही उसके जीवन का नैतिक उद्देश्य है। उसका सबसे पवित्र काम है, कुछ ऐसा पाना, जो अपनी प्रकृति में सृजनात्मक हो। उसके हर काम के पीछे एक तर्क, एक वजह होनी चाहिए।
  • जो कहते हैं कि सुअर मानवता के प्रति प्रेम का प्रतीक हैं, क्योंकि सुअर ही एक ऐसा जानवर है, जो हर चीज खा लेता है, हर चीज कबूल लेता है, वे गलत कहते हैं। जो आदमी हर किसी से प्यार करता है और हर जगह घर की तरह महसूस करता है, वह असल में इंसानियत से नफरत करता है। वह अपने लिए किसी जगह और भावना की उम्मीद नहीं करता और इसीलिए हर किस्म के भेदभाव को सहजता के नाम पर स्वीकार कर लेता है।
  • प्यार इज्जत करना है, पूजा करना है, महानता है, ऊपर उठती रोशनी की एक लकीर की तरह है। यह किसी सड़े ख्यालों से बजबजाते समंदर के किनारे की तरह नहीं है। जो लोग प्यार के बारे में सबसे ज्यादा ऊंची आवाज में बात करते हैं, उन्होंने प्यार को कभी महसूस ही नहीं किया। वे लोग किसी किस्म की दया, सहानुभूति या लोगों से अपनी समानता के पैमाने पर प्यार को पाने की कोशिश करते हैं। एक बार जब तुम यह महसूस कर लोगे कि प्यार के मायने क्या होते हैं, प्यार, पूरी गहराई और आवेश के साथ, तो फिर उससे कम किसी भी चीज के लिए तुम काबिल नहीं रह जाओगे।
  • बहुत सारे लोग उसी ढंग से निर्माण करते हैं, जैसे वे जीते हैं। उनके लिए यह एक रूटीन काम है, एक बिना मतलब होने वाली दुर्घटना। लेकिन कुछ लोग समझते हैं कि इमारतें एक महान प्रतीक की तरह होती हैं। हम सब अपने अपने दिमागों में अपनी जिंदगी जीते हैं और इस सोच को साकार रूप में ढालने के लिए कुछ बनाते हैं। तो फिर जो हम बनाएं वह हमारी सोच को दिखाता हुआ ही होना चाहिए, उससे अलग नहीं।
  • बहुत सारे लोग मूर्ख होते हैं और अपने भला नहीं समझ सकते। उन पर गुस्सा होने का कोई फायदा नहीं। मगर उन लोगों का क्या जो अपना भला देख तो सकते हैं, मगर उसे पाने के लिए कोशिश नहीं करते।
  • देखो मैं तुमसे प्यार करता हूं और प्यार करना अपवाद पैदा करने जैसा है। अगर तुम प्यार में होते, तो टूटना, किसी के द्वारा शासित होना, किसी का हुक्म लेना चाहते, क्योंकि यह सब होना मुमकिन नहीं होता। तुम्हारे जिन लोगों के साथ रिश्ते हैं, उनमें से किसी को भी तुमने यह हक नहीं दिया। मगर तुम चाहो तो जीवन में यह अपवाद संभव हो सकता है, प्यार हो सकता है।
  • बहुत सारे लोग हैं, जो अमर होना चाहते हैं, लेकिन हर बीतते दिन के साथ मरते जाते हैं। जब तुम किसी शख्स से एक असेर् के बाद मिलते हो, तो वह वैसा नहीं रह जाता, जैसा पिछली मुलाकात के दौरान था। हर बीतते घंटे के साथ ये लोग खुद का कुछ हिस्सा मारते जाते हैं। वे खुद में बदलाव लाते हैं, वे इनकार करते हैं, वे अपनी ही बातों को काटते दिखते हैं और फिर वे कहते हैं कि यह ग्रोथ है। और अंत में कुछ नहीं रह जाता, कुछ भी ऐसा नहीं जिसकी इज्जत की जा सके, कोई भी ऐसा विचार नहीं जिसके साथ धोखा न किया गया हो। गोया कोई इंसान, कोई ख्याल कभी रहा ही न हो।
- नवभारत टाइम्स से साभार
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