पूर्ण प्रतियोगिता, कम से कम सरकारी हस्तक्षेप व निजीकरण से ही दूर होंगी सभी समस्याएं

पूंजीवाद, बाजारवाद और पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा ही एक ऐसा सिद्धांत है जिसे अपनाकर कोई भी देश एक साथ सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक समस्याओं सहित सभी समस्याओं से न केवल निजात पा सकता है बल्कि तरक्की और विकास के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। देश की तंगहाल आर्थिक स्थिति से निराश जनता और बाजार ने नब्बे की दशक में ऐसे अप्रत्याशित विकास को प्राप्त कर इसकी अनुभूति भी कर चुकी है। लेकिन वर्तमान समय में इरादतन अथवा गैर इरादतन ढंग से बाजार से प्रतियोगिता की स्थिति बनाने की बजाए इसे और हतोत्साहित किया जा रहा है जिसका परिणाम महंगाई, मुद्रा स्फिति आदि जैसी समस्याओं के रूप में हमारे सामने आ रही है। ये बातें सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा देश भर के पत्रकारों के लिए लोकनीति विषय पर आयोजित एक कार्यशाला "आई-पॉलिसी" के दौरान उभर कर आयी।

दिल्ली आधारित अंतर्राष्ट्रीय थिंकटैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी व एटलस नेटवर्क, यूएस के तत्वावधान में देश के प्रतिष्ठित अखबारों व न्यूज चैनलों के दो दर्जन से अधिक पत्रकारों के लिए मसूरी में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला सह परिचर्चा में शैक्षणिक, आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं जैसे जटिल विषयों का समाधान उदारवाद, पूंजीवाद एवं बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति के आधार पर सुझाया गया। रविवार को देर रात तक चले आठ सत्रों में बंटे इस कार्यशाला सह परिचर्चा में सीसीएस की भुवना आनंद, निमिष अधिया, अमित चंद्र, शांतनु गुप्ता, पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के चक्षु रॉय, थ्री आई ई की ज्योत्सना पुरी व ग्रीन स्माइल डाट काम के प्रतीक शाह द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए शोधों और उसकी प्राप्तियों के हवाले से पूंजीवाद, उदारवाद व पूर्ण प्रतियोगिता की स्थति से संबंधित भ्रांतियों को दूर कर उसके लाभों के बारे में अवगत कराया गया। भुवना आनंद ने जहां लोकनीतियों और उसके दस श्रेष्ठ सिद्धांतों पर प्रकाश डाला वहीं अमित चंद्र ने रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों व रिक्शा चालकों की समस्याओं के समाधान के लिए उपाय सुझाए। अमित ने पर्यावरण प्रदूषण, यातायात समस्या व विलुप्त होते जीवों के संरक्षण जैसी समस्याओं का वैश्विक स्तर पर हुए शोधों के माध्यम से समाधान सुझाया। अमेरिका के मैनहटनविले यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक निमिष अधिया ने व्यवसायियों व पूंजीपतियों के प्रति लोगों के पुरानी अवधारणा में आ रहे बदलाव को सिनेमा के मुख्य पात्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया। उन्होंने अयोग्य व्यक्तियों को सरकार द्वारा मिलने वाले गैरइरादतन लाभों पर भी विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। शांतनु गुप्ता ने सरकार द्वारा स्कूलों को आर्थिक सहायता देने की बजाए सीधे छात्रों को स्कूल वाउचर देने का विचार सुझाया। उन्होंने बताया कि गुजरात में जहां इसकी शुरूआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हो चुकी है वहीं अन्य राज्यों ने भी इस ओर रुझान दिखाया है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के चझु रॉय ने संसद व सांसदों की कार्यप्रणाली पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। प्रतीक शाह ने दिनों दिन मजबूत व प्रभावी जनसंचार माध्यम के तौर पर विस्तारित होती सोशल मीडिया व इसके प्रयोग पर विचार प्रकट किए। कार्यशाला में अनिल पांडेय, पारुल शर्मा, चंडीदत्त शुक्ला, रवीश रंजन, अमित कुमार, वेद विलास उन्याल, शुभोजित सेन गुप्ता, राजेश्वरी अइय्यर, प्रणव जोशी, विकास चौहान, मल्लिका जोशी, एहतेशामुल हक, सुरेश चंद रमोला, जतिन आनंद, श्याम सुंदर, शिवानी पांडेय, अरुणेश शर्मा, हितेंद्र गुप्ता, रंजू ऐरी, भावना नायर, सुषमा शर्मा, अंतिका जैन, सिकंदर पारीक, अनमोल गुप्ता, शूरवीर भंडारी सहित अन्य वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए।

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