उदारवाद: राज, समाज और बाज़ार का नया पाठ - सौविक चक्रवर्ती

यह पुस्तक उन लोगों के लिए लिखी गयी है जो दुनिया के सबसे बड़े संवैधानिक लोकतंत्र के जागरूक नागरिक बनना चाहते हैं।

किसी देश के संविधान का उद्देश्य सरकार की शक्तियों को सीमित कर, उससे निर्धारित नियमों के अनुरूप कार्य कराना होता है। जबकि भारतीय संविधान सरकार को बेलगाम शक्तियाँ प्रदान करता है तथा अपने नागरिकों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों तक को सुनिश्चित नहीं करता।

यह पुस्तक विशेष तौर पर नवयुवकों एवं किशोरों के लिए लिखी गई है। चौदह वर्ष के आस-पास की आयु वाले भी इस पुस्तक को आसानी से समझ सकते हैं (शायद कुछ को, कहीं, थोड़ी-बहुत मदद की आवश्यकता हो) इस पुस्तक को किशोरों पर केन्द्रित करने का मुख्य उद्देश्य उन्हें ''वोट देने के अधिकार'' को प्राप्त करने से पूर्व शिक्षित करना है।

हालाँकि यह पुस्तक सभी मतदाताओं, चाहे वे दन्त चिकित्सक हों, इंजीनियर हों या फैशन डिजायनर हों, के लिए उपयोगी होगी। कोई भी व्यक्ति जो यह जानने की इच्छा रखता है कि राजनैतिक-आर्थिक तंत्र कैसे कार्य करता है, इस पुस्तक से लाभान्वित होगा। यह पुस्तक उन प्रबंधकों (मैनेजर) के लिए बड़े काम की होगी, जिन्हें अपने मार्गदर्शन में किसी प्रतिष्ठान का राजनैतिक जगत के साथ तारतम्य स्थापित करना होता है। और शिक्षकों के लिए भी, जिनके लिए समाजवाद की आवश्यक खामियों से अवगत रहना और उसके बारे में बात करना जरूरी है।

वास्तव में आपको इस पुस्तक को पढ़ने की आवश्यकता क्यों है?

सरकार से मान्यता प्राप्त पाठय पुस्तकें आपको नागरिक शास्त्र एवं भारतीय अर्थशास्त्र के बारे में शिक्षित करती हैं। जिस रूप में ये विषय पढ़ाये जाते हैं, उस रूप में ये आपको समसामयिक वस्तु स्थिति का सम्यक बोध नहीं कराते हैं। आपको वैसा ही पढ़ाया जाता है, जैसा कि समाजवादी राज्य आपको विश्वास दिलाना चाहता है।

यदि आप वस्तुओं को भिन्न परिप्रेक्ष्य में - जैसे मुक्त बाज़ार के परिप्रेक्ष्य में - देखते हैं तो यह पुस्तक आपके लिए लाभकारी सिध्द होगी। यह राज्य प्रायोजित समाजवाद के बिल्कुल विपरीत है। इस विचारधारा में सरकार-समाजवाद की भलीभाँति विस्तृत समीक्षा है जो सभी नागरिकों के लिए रुचिकर होगी। और, सबसे पहले, शिक्षा को उदारवादी होना चाहिए। अर्थात् शिक्षाविदों को स्वतन्त्रता के मूल्य के बारे में जरूर पढ़ाना चाहिए। जब लोग यह जानेंगे कि स्वतन्त्र रहना क्यों उनके हित में है, तभी वे अपनी संवैधानिक स्वतन्त्रता का मूल्य समझेंगे और उसकी रक्षा के लिए तत्पर होंगे। स्वतन्त्रता का मतलब केवल राजनैतिक स्वतन्त्रता या स्वराज नहीं है वरन् इसका तात्पर्य आर्थिक स्वतन्त्रता से भी है अर्थात् जीविकोपार्जन तथा जीविका से प्राप्त कमाई को अपने पास रखने की स्वतन्त्रता।

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