व्यंग्य : वेलेंटाइन डे और डेमोक्रेसी डे का अजूबा मिश्रण

वेलेंटाइन डे और डेमोक्रेसी में बड़ी समानता है। समानता क्या, दोनों को एक ही समझिए। दोनों में एकाध छोटी-मोटी भिन्नताएं हों तो हों, वरना हमें तो जुड़वा वाला मामला ही लगता है। एक को उठा दो और दूसरे को बैठा दो। वेलेंटाइन की बात करते-करते, डेमोक्रेसी में टहल जाओ या डेमोक्रेसी की फिक्र करते-करते, वैलेंटाइन की याद में खो जाओ। 

अचरज नहीं कि वेलेंटाइन की ही तरह, डेमोक्रेसी का भी एक दिन होता है। यह दूसरी बात है कि वेलेंटाइन वाले को डे कहने पर ही लोगों ने बस कर लिया है, जबकि डेमोक्रेसी वाले डे के लिए चुनाव वगैरह जैसे कितने ही नाम लोगों ने ईजाद कर लिए हैं। वेलेंटाइन की तरह, चुनाव वगैरह का साल में कोई एक दिन मुकर्रर नहीं हुआ तो क्या हुआ, फिर भी उसका भी एक दिन होता जरूर है। सच पूछिए तो कई चतुर सुजानों का तो कहना है कि वेलेंटाइन की तरह, डेमोक्रेसी उर्फ चुनाव का भी एक दिन हमेशा के लिए तय कर देना चाहिए, फिर भले ही २९ फरवरी की तरह यह डेमोक्रेसी डे, चार-पांच साल में एक रोज ही आए। 

बेशक, डेमोक्रेसी के लिए सिर्फ एक दिन और वह भी पांच में साल में रखे जाने के ख्याल से बहुत से लोग बुरा मान जाएंगे। यह दलील पेश करने वाले भी निकल ही आएंगे कि डेमोक्रेसी को चुनाव तक ही क्यों समेटा जा रहा है? लेकिन, हमें तो यह पाखंड का ही मामला ज्यादा लगता है। पांच साल में एक दिन ही क्यों, साल में सारे के सारे दिन डेमोक्रेसी के होने चाहिए, यह दलील देने वाले असल में तो एक डेमोक्रेसी डे की भी जड़ खोदने पर तुले हुए हैं। 

पांच साल के एक डे में पब्लिक को वेलेंटाइन बनकर जो थोड़ा-बहुत मान-मनुहार नसीब भी हो जाता है, इन्हें वह भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है। पर वेलेंटाइन डे के मामले में भी तो ऐसा ही है। एक ही दिन वेलेंटाइन का क्यों से शुरू करने वाले अक्सर वेलेंटाइन डे और वेलेंटाइनियत ही नहीं, वेलेंटाइनों के भी पीछे लाठी लेकर दौड़ते नजर आते हैं। वेलेंटाइनों की मान-मनुहार छोड़िए, उन्हें तो प्रेमियों का साथ बैठना तक मंजूर नहीं है। 

पर वेलेंटाइन और डेमोक्रेसी में, एक डे मनाए जाने की ही समानता नहीं है। जैसा हमने पहले ही कहा, दोनों का मिजाज एकदम एक जैसा है। वेलेंटाइन के मामले में जैसा चुनाव का जनतंत्र बताया गया है, वैसा असली चुनाव में भी नहीं होगा। काला-गोरा, ठिगना-लंबा, बच्चा-बुजुर्ग, स्त्री-पुरुष, अक्लमंद-भोला, नया-पुराना, कोई भी किसी का भी वेलेंटाइन हो सकता है। बल्कि अब तो मामला यहां तक पहुंच गया है कि छत्तीसगढ़ की खाकी भाइयों की सरकार ने इस वेलेंटाइन डे पर माता-पिता समर्पण दिवस मनवाने का फैसला लिया है। वैसे माता-पिता समर्पण दिवस, कर्नाटक के उनके ही संगियों के ट्रिपल एक्स वीडियो दिवस से तो बेहतर ही है। और हां! उन्हीं के श्रीराम सेने के संस्कृति शिक्षण से भी। यह दूसरी बात है कि वेलेंटाइन में डेमोक्रेसी की मिलावट के चक्कर में ही यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक, इलेक्शन के चक्कर में केसरिया वीर इस बार वेलेंटाइन डे पर अपनी लाठियां नहीं लहरा रहे हैं। 

च्वाइस के मामले में डेमोक्रेसी किसी भी तरह वेलेंटाइन से कमतर नहीं है। यूपी का ही मामला ले लीजिए। पब्लिक की जितनी मान-मनौव्वल हो रही है, उतने ही विकल्प उसके पास चुनने के लिए हैं। चाहे तो झूमते-झामते हाथी की शाही सवारी का आनंद ले सकती है या फिर साइकिल की उससे कुछ तेज, पर कम शान की सवारी का। चाहे तो गंधहीन कमल को देखकर खुश हो सकती है या फिर थप्पड़ खाकर चुप हो सकती है। इतना ही क्यों और भी कितने ही विकल्प हैं, सब अपनी रुचियों के हिसाब से चुन सकते हैं। फिर भी कोई न जंचे तो घर पर बैठकर अकेले ही रिपब्लिक डे मनाने का भी विकल्प है ही। जब वेलेंटाइन और डेमोक्रेसी में इतनी समानताएं हैं, तो उन पर लाठी भांजने वाले भी एक ही होने चाहिए।

साभार: दैनिक भाष्कर (राजेंद्र शर्मा)

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