मुक्त व्यापार ही सर्वोत्तम नीति है

संरक्षणवाद का प्रेत अपना पांव पसारता जा रहा है। हालांकि यह हमेशा से एक खतरनाक और बेवकूफी भरी नीति रही है, लेकिन मौजूदा आर्थिक संकट के दौरान यह नीति और भी खतरनाक हो गई है, क्योंकि इससे अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने का खतरा पैदा हो गया है। संरक्षणवादी सोच की मूल मान्यता यह है कि सरकार जब घरेलू उत्पादकों को मोनापॉली ताकत देती है, तो राष्ट्रीय समृध्दि बढ़ती है। लेकिन पिछले सैकड़ों वर्षों के आर्थिक विश्लेषणों, ऐतिहासिक अनुभवों और प्रयोगों से साबित हो चुका है कि यह अवधारणा गलत है। संरक्षणवाद से सिर्फ गरीबी बढ़ती है, समृध्दि नहीं। संरक्षणवाद से घरेलू रोजगारों और उद्योग-धंधों की सुरक्षा तो नहीं ही होती है, उलटे यह उन्हें नष्ट ही करता है, क्योंकि यह आयात उद्योग और उन सभी उद्योगों को नुकसान पहुंचाता है, जो अपने सामानों का उत्पादन करने के लिए आयात पर निर्भर करते हैं। स्थानीय स्टील कंपनियों को सुरक्षा देने से स्थानीय स्टील की कीमत बढ़ जाती है और इसके कारण कार एवं स्टील के दूसरे सामानों के निर्माण की लागत भी बढ़ जाती है। संक्षेप में कहा जाए तो संरक्षणवाद मूर्खों का खेल है।

संरक्षणवाद से समृध्दि तो घटती ही है, लेकिन इसके और भी दूसरे नुकसान हैं। संरक्षणवाद शांति को नुकसान पहुंचाता है। और यह अपने आप में ही इतना बड़ा कारण है कि सभी सभ्य और सुहृदय नागरिकों को आर्थिक राष्ट्रवाद के खिलाफ एक जुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। यह टकराव की विचारधारा है, जो अज्ञानता पर आधारित है और संरक्षणवाद के माध्यम से अमल में लाई जाती है।

करीब ढाई सौ साल पहले मोंटेस्क्यू ने कहा था कि ''शांति व्यापार की स्वाभाविक परिणति है। इसके माध्यम से दो ऐसे देशों के बीच भी अन्योन्याश्रय का संबंध स्थापित हो जाता है, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। क्योंकि उनमें से एक यदि कुछ खरीदना चाहता है, तो दूसरा कुछ बेचना चाहता है और इस तरह उनकी आपसी जरूरतों के आधार पर उनके बीच एकता स्थापित हो जाती है।''

शांति व्यापार का सबसे कीमती तोहफा है। व्यापार विभिन्न लोगों को एक व्यावसायिक संस्कृति में बांधता है, जिसके तहत वे एक दूसरे की भाषाओं, सामाजिक मानदंडों, कानूनों, अपेक्षाओं, इच्छाओं और कला-कौशलों को सीखते हैं। इससे शांति को बढ़ावा मिलता है।

व्यापार लोगों को परस्पर लाभदायक रिश्ते बनाने के लिए प्रोत्साहित कर शांति को बढ़ावा देता है। जैसे व्यापार पेरिस और लायंस, बोस्टन और सियाटल, कलकत्ता और मुंबई की आर्थिक जरूरतों में ताल-मेल बिठाता है, उसी तरह यह पेरिस और पोर्टलैंड, बोस्टन और बर्लिन, कलकत्ता और कोपेनहेगन यानी, आपस में व्यापार करने वाले सभी देशों के लोगों की आर्थिक जरूरतों में भी ताल-मेल स्थापित करता है।

इस विषय पर काफी शोध किए गए हैं और सभी इसी बात की ओर इशारा करते हैं कि व्यापार से शांति को बढ़ावा मिलता है।

इस तथ्य को अनदेखा करने का परिणाम क्या हो सकता है, इसका शायद सबसे दुखद उदाहरण है द्वितीय विश्व युध्द।

सन् 1930 में अमेरिका ने स्मूट-हॉली टैरिफ कानून के माध्यम से घरेलू व्यवसाय को संरक्षण देने के लिए विदेशी सामानों पर काफी कर लगा दिया था, जिसके कारण दूसरे देशों ने भी अमेरिकी माल के आयात पर काफी कर लगा दिया था। इसके परिणास्वरूप 1929 से 1932 के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 70 फीसदी की गिरावट आई थी। अर्थशास्त्री मार्टिन वुल्फ कहते हैं कि व्यापार में आई इस गिरावट के कारण जर्मनी और जापान जैसे कुछ देषों में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था (Autarky and Lebensraum) की ओर बढ़ने जैसी एक बुरी प्रवृत्ति का विकास हुआ।

इसके तुरंत बाद दुनिया को तब-तक के इतिहास का सबसे खौफनाक युध्द देखने को मिला।

व्यापार युध्द की संभावना को कम करता है और जन-जीवन की रक्षा करता है।

समृध्दि बढ़ाकर और इसे अधिक-से-अधिक लोगों तक ले जाकर भी व्यापार जन-जीवन की रक्षा करता है। इस बात के काफी प्रमाण हैं कि मुक्त व्यापार से समृध्दि को बढ़ावा मिलता है। समृध्दि आम लोगों को स्वस्थ्य और लंबा जीवन जीने में सक्षम बनाती है।

इससे लोगों को अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने के कारण मुक्त व्यापार से मिले व्यापक सांस्कृतिक अनुभवों का रसास्वादन करने का भी अधिक मौका मिलता है। मुक्त व्यापार के कारण वस्तु एवं विचार के क्षेत्र में दुनिया भर से रिश्ता बनने के कारण संस्कृति समृध्द होती है।

इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि मुक्त व्यापार भौतिक समृध्दि बढ़ाती है। लेकिन इसका जो सबसे बड़ा फायदा है, उसे पैसों से नहीं तौला जा सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ है युध्द से बेखौफ और आजाद जन-जीवन।

इन बातों के मद्देनजर इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले हम लोग एकजुट होकर सभी देशों की सरकारों से अपील करते हैं कि वे व्यापार के सामने बाधा खड़ी करने वाले संकीर्ण स्वार्थ रखने वालों की मांगों को मानने से इनकार कर दें। इसके साथ ही हम सरकार से यह भी अपील करते हैं कि वे मुक्त व्यापार के सामने खड़ी मौजूदा संरक्षणवादी बाधाओं को भी फाड़कर फेंक दें। हर देश की सरकार से हमारा कहना है कि : अपने नागरिकों को सिर्फ अपने देश की ही नहीं बल्कि दुनिया भर के खेतों, फैक्टरियों और प्रतिभाओं के फल चखने का मौका दें। इसका परिणाम अधिक समृध्द, बेहतर और सुख-शांति भरा जीवन के रूप में देखने का मिलेगा।

मुक्त व्यापार नीति को प्रोत्साहन के लिये देखें : http://freedomtotrade.org/petition

 

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