विचारधारा संबधी प्रस्ताव या वैचारिक लीपापोती

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पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर व

क्या हम सभ्य हो रहे हैं ?

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पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा

आर्थिक स्रोतों को खत्म करने पर पस्त होंगे माओवादी

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माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी

समय के संकेतों को समझें

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विश्वसनीय आंकड़ों विशेषकर पढाई की गुणवत्ता के बारे में आंकड़ों के अभाव के कारण शिक्षा में सुधार पर चल रही बहस बुरीतरह बाधित होती रही है। सरकारी आंकड़े सरकार द्वारा किए गए कामों पर फोकस करते हैं। स्कूली प्रणाली में कितनी राशि का आबंटन किया गया कितना खर्च हुआ आदि। वे हमें बताते है कि कि कितना धन आवंटित किया गया, कितने परकोटे, टायलेट बने, कितने शिक्षकों की सेवाएं ली गईं। लेकिन व

सेंसरशिप के बढ़ते कदम

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न होने की तुलना में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों गुना बेहतर होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आत्यंतिक महत्व को प्रतिपादित करने के लिए चार्ल्स ब्रेडला के इस उद्धरण का अक्सर हवाला दिया जाता है। लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश की सरकार और अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दुरूपयोग को रोकने के नाम पर अभि

पूंजीवाद सबसे स्वाभाविक आर्थिक संरचना है

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मैं समाजवाद का समर्थक नहीं हूं क्योंकि स्वतंत्रता ही मेरे लिए परम मूल्य है।उससे ऊपर कुछ नहीं । और समाजवाद बुनियादी तौरपर स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसे होना भी चाहिए ,यह अपरिहार्य है क्योंकि समाजवाद की कोशिश किसी अप्राकृतिक चीज को अस्तित्व में लाने की है।

दलितों के लिए उम्मीद की किरण है आर्थिक उदारवाद

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इन  दिनों देश की हर आर्थिक समस्या चाहे वह आसमान इस छूती महंगाई हो या बढ़ती बेरोजगारी या मंदी  के लिए पूंजीवाद ,नवउदारवाद और वैश्वीकरण को दोषी ठहराना नवीनतम बौद्धिक फैशन बन गया है। इस भेड़चालवाली बौद्धिकता के दौर में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के विचार ताजा हवा के झोंके की तरह लगते हैं। उनके विचारों की  विशेषता यह है कि वे परंपरागत चिंतन की लीक से हटकर सोचते हैं

राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

बीमारू राज्यों का अच्छा प्रदर्शन

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उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों को आमतौर पर पिछड़ा मान लिया जाता है। सामाजिक विकास के तमाम पैमानों पर ये राज्य पिछड़े हुए हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या स्त्री-पुरुष बराबरी हो। जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों को पूरा करने में ये राज्य सबसे बड़ी बाधा हैं, दक्षिणी राज्यों ने औसतन 2.1 जन्म प्रति दंपति का लक्ष्य पा लिया है, यानी उनकी जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। इसलिए ज

अल्पसंख्यकों पर दांव

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कांग्रेस ने इस बार गजब का दांव मारा है| यह दांव वैसा ही है, जैसा कि 1971 में इंदिराजी ने मारा था| गरीबी हटाओ!

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