साप्ताहिक न्यूज़लेटर
30 अप्रैल 2010

आर्थिक असमानता और अन्याय की मृगमरीचिका - विल विलकिंसन

बराक ओबामा के चुनाव से पहले आय में असमानता एक गर्म मुद्दा था। इसका ज्यादातर श्रेय न्यूयॉर्क टाइम्स के दमदार स्तंभकार और अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन को जाना चाहिए। अमेरिका में आय में असामनता को लेकर उनकी चेतावनी भरी आक्रामक किताब द कांशंस ऑफ ए लिबरल ने इस विषय को जनता के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया, जो ओबामा के पद संभालने के बाद और मंदी के पैर जमा लेने के बाद काफी शांत हो गया था। क्रुगमैन का तर्क है कि आय में बढ़ते अंतर कारण ढांचागत समस्या नहीं मुख्य तौर पर राजनीतिक है। इस स्थिति में सुधार के लिए राजनीतिक खासतौर पर पुनर्वितरण से जुड़े कदम की जरुरत है।

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बंधन मुक्त कृषि मूल्य - बी. आर. शिनॉय

9 मई, 1977 को लिखा बी. आर. शिनॉय का यह निबंघ “कृषि मूल्य आयोग के मिथ्या तर्क” शीर्षक से यह निबंध छपा था. शिनॉय ने इस सिद्वांत का विरोध इस गलत धारणा को दूर करने के लिए किया कि मजदूरी की दरें बढ़ाने से बढ़ीं खाघान्नों की कीमतों मुद्रास्फीति में इजाफे का कारण बनती है। यह तो मुद्रा के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाने का साधारण मामला है जिसके तहत धन किसानों की जेब से होते हुए वितरण प्रणाली के जरिए होते हुए शहरी आबादी की जेब में जाता है।

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उदारवादी चिंतक जॉन स्टुअर्ट मिल

मिल आज़ादी में विश्वास रखते थे- मुख्यतया विचारों और भाषा की आज़ादी। उन्होंने आज़ादी का पक्ष दो आधारों पर लिया। पहला आधार- समाज की उपयोगिता अधिकतम होती यदि प्रत्येक महिला और पुरूष अपने हिसाब से चुनाव कर सके। (मिल का यह विश्वास इसलिए था कि उनके जीवन पर उनकी पत्नी हेरिएट टेलर का प्रभाव था। जिसे वह अपना आदर्श मानते थे। मिल के मतानुसार महिलाऍ पुरूषों के बराबर थी। उनकी पुस्तक ''नारी की अधीनता'' में उन्होंने नारी को विरासत में मिली हीनता के समकालीन विचारों पर प्रहार किया)। दूसरा आधार- आज़ादी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। आज़ादी पर अपने विख्यात निबंध On Liberty में मिल ने इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि आत्म रक्षा या खुद को बचा क रखना ''एकमात्र अंत” है

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उदारवादी चिंतक सी.वाई. चिन्तामणि

Chintamaniइलाहाबाद से निकलने वाले अखबार दि लीडर के संपादक होने के दौरान उन्होंने किसी को नहीं बख्शा। यहां तक कि उन्होंने अपने गुरु गोपाल कृष्ण गोखले तक की भी परवाह नहीं की। वे अखबार के बोर्ड के सदस्यों की आलोचना करने में भी कभी हिचकिचाते नहीं थे और यह उनकी ईमानदारी का ही नतीजा था, जिसने उन्हें हमेशा ही अपने ढंग से काम करने की आजादी दी। वे अपने राजनीतिक जीवन में उदारवाद के समर्थक थे। वे दो बार लिबरल पार्टी (या नेशनल लिबरेशन फेडरेशन) के अध्यक्ष भी चुने गए।

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