बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत
आदर्श नियमः
सीसीएस विधायी विश्लेषण 4
फरवरी 2010 में अंतिम तौर पर तैयार आरटीई आदर्श नियम (RTE model rules) राज्य सरकारों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने के लिए दिशानिर्देश का काम करता है। वैसे कानून को लागू करने में ज्यादा सफलता के लिए इन नियमों में कुछ पर पुनर्विचार की जरुरत है। सीसीएस का स्कूल विकल्प अभियान (The School Choice Campaign of CCS) इस महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर चर्चा के लिए 5 विशेष परिवर्तनों का प्रस्ताव करता है
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आरटीई के तहत कमजोर तबके के लिए 25% आरक्षण लागू करना
निजी गैर अनुदानित स्कूलों को 25 फीसदी आरक्षण के बदले में की जाने वाली खर्च की भरपाई की गणना न केवल सरकारी स्कूलों में होने वाले आवर्ती खर्च के आधार पर बल्कि अचल संपत्ति और पूंजीगत व्यय के साथ ही मूल्यह्रास और ब्याज की लागत को शामिल करके की जानी चाहिए। इस खर्च में राज्य सरकार द्वारा सभी स्तरों पर प्राथमिक शिक्षा पर किए जाने वाले व्यय को शामिल करना चाहिए. अन्य निजी सार्वजनिक संपत्ति (PPP) की ही तरह सरकार पूंजी के जीवन चक्र (life cycle of capital) तय कर सकती है।
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आज़ादी के प्रचार पर - फिलिप पेटिट
इसैया बर्लिन (Isaiah Berlin) द्वारा प्रसिद्ध बना दिए गए शब्दों को इस्तेमाल करके और इसमें तोड़-मरोड़ की बात को भी स्वीकारते हुए जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज, नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के बीच अंतर के जिक्र के साथ अपनी बात शुरु करते हैं। आपके पास 'एक्स' काम करने की नकारात्मक आज़ादी होती है जब कोई आपका ऐसा करने में विरोध नहीं करता, भले ही विरोध चाहे जो हो; आपके पास 'एक्स' काम करने की सकारात्मक आज़ादी (या प्रभावी) होती है और साथ में आपके पास यह काम करने की क्षमता भी होती है। वे इस मिथक को भी, जो कि उनको दिखाई देता है, तोड़ने की कोशिश करते हैं कि आज़ादी की ये दो संकल्पनाएं सरकार की भूमिका की दो संकल्पनाओं के साथ जोड़ी बनाती हैं, क्रमशः दक्षिणपंथी और वामपंथी।
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उदारवादी
चिंतक मीनू मसानी
मसानी किस तरह के इनसान थे? उनकी ऐसी कौन-सी विशेषताएं थीं जिनके चलते उन्हें ऐसी पुस्तक का हिस्सा बनाया गया जोकि उन लोगों के बारे में है, जो उस बात के लिए पूरे साहस के साथ खड़े हुए जिसमें उनका यकीन था, बेशक इसके मायने ताकतवर संस्था से टक्कर लेने या बिना किसी समर्थन के अकेले आगे बढ़ना ही क्यों न हो? पहले प्रश्न का जवाब इस निबंध की विषय सामग्री है। दूसरे प्रश्न का जवाब, पाठक उस शख्स के बारे में दी गई जानकारी को पढ़कर खुद ही फैसला करेंगे, जिसे मेरे विचार में उन बहुत कम लोगों में शामिल किया जा सकता है, जिन्होंने आज़ादी के बाद भारत में उदारवाद की आत्मा को जिंदा रखा।
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उदारवादी
चिंतक तेज बहादुर सप्रू
वे 1907 में कांग्रेस के नरमपंथ का हिस्से बने और वे दि लीडर समाचार-पत्र से जुड़े हुए थे। वे मेमोरेंडम ऑफ दि 19 पर दस्तखत करने वाले लोगों में से एक थे। वे वायसराय की इंपीरियल लेजिसलेटिव काउंसिल के सदस्य थे। यह एनी बेसेंट के होमरूल लीग आंदोलन से भी जुड़े रहे। उन्हें लॉर्ड रीडिंग की कार्यकारी समिति में लॉ मेंबर नियुक्त किया गया। जहां उन्होंने दो साल काम किया। उन्होंने ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का भारतीय मामलों में दखल देने का विरोध किया और तर्क दिया कि ये दखल सारे सुधारों को नष्ट कर देगा।
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