साप्ताहिक न्यूज़लेटर
16 अप्रैल 2010

आज़ादी की अवधारणाएं - डेविड स्मिट्ज और जेसन ब्रेनन

'आज़ादी' शब्द को लेकर एक आम मिथक है, एक ऐसा मिथक जिसको वामपंथियों ने ही नहीं, दक्षिणपंथियों ने ही नहीं, अनुदार, परिवर्तनवादी, आधुनिक उदारवादी और परंपरागत उदारवादी सभी ने खूब हवा दी। इस मिथक की शुरुआत एक विशिष्टता से होती हैः आज़ादी के दो मूल रुप होते हैं- नकारात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक आज़ादी (negative liberty) का संबंध प्रतिबंधों, रुकावटों या बाधाओं से होता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को संपत्ति की आज़ादी होती है- इसे नकारात्मक आज़ादी माना जाता है-अगर दूसरे उसकी संपत्ति को हासिल न कर सकें या उसके द्वारा इसके इस्तेमाल में हस्तक्षेप न कर सकें तो।

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आज़ादी तो आज़ादी है - टॉम जी. पामर

आज़ादी के साथ दौलत के मेल की शर्त परंपरागत उदारवादियों की 'आज़ादी की उपधारणा (presumption of liberty)' के ठीक उल्टी है। आज़ादी की उपधारणा के मुताबिक, सबूत देने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जो दूसरे के काम को बाधित कर रहा हो और न कि उस व्यक्ति की जो काम करना चाह रहा हो। यह 'नकारात्मक' आज़ादी के लिहाज से ही खरी है। बेगुनाही की उपधारणा भी इसी तरह उस व्यक्ति से सबूत मांगती है जो दूसरे की आज़ादी को बाधित करता है, किसी आरोपी के खिलाफ सभी सबूत जुटाकर आरोप साबित करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन आरोपी अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि की मांग कर सकता है।

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हत्थेदार कुर्सी से बाहर, अनिश्चिचता की ओर - जॉन क्रिसमैन

जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज के बेहद रोचक निबंध के कई अंतर्निहित विचारों में से एक यह है कि नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी विचारों का एक समूह है न कि विभाजन। इसी तरह वे ध्यान दिलाते हैं कि, मेरी सोच से सही भी है, नागरिकों को दी जाने वाली आज़ादी के स्तर और प्रकार का फैसला केवल वैचारिक विश्लेषण से ही नहीं किया जा सकता, और (उन शब्दों में जिनका वो इस्तेमाल नहीं करते) आज़ादी एक ऐसा विचार है जिसे चुनौती दी जा सकती है और इसलिए इसका इस्तेमाल राजनीतिक विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जा सकता।

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उदारवादी चिंतक महात्मा गांधी

महात्मा गांधी का सार्वजनिक जीवन उनके उदारवादी मूल्यों में टिकाऊ विश्वास का अच्छा प्रमाण है। चाहे वह असहमति का अधिकार हो, उनके आश्रम में होने वाली घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण की प्रतिबद्धता, विरोधी विचारों को संयम से सुनना और हिंसा के प्रति उनकी घृणा, हर मायनों में गांधीजी एक सर्वोत्कृष्ट उदारवादी थे।

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