साप्ताहिक न्यूज़लेटर
09 अप्रैल 2010

आज़ादी तो आज़ादी है - टॉम जी. पामर

आज़ादी के साथ दौलत के मेल की शर्त परंपरागत उदारवादियों की 'आज़ादी की उपधारणा (presumption of liberty)' के ठीक उल्टी है। आज़ादी की उपधारणा के मुताबिक, सबूत देने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जो दूसरे के काम को बाधित कर रहा हो और न कि उस व्यक्ति की जो काम करना चाह रहा हो। यह 'नकारात्मक' आज़ादी के लिहाज से ही खरी है। बेगुनाही की उपधारणा भी इसी तरह उस व्यक्ति से सबूत मांगती है जो दूसरे की आज़ादी को बाधित करता है, किसी आरोपी के खिलाफ सभी सबूत जुटाकर आरोप साबित करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन आरोपी अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि की मांग कर सकता है।

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उदारवादी चिंतक हेनरी जॉर्ज

saजॉर्ज की सामाजिक उत्थान की इच्छा उन्हें महत्वपूर्ण उदारवादी सुधारक बनाती है और जो लेसी फेयर (मुक्त मुद्रा) और उदारवादी विचारधारा से मेल खाती है। यह विचारधारा उन्हें उन अन्य समाज सुधारकों से अलग करती है जो आज़ादी का बलिदान ''दखलअंदाज कल्याणकारी राज्य'' की वेदी पर स्वाहा करने को तैयार थे।

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जंजीरों में बंधा बचपन

हद  तो  ये  है  कि  सबको  बेहतर  चिकित्सा  देने  की   चुनावी  घोषणा  पत्र  में  बात  करने  वाली  पार्टियां  इस  बच्ची के साथ हो रहे  अमानवीय बर्ताव से भी  बेखबर  है। इस बारे में जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बैजनाथ राम को जानकारी दी गई तो उन्होंने कहा, ”लड़की के परिवार को बोलिए आकर मिलें जो होगा करेंगे.” यानी वही लचर प्रशासनिक रवैया।

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शिक्षा पर सियासत...

मायावती ने जिन पार्कों और स्मारक स्थलों का निर्माण किया है उनकी सुरक्षा के लिए एक बल बनाने का फैसला भी लिया है, जिसमें 1,200 लोगों को सुरक्षाकर्मियों के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। यानी बड़े स्तर पर भर्तियां और खर्च होगा। बात शिक्षा के अधिकार कानून की आए तो मुख्यमंत्री धनाभाव की बात करती हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके राज्य में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर कुछ कम नहीं है।

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नक्सलवाद:एक गंभीर समस्या...

सरकारें काफी समय तक नक्सलवाद को कानून और व्यवस्था की समस्या कह कर इसकी भयावहता का सही अंदाजा लगाने में नाकामयाब रही हैं. या फिर सब कुछ पता होते हुए कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं. नक्सल समस्या से निबटने के लिए आबंटिक धनराशि इतने वर्षों से पानी में बहाई जा रही है. आदिवासी क्षेत्रों में समावेशी विकास की बातें करने वाली सरकारों की कथनी और करनी के अंतर की उचित समीक्षा भी जरूरी है.

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