1991
का सुनहरा ग्रीष्म - गुरचरण दास
चिदंबरम
इस हथियार को इसलिए पसंद करते थे क्योंकि यह इस प्रक्रिया
में नौकरशाहों को प्रवेश नहीं देता था। उन्होंने वह छीन
लिया और कुछ ही घंटों में इन दो आदमियों ने इसे लालफीताशाही
की पहुंच से बहुत दूर पहुंचा दिया। महीनों की देरी और कठिन
तर्क, संताप और भ्रष्टाचार जिसे भारत ने कई दशकों से बनाया
था।
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जगाओ
गण-देवता को
“सूचना
का अधिकार कानून सुशासन के लिए मजबूत औजार है। स्वस्थ मजबूत
लोकतंत्र का दायित्व केवल सरकारी अधिकारियों तथा कर्मचारियों
का नहीं, बल्कि इसमें आम आदमी की भागीदारी जरूरी है।” समृद्ध
लोकतंत्र के लिए आम लोगों को सूचना संपन्न करना जरूरी है।
यदि पूरे अभियान पर रोशनी डालें तो नागरिकों की क्षमता अभिवृद्धि
की लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी
छात्रों और युवाओं की है।
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उदारवादी
चिंतक दादा भाई नौरोजी
वे
पहले भारतीय थे जिन्हें एलफिंस्टन कॉलेज में बतौर प्रोफेसर
के रूप में नियुक्ति मिली। बाद में यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन
में उन्होंने प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाए दीं। उन्होंने
1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन
की अध्यक्षता की। उनकी महान कृति “पॉवर्टी ऐंड अन-ब्रिटिश
रूल इन इंडिया” राष्ट्रीय आंदोलन की बाइबल कही जाती है।
वे महात्मा गांधी के प्रेरणा स्त्रोत थे।
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आस्था
पर आघात...
अगर
एक बाबा, जो आध्यात्मिक शक्ति से लैस होने की बात करता है
और खुद के सभी दुनियावी मोह-माया से दूर होने का दावा करता
है, उन्हें अगर सैक्स रैकेट में गिरफ्तार किया जाए तो इसे
क्या कहेंगे? काम-वासना पर विजय पाने का दावा यह बाबा करते
हैं, यह उसमें कहीं ज्यादा लिप्त हैं, और उससे भी ज्यादा
माया महाठगिनी के सबसे बड़े भक्त भी।
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मन
के हारे हार...
आत्महत्या
अपराध है. अपनी ही जीवनलीला समाप्त कर देने वाली यह प्रवृत्ति
आधुनिक जीवन की एक बड़ी त्रासदी के रूप में उभरकर सामने
आई है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हमें तनाव, दबाव या
अवसाद के कारणों में जाकर कही न कहीं हो रही बुनियादी गलतियों
की ठीक करने की जरूरत है. क्या आपको लगता है कि बढ़ती स्पर्धा
और अति-महत्वाकांक्षी होना ही इस रुझान के लिए जिम्मेदार
है?
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