साप्ताहिक न्यूज़लेटर
19 फरवरी 2010

बचाना है भविष्य

2006 से 2009 के बीच की अवधि में नक्सलियों ने कथित रूप से 300 स्कूलों को निशाना बनाया। बिहार और झारखंड में 2009 में 50 स्कूलों को उड़ा दिया गया। वर्ष 2009 की पहली छमाही में झारखंड में 37 स्कूलों सहित दर्जनों स्कूलों को सुरक्षा अभियानों को अंजाम देने के लिए कब्जे में ले लिया गया जबकि फरवरी 2007 में छत्तीसगढ़ सरकार के सूत्रों ने बताया था कि हाल के महीनों में 250 स्कूलों को नक्सलियों ने धमाके से उड़ा दिया गया।

और पढ़ें [+]

बिजनेस की ही सामाजिक जिम्मेदारी क्यों?

मैंने अपने आप से पूछा कि आखिर क्यों कोई डॉक्टरों, वकीलों, पत्रकारों को सामाजिक जिम्मेदारी पर भाषण नहीं देता? बिजनेस के लोगों के खिलाफ ही यह आक्रोश क्यों? सही है कि भारत में आर्थिक सुधारों की सफलता के बाद पूंजीवाद के प्रति हमारा शत्रु भाव कुछ कम हुआ है। लोग यह तो मानते हैं कि बाजार व्यवस्था से समृद्धि आई है, लेकिन पूंजीवाद को नैतिक व्यवस्था वे अब भी नहीं मानते।

और पढ़ें [+]

योजना का एक दशक - बी.आर.शिनॉय

हम सार्वजनिक क्षेत्र के घाटे की पूर्ति के लिए अबाधित तौर पर धन मुहैया कराते रहते हैं। जब इससे कीमतों में उछाल आता है तो हम इसकी जवाबदेही थोपने के लिए 'असामाजिक तत्वों' की खोज आरंभ कर देते हैं। बैंकों और कारोबारियों पर लांछन लगाकर चयनात्मक कर्ज अंकुश और नियंत्रण (credit curb and control) चाहते हैं। नहरों में पानी के बहाव पर नियंत्रण से बाढ़ को नहीं रोका जा सकता और न ही ऐसे नियंत्रण मुद्रास्फीति कोष (inflationary funds) पर ही नियंत्रण हासिल कर सकते हैं।

और पढ़ें [+]

उदारवादी चिंतक राजा राममोहन राय

राजा राममोहन की मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और लोगों के साथ संवाद स्थापित करने की तत्परता से जुड़ी प्रतिबद्धता ही उन्हें सर्वोत्कृष्ट उदारपंथी बनाती है। उन्हीं से आधुनिक भारतीय उदारपंथी आंदोलन का आरंभ होता है।

वे चाहते थे कि पाश्चातय शिक्षा को प्रोत्साहित तो किया जाए लेकिन भारतीय भाषाओं की कीमत पर नहीं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, वे पहले आम भारतीय थे जिन्होंने इंग्लैण्ड की यात्रा की। उन्हें सही मायनों में आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है।

और पढ़ें [+]

भरोसा नहीं पुलिस पर...

हमारी कानून व्यवस्था की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी की लगभग 97 फीसदी महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं. फिर इस संबंध में पुलिस-प्रशासन के लिए शर्म की बात यह कि सिर्फ 20 फीसदी महिलाएं ही मानती हैं कि मुश्किल में पड़ने पर पुलिस उनकी कोई मदद करेगी।

और पढ़ें [+]

आज़ादी का हिस्सा बनें

आप अपने लेख, पुस्तकें, विषय आधारित दिलचस्प और सूचनापरक तस्वीरें, चित्र और अपनी पुस्तकें एवं सुझाव हमें भेज सकते हैं। जिनका चयन करने के बाद हमें उन्हें अपनी वेबसाइट पर डालेंगे। इसके अलावा आप हमारे ब्लॉग के लिए भी प्रासंगिक विषयों पर लिख सकते हैं।

हमें आप azadi@ccs.in पर ई-मेल कर सकते हैं।