बी.आर.
शिनॉय: सत्य की एकमात्र तलाश
लगभग
ढाई दशकों तक, प्रोफेसर शिनॉय की भारतीय आर्थिक नीति और आयोजना
पर होने वाले विचार-विमर्श पर अमिट छाप रही। व्यावसायिक और
लोकप्रिय जर्नलों में उनके द्वारा बड़ी संख्या में किए गए
लेखों के योगदान ने उन्हें विश्व स्तर पर एक अत्यंत शक्तिशाली
समालोचक के रूप में विख्यात कर दिया था, जिनके विषय में प्रोफेसर
बॉयर ने कहा था, ''डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स की बनावटी सर्वसम्मति।'
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अगर
हम कभी अमीर थे, तो आज गरीब क्यों?
जी.डी.
बिड़ला, कस्तूरभाई लालभाई और दर्जनों उद्यमियों ने युद्ध के
मध्य के सालों में महत्वपूर्ण औद्योगिक साम्राज्य बनाया। 1913
और 1938 के मध्य उत्पादन की वृद्धि 5.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष
थी, विश्व की औसत 3.3 प्रतिशत से ज्यादा। अंत में, ब्रिटिश
सरकार ने 1920 में शुल्क से सुरक्षा प्रदान की।
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बैगन
के बहाने उठे सवाल...
भारत
में यह पहला मौका नही है जब पर्यावरणविद और मॉनसेंटो आमने-सामने
खड़े हुए हैं. कपास के मामले में यह कुश्ती हम देख चुके हैं.
बैगन का भुर्ता बन चुका लेकिन इसके आगे भी कई सवाल है जिनके
जवाब खोजने की जरूरत है. जैसे भारत खाद्य सुरक्षा मसले को
किस तरह सुलझा रहा है?
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रूढ़िवादी
दखलंदाजी...
समाज
के कुछ ठेकेदार और परंपरा के पैरोकार अक्सर वैलेंटाइन डे के
दिन अति सक्रिय हो जाते हैं और अपनी राजनीति चमकाने के लिए
उन्हें भारतीय संस्कृति की याद आती हैं। समाज में परंपरा और
रुढियों के नाम पर उत्पात मचाना या फिर दूसरों की आजादी में
दखल डालना कहां तक सही है?
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