भारतीय
ग्लेशियरों पर आईपीसीसी के दावों की कलई खुली
क्लाइमेटगेट-1
ने यह खुलासा किया था कि ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी में ग्लोबल
वार्मिंग के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जलवायु वैज्ञानिकों ने
किस तरह से अपने खिलाफ जाने वाले आंकड़ों को रोककर शैक्षिक
पत्रिकाओं में अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला घोंटने
की कोशिश की थी। क्लाइमेटगेट-2 ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया
है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने
2007 की रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पिघलने
का जो दावा किया था वह विज्ञान नहीं बैठे ठाले अंधेरे में
चलाया गया एक तीर था।
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सयाना
हाथी : गुरचरण दास
जब
मैं युवा था, तब हम लोग आधुनिक और नवीन भारत के जवाहरलाल नेहरू
के सपने में गहरा विश्वास रखते थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया-
हमने पाया कि नेहरू द्वारा दिखाया गया आर्थिक रास्ता हमें
एक अन्धे मोड़ की ओर ले जा रहा है, और हमारे सारे सपने हवा
हो गए। जब हम समाजवाद की स्थापना करने निकले तो हमने पाया
कि इसके स्थान पर राज्यवाद की स्थापना हो गई है। 1960 में
जब मैं मैनेजर पद पर काम कर रहा था तब मैंने अपने आपको नौकरशाही
नियंत्रण के घने जंगल में पाया। श्रीमती गांधी के निरंकुश
शासन काल में, भ्रम से मुक्ति की हमारी समझ अपने चरम पर पहुंच
गई। राजीव गांधी के प्रधानमन्त्री बनने पर आशा की हल्की-सी
किरण दिखाई दी लेकिन वह भी अंधेरे में खो गई, जब हमने पाया
कि उनमें वह सब नहीं था, जो चाहिए था। हमारी निराशाजनक मन:स्थिति
का अन्त तब हुआ जब जुलाई 1991 में पी.वी. नरसिंह राव की अल्पमत
सरकार ने स्पष्ट उदारीकरण की नीति की घोषणा की। यह एक प्रकार
से हमारे लिए दूसरी स्वतन्त्रता थी, जिसमें हम लोग लोभी और
निरंकुश शासन से आजाद होने जा रहे थे।
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खतरे
में हैं मुक्त उद्यम : बी.आर. शिनॉय
टाटा
ने बताया, रणनीति के तहत "कुछ लोगों ने, जो कम्युनिस्ट
पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं, सरकार में महत्वपूर्ण स्थानों
पर कब्जा कर लिया। फिर हमारे आर्थिक ढांचे में मार्क्सवादी
प्रकृति के कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। लेकिन यह
प्रक्रिया इतने धीमे से लागू की गई है कि न तो बुद्धिजीवी
और न ही आम जनता ही इस शुरूआती खतरे को भांप सके हैं, जिसमें
मिश्रित अर्थव्यवस्था की जगह 'पूरी तरह से योजनाबद्ध और अनुशासनबद्ध
अर्थव्यवस्था' को सफाई से लागू किया जा रहा है।"
योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन पी. एन. हक्सर
ने इस कड़वी सच्चाई पर बेहद मुखर प्रतिक्रिया दी है। देश के
शीर्ष कारोबारी संगठन, फैडरेशन ऑफ द इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स
एंड इंडस्ट्री की सालाना बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने
कहा कि मिश्रित अर्थव्यवस्था अभी मुर्दाघर में नहीं है, लेकिन
भारी उतार-चढ़ाव झेल रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय उत्पाद
का 90 फीसदी निजी क्षेत्र से ही आता है, इसलिए टाटा की चेतावनी
में कोई दम नहीं है।
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सवालों
के घेरे में पद्म पुरस्कार...
पद्म
पुरस्कारों के बारे में हम यह जानते और मानते हैं कि विभिन्न
क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए भारत का नाम रोशन
करने, देश के विकास में उल्लेखनीय योगदान या किसी भी क्षेत्र
में देश को विशेष पहचान दिलाने पर प्रदान किए जाते हैं. ये
पुरस्कार पाने वाले नागरिक जीवन में श्रेष्ठ आचरण और अपने
काम में श्रेष्ठता प्रदर्शित करने की मिसाल माने जाते हैं.
संक्षेप में, पद्म पुरस्कार प्राप्त विभूतियों को भारतीय नागरिक
आदर्श मानते हैं. लेकिन पहले की तरह इस बार भी कुछ पद्म पुरस्कार
संदेह के दायरे में हैं और देश के विभिन्न विचार समूह इन्हें
कुछ लोगों को दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं.
क्या हम यह कह सकते हैं कि ये पुरस्कार अपनी
उस आत्मा को खो बैठे हैं जिनके मद्देनजर इन्हें शुरू किया
गया था? पुरस्कारों को जिस सोच के साथ शुरू किया गया था, आज
यह उस सोच के विपरीत कहीं कुछ लोगों को तुष्ट करने का माध्यम
तो नहीं बन गए हैं?
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