संकट,
बड़ी सरकारें और वैचारिक परिवर्तन : रॉबर्ट हिग्स
आधुनिक
मिश्रित अर्थव्यवस्था 20वीं सदी के अमेरिका के जबर्दस्त रुपांतरण
का प्रतीक है। आर्थिक इतिहासकार इस महान घटनाक्रम की अनदेखी
नहीं कर सकते। हालांकि इस दिशा में हाल तक के विश्लेषणात्मक
प्रयास सामान्य से रहे हैं। सभी बेझिझक यह मानकर ही चलते थे
कि एक तेजी से उभरती "पूंजीवादी," शहरी-औद्योगिक
अर्थव्यवस्था अंततः एक बड़ी और हस्तक्षेप करने वाली सरकार
को ही जन्म देती है। हाल ही में, सरकार के विकास के कुछ विश्लेषकों
ने कुछ और ज्यादा स्पष्ट परिकल्पना पेश की है, कुछ ने तो अपने
तर्कों को पहले से मौजूद आंकड़ों (बोरशेरिडंग 1977, मेल्टजर
और रिचर्ड 1978, पेल्ट्जमैन 1980, वेट्टर 1979)2 के तराजू
में आंकने की कोशिश की है। इस बारे में उपलब्ध अधिकांश सामग्री
मशीनी किस्म की है और यह मिश्रित अर्थव्यवस्था के एक वास्तविक
ऐतिहासिक प्रक्रिया होने को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं दे
पाती।
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व्यवस्था
बदलने के लिए दोहराना होगा कुरुक्षेत्र : गुरचरण दास
रूचिका
गिरहोत्रा की मौत व्यर्थ नहीं गई है। उसने नए और निश्चयी भारत
की नैतिक कल्पनाओं को ऊर्जावान किया है और उस विश्वास का खंडन
किया है कि हमारा मध्यम वर्ग पूरी तरह से आत्मकेंद्रित, उपभोक्तावादी
और कठोर है। उन्नीस साल पहले हुई एक घटना आज बेचैन आक्रोश
का स्रोत बन गई है। कहा जा सकता है कि हमारे देश में धर्म
गिरने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
इसकी शुरुआत 22 दिसंबर को हुई, जब एक पुलिस
अधिकारी के बारे में संक्षिप्त रिपोर्ट पढ़ने को मिली, जिसे
एक 14 साल की लड़की के साथ छेड़छाड़ करने का दोषी पाए जाने
के बाद छह माह की सजा सुनाई गई थी। उसी शाम मैंने अपने एक
मित्र से कहा कि यह कहानी भी जल्दी ही खत्म हो जाएगी। उसने
दुख के साथ अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘प्रशासन में सुधार के
लिए क्या करना होगा? क्या कुरुक्षेत्र जैसा युद्ध?’
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स्वामीनॉमिक्स
स्वामीनाथन
एस. ए. अय्यर द्वारा लिखे गये लेख जो शीर्ष बिजनेस अखबारों
में स्वामीनॉमिक्स के नाम से प्रकाशित होते हैं। इस श्रंखला
में इस बार पेश है निम्नलिखित लेख:
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कैसी
है यह शिक्षा नीति?...
भारत
में युवाओं की बढ़ती जनसंख्या और वैश्विक विकास के साथ कदम
से कदम मिलाकर चलने के लिए अधिक से अधिक शैक्षणिक संस्थानों
की जरुरत के समय में डीम्ड विश्वविद्यालयों के भविष्य पर इस
तरह का संकट पैदा कर देना वाकई कई छात्रों के लिए मुश्किल
का सबब बन सकता है। बेशक इन संस्थानों में कई खामियों की बात
कही गई है लेकिन सरकार को कोई भी कदम उठाने से पहले उसके लिए
वैकल्पिक व्यवस्था का इंतजाम भी तो कर लेना चाहिए था। अगर
सरकारी कॉलेजों और स्कूलों की हालत की बात करें तो वह बहुत
अच्छी नहीं हैं और कई जगह तो बहुत ही निराशाजनक हालात हैं।
ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी जहां खराब संस्थानों को बंद करने
की है, तो वहीं छात्रों के लिए नए विकल्पों को इंतजाम करने
की भी है।
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सवाल
जवाबदेही का...
रोजाना
125 रु. की दिहाड़ी कमाने वाला शख्स अगर 50 रु. चीनी और 22
रु. दूध पर खर्च कर देता है तो उस दिन उसके पास 53 रु. बचते
हैं। अमूमन वह रोजाना चीनी नहीं खरीदेगा। इसलिए थोड़ा आगे
बढ़ें तो एक आम आदमी के भोजन का अहम हिस्सा हैं दाव-चावल।
भारत में सबसे अधिक पसंद की जाने वाली दाल अरहर की है, ताज्जुब
यह कि इसकी कीमत भी सौ रु. प्रति किग्रा से कम नहीं है। यही
हाल सब्जियों, चावल और आटे का भी है। जो धीरे-धीरे आम आदमी
की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं।ऐसे में परिस्थितियों को
संभालने के बजाय हमारे मंत्री महोदय सिर्फ उकसाऊ बयान देने
में अधिक व्यस्त नजर आ रहे हैं। केंद्रीय मंत्री बैठकें कर
अपनी औपचारिकता पूरी कर रहे हैं. राज्यों में हो रही जमाखोरी
और कालाबाजारी का हवाला देकर तथा आपूर्ति घटने का बहाना बना
कर हर बार केंद्र सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और मंहगाई
थमने का नाम ही नहीं ले रही. विपक्ष की भूमिका इस मामले में
चौंकाने वाली है क्योंकि वोटों की राजनीति में मंहगाई को बड़ा
मुद्दा बना कर कभी जनता की आवाज को बुलंद करने के प्रयास ही
नहीं किए गए.
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