साप्ताहिक न्यूज़लेटर

15 जनवरी 2010

जानलेवा समाजवाद - स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

भारत को 1947 में जाकर आजादी मिली। 1950 में भारत ने पहले तीन दशक के लिए समाजवाद के लिहाज से योजनाएं तैयार कीं। इन नीतियों ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) विकास दर को 3.5 फीसदी और प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर को 1.49 फीसदी तक पहुंचा दिया। 60 और 70 के दशक में पूर्वी एशियन टाइगर्स(कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग) ने 7-8 फीसदी सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर हासिल की। बाद में 'मिनी टाइगर्स' के उपनाम से मशहूर दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों (थाइलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया) ने भी 7-8 फीसदी की सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर हासिल कर ली। इस तरह से भारत का समाजवाद सुस्त साबित हुआ। भारत की विश्व निर्यात में 1947 में आजादी के समय की 2.2 फीसदी की साझेदारी 1985 तक गिरकर 0.45 फीसदी हो गई, लेकिन समाजवादियों ने इसे आत्मनिर्भरता में कामयाबी के तौर पर देखा, जबकि वास्तविकता में यह कारोबार में भारी नुकसान था।

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कानून: फ्रेडरिक बास्तियात

दि कैंडलमेकर्स पेटीशन” और "दि पेरेबल ऑफ दी ब्रोकन विंडो" के साथ ही 1850 में लिखा गया निबंध "दि लॉ" फ्रेडरिक बास्तियात की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में शामिल है। "दि लॉ" चरणबद्ध तरीके से कानूनों की न्यायोचित व्यवस्था की व्याख्या करते हुए दिखाता है कि किस तरह ये कानून मुक्त समाज का सृजन करते हैं। उनका यह निबंध जॉन लॉक के "सेकंड ट्रीटीज़ ऑन गवर्नमेंट" से प्रभावित है और फिर बाद में हेनरी हेज़लिट की कृति "इकोनॉमिक्स इन वन लेसन" इससे प्रेरित है।

इस पुस्तक में बास्तियात बताते हैं "हम में से हर किसी को खुद को, अपनी आजादी और संपत्ति की रक्षा करने का भगवान से मिला प्राकृतिक अधिकार हासिल है।" इस अधिकार की रक्षा के लिए जरूरी वैयक्तिक बल के लिए राज्य आम ताकत का विकल्प मात्र है। कानून का स्वरूप उस समय विकृत हो जाता है जब यह किसी के गड़बड़ी करने के इरादे से हथियाए गए अधिकार की रक्षा के लिए किसी व्यक्ति के आत्मरक्षा के अधिकार पर प्रहार करता है।

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नैतिक तानेबाने में सेंधमारी का खामियाजा: गुरचरण दास

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को दो रुझान परिभाषित करते हैं। एक, अच्छा रुझान और दूसरा, खराब रुझान। अच्छा रुझान यह है कि उच्च आर्थिक विकास दर के फलस्वरूप समृद्धि का फैलाव होने लगा है। दूसरा रुझान भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी का है। कुछ लोग तुरंत दोनों रुझानों का संबंध जोड़ देंगे, लेकिन दरअसल दोनों अलग-अलग हैं। उच्च विकास दर आर्थिक सुधारों की परिणति है और भ्रष्टाचार की वजह यह है कि सरकारी संस्थानों में अब भी सुधार पूरी तरह क्रियान्वित नहीं हो पाए हैं।

भारतीय इतिहास में भारतीय पहली बार दरिद्रता के दौर से उबर रहे हैं और ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जब बहुसंख्य आबादी के लिए जीवन आसान हो सकेगा। ऐसा भी नहीं है कि गरीबी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, लेकिन गरीबों की संख्या काफी हद तक कम हो जाएगी और देश की राजनीति भी पूरी तरह से बदल जाएगी। यह एक अच्छी खबर है। बुरी खबर यह है कि समृद्धि फैल तो रही है, लेकिन शासन-प्रशासन की विफलता के साथ।

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बढ़ा दायरा आरटीआई का...

सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून का उद्देश्य प्रशासनिक और सरकारी जवाबदेही को सुनिश्चित करना रहा है, और अगर लोकतंत्र का कोई अंग इससे अछूता रहता तो इससे इस कानून का उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आता था।

लेकिन आरटीआइ से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया है, जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय के लिए भी सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत सूचना देना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई का कार्यालय, उनकी संपत्ति और उनके न्यायिक व्यवहार से जुड़ा हर पहलू सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में आएगा। वे इसे सार्वजनिक करने से इनकार नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस तरह खुद को अन्य न्यायाधीशों से अलग नहीं दिखा सकते। वे भी सूचना के अधिकार कानून के तहत उतने ही बाध्य हैं, जितनी दूसरी लोक संस्थाएं।

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जीवन स्तर में होता सुधार...

जब 1991 में भारत में उदारवादी नीतियों को आत्मसात किया गया तो कई तरह के कयास और आशंकाएं जताई गई थीं, लेकिन आज लगभग दो दशक की इस अवधि में भारत में आए बदलाव पूरी दुनिया से छिपे नहीं हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लंबी छलांग ने देश को एक बड़ी ताकत के रूप में उभारा है और रोजगार का सृजन भी व्यापक स्तर पर हुआ है। ऐसे में देश की प्रतिव्यक्ति आय में इजाफा भी हुआ है और इससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार होना स्वाभाविक है।

ऐसा ही कुछ खुलासा करता है, ट्रेवल पत्रिका इंटरनेशनल लीविंग का जीवन गुणवत्ता सूचकांक (Quality of Life Index) 2010। जिसके मुताबिक भारत जीवन सूचकांक के मामले में रूस और चीन जैसे देशों को पछाड़ते हुए 88वें पायदान पर आ गया है। पिछले वर्ष के मुकाबले भारत ने 35 पायदान का सुधार किया है। इस रैंकिंग के चलते भूटान के बाद भारत इस उपमहाद्वीप में रहने के लिए दूसरा सबसे उपयुक्त स्थान है। वर्ष 2009 में भारत दक्षिण एशियाई देशों में भूटान, मालदीव और श्रीलंका के बाद चौथे स्थान पर था।

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