साप्ताहिक न्यूज़लेटर

08 जनवरी 2010

बिना हस्तक्षेप मुद्रा या मुक्त बैकिंग - आर.के. अमीन

आर.के. अमीन की पुस्तक “मनी, मार्केट और मार्केटवाला” का पहला अध्याय है “बिना हस्तक्षेप मुद्रा या मुक्त बैकिंग” (Laissez-faire money or free banking)। यह पुस्तक पूंजीवाद, मुक्त बैंकिंग और बी.आर. शिनॉय तथा एफ.ए. हायक के जीवन और योगदान पर प्रकाश डालती है। इस अध्याय में विशेष रूप से इस मुद्दे को उठाया गया है कि किस तरह से अर्थव्यवस्था में पूंजी की आपूर्ति की जा सकती है। इस में सवाल उठाया गया हैः अगर मुक्त बाजार के जरिये उपभोक्ताओं के हित की अन्य वस्तुएं मुहैया कराई जाती हैं तो फिर धन की आपूर्ति बाजार द्वारा क्यों नहीं की जाती है? अगर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विनियमन (deregulation) पर मुख्य जोर है तो आखिर क्यों ऐसा बैंकिंग और फाइनेंस, मुख्य रूप से धन के प्रावधान में नहीं किया जाता है?

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राजाजीः निश्चित लक्ष्य संजोए एक व्यक्ति

राजाजी पर प्रायः अंसगत और बार-बार अपना पक्ष बदलते रहने का आरोप लगता रहा है। हम कुछ ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते हैं, जब उनका विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने गांधी और नेहरू जैसे विशिष्ट नेताओं के साथ सहमत न होने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई, परंतु इसके साथ ही वे उन्हें समझाए जाने पर अपनी विचारधारा को बदलने के लिए भी तैयार थे।

राजाजी के नाम से लोकप्रिय सी.राजगोपालाचारी की यह जीवनी प्रोफाइल्स इन करेज नाम की पुस्तक से ली गई है। राजाजी के इस जीवन परिचय में लेखक जी.नारायणस्वामी ने उनके संघर्ष, बेबाक व्यक्तित्व और फैसले लेने के निर्भीक अंदाज का बखूबी वर्णन किया है।

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हेलीकॉप्टर की मदद से गरीबी उन्मूलन - स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

राजीव गांधी का अनुमान था कि एक रुपए की सहायता राशि में से केवल 15 पैसे ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाते हैं। अर्थशास्त्री महेंद्र देव और अजित रानडे इस आंकड़े को रुपए में 21 पैसा मानते हैं। यह तो गरीबी उन्मूलन के नाम पर बर्बादी ही है।

मनमोहन सिंह ने 1991-96 के दौरान बतौर वित्तमंत्री इसी उद्देश्य के साथ रोजगार बीमा योजना (एम्प्लॉयमेंट एश्योरेंस स्कीम) लागू की थी। प्रति ग्रामीण परिवार 100 दिन का काम, योजना में पहली प्राथमिकता पिछड़े हुए जिलों को और बाद में पूरे देश में लागू। क्या इससे आर्थिक कंगाली का सामना करना पड़ा? नहीं। क्या इसने ज्यादा रोजगार दिए? हां, काम के मानवदिवस (मेनडेज ऑफ वर्क) 1990-91 के 87.50 करोड़ मानवदिवस से बढ़कर अपने सबसे अच्छे दिनों में 1995-96 में 1.23 अरब तक पहुंच गए थे।

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चुनौती शहर बचाने की...

कुछ लोग कभी-कभी ऐसा मानते हैं कि बढ़ती जनसंख्या का दबाव भारत जैसे विकासशील देश के लिए अभिशाप है। दिल्ली पुलिस के सबसे बड़े अफसर पुलिस कमिश्नर युद्धवीर सिंह ढढवाल ने भी पिछले हफ्ते दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या को बढ़ते अपराध का कारण माना है। बढ़ते अपराध रोक पाने में अपनी असफलता को पुलिस महकमा दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या के मत्थे मढ़ना चाहता है।

दरअसल, सब जानते हैं कि दिल्ली विविधताएं समेटे एक ऐसा शहर है, जो देश के दूसरे सबसे बड़े बाजार के रूप में जाना जाता है। इसकी अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है। हर ओर समृद्धि की ब्यार नजर आती है। वाकई सब कुछ कितना अच्छा है। जाहिर है अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए अवसरों की तलाश में लोग सब तरफ से दिल्ली की ओर रुख करेंगे।

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सरकार के नहीं, खुद के भरोसे...

अगर इरादे बुलंद हैं तो आप अपनी जिंदगी बदल सकते हैं. ऐसा ही कुछ गुड़गांव के निकट स्थित ताजनगर गांव के लोगों की जिजीविषा के बारे में भी कहा जा सकता है। जिन्होंने लगभग तीन दशक पहले पैदा हुई इच्छा को आज पूरा कर दिखाया है। ताजनगर रेलवे स्टेशन (रेलवे अधिकारी इसे हॉल्ट कह रहे हैं) को यहां के स्थानीय लोगों ने सरकारी मदद के बिना अपने दम पर खड़ा किया है। सरकार से स्टेशन निर्माण की आस लगाए बैठे लोगों के धैर्य ने दो साल पहले जब जवाब दे दिया तो उन्होंने स्टेशन निर्माण का बीड़ा खुद उठाया। बस, फिर क्या था एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया और उसने लोगों से चंदा लेना शुरू किया। चंदे में कम से कम 3,000 रु. लिए गए जबकि कई लोगों ने और भी ज्यादा राशि चंदे के रूप में दी।

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