साप्ताहिक न्यूज़लेटर

01 जनवरी 2010

तालीबानी मानसिकता से मुकाबला - डॉ. खलील अहमद

भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद ही, मुस्लिम लीग ने धार्मिक पहचान के आधार पर पृथकतावादी स्थिति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरु कर दिए, उनका तर्क था कि वे मुस्लिमों के लिए संवैधानिक संरक्षण सुरक्षित कराना चाहते है। लेकिन जब कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर टस से मस नहीं हुई तो मुस्लिम लीग ने अपनी मांग को आगे बढ़ाते हुए एक मुस्लिम स्टेट के रूप में पाकिस्तान के निर्माण की मांग कर डाली।

इस प्रकार, एक संवैधानिक मुद्दे को एक धार्मिक मुद्दे में मिला दिया गया। जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया, क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने एक दुविधा का सामना कियाः मुस्लिम लीग अपनी पृथक धार्मिक पहचान की मांग के नारे का इस्तेमाल कर रही थी और अब वह एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना चाहते थे, जैसा कि 11 अगस्त, 1947 के उनके भाषण से स्पष्ट होता है। यह विवाद आज की तारीख तक बरकरार है।

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लुडविग एडलर वॉन मिज़ीस - व्यक्तित्व एवं कृतित्व

लुडविग एडलर वॉन मिज़ीस मूल ऑस्ट्रियन अध्ययन-शाला के अंतिम अर्थशास्त्री थे. उन्होंने अपनी डॉक्टरेट की मानद उपाधि कानून और अर्थशास्त्र में विएना विश्वविद्यालय से 1906 में प्राप्त की. ‘मुद्रा और उधार का सिद्धांत’ (The Theory of Money and Credit) इनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है, जो 1912 में प्रकाशित हुई. मुद्रा और बैंकिंग के अध्ययन के लिए इस पुस्तक का उपयोग दो दशकों तक हुआ. मिज़ीस ने ऑस्ट्रियाई मार्जिनल यूटिलिटी थ्योरी का विस्तार करते हुए इसमें मुद्रा को भी शामिल किया. मिज़ीस के अनुसार मुद्रा की मांग वस्तुओं को खरीदने की क्षमता के लिए होती है अन्यथा इसका खुद का कोई मोल नहीं है.

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ज्यादा उम्र का मतलब कम गरीबी
- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

हर कोई इस बात को मानता है कि जिंदगी के मायने पैसे से ज्यादा कुछ और भी है। फिर भी हम जीवन स्तर को पैसों के तराजू से ही तौलते हैं। क्यों? क्योंकि गैर-मौद्रिक (नॉन-मॉनिटेरी) चीजों को मापना जरूरी भले ही हो, लेकिन आसान कतई नहीं है। आप सांप्रदायिक शांति की कीमत को कैसे मापेंगे? या फिर लोकतंत्र की? हम स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे सामाजिक संकेतकों को माप सकते हैं, लेकिन उनका मूल्य तय करने में परेशानी का सामना कर सकते हैं। यही वजह है कि भारत में गरीबी या आर्थिक विकास की चर्चा हमारी उपभोग की क्षमता और आय पर ही केंद्रित होती है। इंसान जिंदगी को सबसे कीमती मानता है। अमेरिकी अपनी पूरी जिंदगी के खर्च का 90 फीसदी बुढ़ापे में अपने स्वास्थ्य की देखभाल पर खर्च करते हैं। जिंदगी को कुछ और साल खींच लेने के लिए जिंदगी की कमाई झोंक देना कोई बड़ा खर्च नहीं लगता।

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सत्ता का खेल ...

देखा जाए तो नवंबर 2000 में झारखंड का गठन होने के बाद से राज्य में छह मुख्यमंत्री हो चुके हैं और कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लागू रह चुका है। इस सबके पीछे कारण जनता द्वारा खंडित जनादेश ही रहा है।

झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों ने एक बार फिर दिखा दिया है भारतीय राजनीति में किस तरह से पदलोलुपता सर्वोपरि है। सीटों के मामले में कुछ सौभाग्यशाली रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन एकदम से आगे आए और उन्होंने यह शर्त रखकर सबको हैरत में डाल दिया कि उनकी पार्टी उसी को समर्थन देगी जो मुख्यमंत्री पद के उनके दावे का समर्थन करेंगी। यानि एकमात्र उद्देश्य सत्ता पर काबिज होना।

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दर्ज होगा गुनाह का ब्यौरा...

देश के किसी भी हिस्से में अपराध नई बात नहीं है। असुरक्षा हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। देश के ऐसे कई शहर हैं जहां घर में ताला लगा कर आप किसी काम से गए नहीं कि ताला अब टूटा, तब टूटा, सोने की चेन या मंगल-सूत्र खींचने के लिए बाइक पर नौजवान बेधड़क घूम रहे हैं। यह तो हुई चोरों, उठाइगिरों की बात। लेकिन उनका क्या जो कानून के रखवाले कहे जाते हैं और वही उच्च पदस्थ अधिकारी और नेता कभी किसी की अस्मिता तो किसी की जमा-पूंजी लूटने से बिल्कुल नहीं घबराते क्योंकि उनके खिलाफ आप थाने में रपट तक नहीं लिखवा सकते।

भारत सरकार अब थाने में अपराध के खिलाफ सभी शिकायतों को प्राथमिकी बनाने की दिशा में काम कर रही है। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक परिपत्र जारी करने का निर्णय लिया है, जिसमें उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा जाएगा कि थानों को मिलने वाली सभी शिकायतों को एफआइआर के तौर पर समझा जाए। एफआइआर नहीं लिखने वाले वर्दीधारियों के खिलाफ कार्यवाही की बात भी कही गई है।

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