साप्ताहिक न्यूज़लेटर

25 दिसम्बर 2009

आदर्श मुद्रा की तलाश में... - हेनरी हेजलिट

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे भारी उतार-चढ़ाव देखने वाली विनिमय दर का कोई खुले तौर पर बचाव नहीं करता। भविष्य के आयात, निर्यात और घरेलू दामों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी इसी दायरे में आते हैं।

और पढ़ें [+]

कोपेनहेगन कवायद के मायने

जलवायु परिवर्तन पर बारह दिनों तक चले कोपेनहेगन सम्मेलन के बारे में कहा जा रहा है कि किसी बड़े समझौते को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन सकी। अलग-अलग पृष्ठभूमि के देश और उनकी अलग-अलग उम्मीदें, लेकिन हितों को साधने में कामयाबी या नाकामयाबी के आधार पर समापन के बाद सम्मेलन पर स्वाभाविक रूप से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं।

सम्मेलन के अंतिम दिन अमेरिकी नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन पर एक समझौता हुआ, जिस पर अमेरिका समेत ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन (बेसिक) ने अपनी रजामंदी जताई।

और पढ़ें [+]

कार्ल मेन्गर - व्यक्तित्व एवं कृतित्व

मेन्गर ने यह भी स्पष्टीकरण दिया कि मुद्रा का विकास किस तरह हुआ और जो आज तक सर्वमान्य है. उनका मानना था कि व्यक्ति यदि अदला-बदली के सिद्धांत का महज उपयोग करते थे तब उन्हें अपनी पसंद या जरूरत की वस्तु दो या तीन विनिमय में मिलती थी. उदाहरण के लिए यदि किसी के पास लैंप है और उसके बदले उन्हें कुर्सियां चाहिए तो उन्हें सीधे कुर्सियां प्राप्त नहीं होती थी. उसके लिए उन्हें एक या दो विनिमय करने पड़ते थे, जो एक बड़ी बाधा थी. लोगों का मानना था कि इस बाधा को दूर किया जा सकता था. यदि उनके पास कोई ऐसी चीज जो सर्वमान्य हो तथा जिसका उपयोग वे अपनी जरूरत की वस्तु को क्रय करने के लिए कर सकते. वह वस्तु जो सर्वमान्य थी, मुद्रा के रूप में विकसित हुई.

और पढ़ें [+]

सेंसरशिप से जलवायु परिवर्तन पर सच्चाई खतरे में
- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

सेंसरशिप को हमेशा ही कथित रूप से जनता की भलाई में लागू किया जाता है ताकि लोगों की सोच को बेफजूल के विचारों से प्रभावित होने से बचाया जा सके। वास्तविकता में तो सेंसरशिप विरोधियों के मुंह पर ताला जड़कर एक कृत्रिम सच को तैयार करने की ताकतवर लोगों की एक चाल है।

जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) के एक सदस्य पैट्रिक माइकल्स का आरोप है कि जलवायु प्रतिष्ठान (climate establishment) भी एक ऐसी कृत्रिम सहमति बनाने का प्रयास कर रहा है। इसके तहत शैक्षिक पत्रिकाओं से बड़ी सफाई से लेखों को सेंसर या खारिज किया जा रहा है, विरोध के स्वरों को दबाया जा रहा है।

और पढ़ें [+]

हाथों में काम की बजाए कटोरा...

बेशक सरकार अब विश्व के सबसे पुरानी सामाजिक बुराइयों मे एक से लड़ने के लिए मुस्तैदी दिखा रही हो, लेकिन अब भी सड़क किनारे भिखारियों की संख्या मे कोई कमी नजर नहीं दिखती। बल्कि समय के साथ यह और संगठित और फैलता हुआ एक व्यवसाय नजर आने लगा है। कुछ लोग धर्म के बहाने आम लोगों की जेब ढीली करने के प्रयासों में जुटे हैं।

कई एजेंसियों के सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि भीख मांगने वाले इन लोगों में कई तो पढ़े-लिखे युवा भी हैं, जो कि रोजाना कम से कम 100 रु. तो कमा ही रहे हैं। अगस्त माह में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा था कि वह देश की राजधानी में भिखारियों की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए कारगर कदम उठाए। कोर्ट ने इसके लिए हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार से बात करके कोई हल निकालने के लिए भी कहा था। लेकिन इस दिशा में बहुत ठोस कुछ होता नजर नहीं आया।

और पढ़ें [+]

आज़ादी फेसबुक पर
आज़ादी ट्विटर पर
आज़ादी का हिस्सा बनें

आप अपने लेख, पुस्तकें, विषय आधारित दिलचस्प और सूचनापरक तस्वीरें, चित्र और अपनी पुस्तकें एवं सुझाव हमें भेज सकते हैं। जिनका चयन करने के बाद हमें उन्हें अपनी वेबसाइट पर डालेंगे। इसके अलावा आप हमारे ब्लॉग के लिए भी प्रासंगिक विषयों पर लिख सकते हैं।

हमें आप azadi@ccs.in पर ई-मेल कर सकते हैं।