साप्ताहिक न्यूज़लेटर

18 दिसम्बर 2009

ग्लोबल वार्मिंगः जलवायु का विज्ञान - एमेन्युअल मार्टिन

अब जबकि क्लाइमेट गेट ने जलवायु परिवर्तन के मूल को लेकर चर्चा में तेजी ला दी है। यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिर विज्ञान क्या है? यहां कोपेनहेगन में मौजूद नीति निर्धारकों के लिए कुछ विचार पेश हैं।

विज्ञान आलोचना के जरिए ज्ञान हासिल करने की एक प्रक्रिया है। सिद्धांत पेश किए जाते हैं और उनको परखा जाता है और जिनमें खामियां होती हैं, उनको या तो खारिज कर दिया जाता है या फिर उनका नए सिरे से अध्ययन किया जाता है। इस तरह से विज्ञान परीक्षण-गलती-सुधार की प्रक्रिया से होते हुए प्रगति करता है। बात किसी भी वक्त की हो, विज्ञान में बहस की दो श्रेणियां होती हैं। पहली वो जिसे पर्याप्त आधार के साथ स्थापित किया गया हो और जिस पर कोई विवाद न हो (उदाहरण के लिए, यह दावा कि धरती सपाट नहीं है)। दूसरी वह होती है जिसमें कुछ मसलों पर विवाद कायम हो और जिनको अभी और परीक्षण की दरकार हो।

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नोबेल पुरस्कार विजेता - गैरी एस. बेकर

बेकर ने अपने सिद्धांत का प्रयोग “अपराध और सजा” के क्षेत्र में भी किया। उसका अनुमान है कि कुछ सीमित संख्या में मनोरोगियों को छोड़कर जो व्यक्ति अपराधी के रूप में व्यवहार करते हैं वे आपराधिक गतिविधियों की लागतों और लाभों के रूप में विभिन्न प्रोत्साहनों के बारे में पूर्वानुमेय तरीकों से प्रतिक्रिया करते हैं। ऐसा लगता है कि इस सिद्धांत से नागरिकों के समूहों के बारे में वास्तविक पूर्वकथन प्राप्त होते हैं कि उनमें से किससे विशेष प्रकार के अपराध करने की प्रत्याशा की जाती है। इस सिद्धांत के संबंध में किए गए अनुभवसिद्ध अध्ययनों से यह भी सूचित होता है कि सिद्ध दोष किए जाने की संभावना से अपराध पर सजा की कड़ाई की तुलना में अधिक निराशाजनक प्रभाव होता है।

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एडम स्मिथ - व्यक्तित्व एवं कृतित्व

आज स्मिथ की ख्याति उनकी इस व्याख्या के कारण है कि मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था में कैसे तार्किक स्वार्थ भी आर्थिक तरक्की का कारण बन सकता है। ये उन लोगों को चौंका सकता है जो स्मिथ को उनके नीति शास्त्र और भलाई पर आधारित उनके शुरूआती काम के लिए जानते हैं। वे तो उन्हें एक निष्ठुर व्यक्तिवादी मानते थे। वास्तविकता में यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में स्मिथ ने जिन विषयों पर लेक्चर दिए जैसे- प्राकृतिक धर्मशास्त्र (नेचुरल थियालॉजी), नीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र और अर्थशास्त्र। ये खुलासा उस दौरान उनके छात्र रह चुके जॉन मिलर ने किया है।

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मुफ्त बिजली, मुफ्त नहीं है- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

सभी लोकतंत्रों में लोकप्रिय और कंगाल सरकारें नहीं होतीं। निश्चित ही लोग तो यही चाहेंगे कि उनको कुछ देने की बजाय लगभग हर चीज मुफ्त मिल जाए। लेकिन राजनीतिज्ञों (और मीडिया) को लोगों को यह बात समझानी चाहिए कि बिजली आसमान से गिरने वाली बारिश की तरह मुफ्त नहीं बरसती। इसके उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण में काफी खर्च आता है।

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खेल बंटवारे का...

जैसा होता आया है, वैसा ही हुआ। एक जिद्दी बच्चे की जिद पूरी हो जाए तो बाकी बच्चे भी उसकी देखा-देखी में जिद करने लगते हैं और फिर बात हाथ से बाहर हो जाती है। ऐसा ही कुछ इन दिनों तेलंगाना के मामले में भी हुआ। अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की केंद्र सरकार की हरी झंडी के बाद अब न सिर्फ आंध्र प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी अलग राज्य के गठन की मांग के स्वर मुखर होने लगे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 11 दिसंबर को लखनऊ में छोटे राज्यों की वकालत करते हुए राज्य का समर्थन कर डाला। खास यह कि उन्होंने हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के गठन पर अपनी सहमति भी जता दी।

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जीने के अधिकार पर प्रहार ...

सबसे अहम होता है जीने का अधिकार, फिर चाहे वह एक आम आदमी हो या फिर जेल या थाने में बंद कोई अपराधी ही क्यों न हो। उसके मानवाधिकार पर प्रहार सभ्य समाज के लिए सबसे दुखदायी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी कानून-व्यवस्था में कुछ ऐसी खामियां है जो समय-समय पर उजागर होकर हमारी आंखें खोल देती हैं।

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