साप्ताहिक न्यूज़लेटर

11 दिसम्बर 2009

विशेष: क्यों अहम है कोपेनहेगन सम्मेलन

मुख्य समस्या विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु परिवर्तन के मामले पर एक-दूसरे के साथ विचार न मिलने और मौजूदा संदर्भ में हितों के टकराव की है। जहां एक ओर विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन पर रोक लगाएं, वहीं दूसरी ओर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं या विकासशील देश विकसित देशों से चाहते हैं कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अधिक कटौतियां स्वीकार करने के अलावा अनुकूलन और उपशमन कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता के साथ-साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी करें। विकसित देश अभी तक इन दोनों मुद्दों पर विफल रहे हैं।

अगर भारत की बाद करें तो वह पहले ही यह साफ कर चुका है कि वह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लेकर किसी भी तरह के सशर्त प्रतिबंध को स्वीकार नहीं कर सकता। महत्वपूर्ण बात यह कि भारत ने जलवायु में हो रहे परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना 30 जून, 2008 में ही जारी कर दी थी।

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फ्रैडरिक बैस्टिएट - व्यक्तित्व एवं कृतित्व

1848 की क्रांति की नेशनल असेंबली में फ्रैडरिक बैस्टिएट एक उदारवादी (लिबरल) सदस्य थे। बैस्टिएट फ्रेंच फ्री ट्रेड एसोसिएशन के प्रमुख और विक्टर ह्यूगो के साथ एक अंतरराष्ट्रीय शांति संगठन के प्रवर्तक थे। लेकिन इससे भी बढ़ कर, जोसेफ शम्पटर के शब्दों में 'बैस्टिएट आर्थिक मामलों में आज तक हुए सबसे प्रतिभावान पत्रकार' थे। बैस्टिएट ने आर्थिक सिद्धांत में कुछ उल्लेखनीय योगदान दिए थे।

उनको आज उनके व्यंग्य 'द पिटिशन ऑफ द केंडलमेकर्स' के लिए जाना जाता है। 1846 में लिखे गए इस व्यंग्य में मोमबत्ती बनाने वालों का एक समूह सरकार के सामने सूरज से मिल रही अनुचित (अनफेयर) प्रतिस्पर्धा से बचाने की गुहार लगाता है। संरक्षणवाद की इतने सधे हुए शब्दों में खिल्ली उड़ाने वाला दूसरा व्यंग्य मिलना मुश्किल है।

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स्वामीनॉमिक्स का जन्म - स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

स्वामीनॉमिक्स के 10 साल पूरे हो गए हैं. जब मैंने एक दशक पहले इस कॉलम की शुरुआत की थी तब मेरे बारे में ज्यादातर यह कहा जाता था कि मैं विद्रोही हूं और बगैर सावधानी बरते परंपरागत समाजवादी विचारों पर निशाना साधते हुए उसकी आलोचना करता हूं. आज मैं यह देखकर चकित हूं कि अब मुझे मुख्यधारा का लेखक समझा जाने लगा है. 10 वर्ष पहले आर्थिक सुधारों को कितना ज्यादा असंभव माना जाता था. लंदन की पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 1991 में अपनी आवरण कथा में भारत को “पिंजरे में बंद शेर” बताते हुए लिखा था कि इसके बाहर आने की कोई संभावना नहीं है.

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कठिन है राहगुजर....

सुबह के साढ़े नौ बजे, दिल्ली का कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन भीड़ के समुद्र से पटा पड़ा है। कुछ युवा, इनमें से कुछ प्रेमी और कुछ अमूमन खाली बिरादरी के लोग यहां-वहां सीढ़ियों पर डेरा डाले बैठे हैं।

जाहिर है, ये भागमभाग कर रही कुछ यात्रियों की राह का रोड़ा भी बन रहे हैं। भीड़ का यही स्वभाव है। मेट्रो की सवारी में भीड़ तंत्र ने जैसे चैन छीन लिया है। गाड़ी आती है, सवारियां बेतहाशा दौड़ती हैं, जैसे आज की यह आखिरी गाड़ी हो। गाड़ी का दरवाजा खुलता है, लोगों की लगी हुई लाइन टूट कर बिखर जाती है, धक्का-मुक्की, रेलम-पेल के बीच दरवाजे को निशाना बना कर लोग चढ़ने लगते हैं, रुकते ही नहीं, दरवाजा बंद होने तक यह जद्दोजहद खत्म नहीं होती। बमुश्किल दरवाजा बंद होता है, ट्रेन को आगे ले जाने के लिए। फिर भी, लोग हैं कि मानते ही नहीं।

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