कठिन
है राहगुजर....
सुबह
के साढ़े नौ बजे, दिल्ली का कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन भीड़
के समुद्र से पटा पड़ा है। कुछ युवा, इनमें से कुछ प्रेमी
और कुछ अमूमन खाली बिरादरी के लोग यहां-वहां सीढ़ियों पर
डेरा डाले बैठे हैं।
जाहिर है, ये भागमभाग कर रही कुछ यात्रियों
की राह का रोड़ा भी बन रहे हैं। भीड़ का यही स्वभाव है।
मेट्रो की सवारी में भीड़ तंत्र ने जैसे चैन छीन लिया है।
गाड़ी आती है, सवारियां बेतहाशा दौड़ती हैं, जैसे आज की
यह आखिरी गाड़ी हो। गाड़ी का दरवाजा खुलता है, लोगों की
लगी हुई लाइन टूट कर बिखर जाती है, धक्का-मुक्की, रेलम-पेल
के बीच दरवाजे को निशाना बना कर लोग चढ़ने लगते हैं, रुकते
ही नहीं, दरवाजा बंद होने तक यह जद्दोजहद खत्म नहीं होती।
बमुश्किल दरवाजा बंद होता है, ट्रेन को आगे ले जाने के लिए।
फिर भी, लोग हैं कि मानते ही नहीं।
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