जीडीपी का नया आधारः नवीन पैमाने उचित तो हैं...

भारत के केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन ने फरवरी माह से जीडीपी आदि को मापने के लिए आधार वष्ाü 2011 -12 कर दिया है। इसके बाद वर्ष 2013-14 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के आंकड़े एक झटके में 2.2 तक बढ़ गए। 
 
जमीनी हालात बदले बिना ही अर्थव्यवस्था की तस्वीर अचानक ही बेहतर दिखने लग गई है। वित्त मंत्री अरूण जेटली अपना पहला पूर्ण बजट भी इसी पृष्ठभूमि में पेश करेंगे। क्यों बदले गए हैं जीडीपी मापने के ये पैमाने और क्या होगा अर्थव्यवस्था पर इसका असर। प्रस्तुत है, राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित सीसीएस के कुमार आनंद की टिप्पणी :
 
प्रासंगिक हैं नवीन पैमाने
 
 
समय के अनुसार अर्थव्यवस्था की संरचना बदलती रहती है। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता के समय भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का हिस्सा सबसे बड़ा था इसलिए उस समय जीडीपी मापने की प्रक्रिया में कृषि को अधिक वजन दिया जाता था। इसको ध्यान में रखते हुए सरकार कुछ वर्षो के अंतराल में जीडीपी मापने के लिए आधारवर्ष बदल देती हैं जिससे सभी समसामयिक और प्रासंगिक उद्योगों को जीडीपी मापने में शामिल किया जा सके। आधार वर्ष वह वर्ष होता है जिस वर्ष की तुलना में उस वर्ष तथा उसके बाद के वर्षो के जीडीपी को मापा जाता है।
 
स्वतंत्रता के बाद से भारत में छठी बार यह आधार वर्ष बदला गया है। आधार वर्ष चुनते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि चुना गया वर्ष अपेक्षाकृत स्थिरता वाला हो। अर्थात उस वर्ष अर्थव्यवस्था में ज्यादा उथल-पुथल नहीं हुई हो। जैसे वह वर्ष मंदी का वर्ष न हो और न ही बहुत तेजी का। यह भी ध्यान रखा जाता है कि मुद्रास्फीति भी उस वर्ष असामान्य नहीं रही हो। केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने कहा है कि अब हर पांच वर्ष में आधार वर्ष बदला जाएगा। अर्थात अब अगली बार साल 2020-21 में आधार वष्ाü बदला जाएगा।
 
व्यापक और सटीक होंगे आंकड़े
 
आधार वर्ष 2011-12 को बनाने के साथ जीडीपी आदि के आंकड़ों को प्रामाणिक बनाने की दिशा में भी कुछ कदम उठाए गए हैं। जीडीपी के मापने के लिए सीएसओ अब तक चुनिंदा 25000 कंपनियों के डाटा पर निर्भर रहता था पर अब कंपनी मंत्रालय में पंजीकृत 5 लाख कंपनियों के आधार पर मैन्युफैक्चरिंग आदि की वृद्धि दर मापी जाएगी। इस तरह अब जो आंकड़े प्राप्त होंगे वो कहीं व्यापक और पूर्ण होंगे।
 
दूसरे अब आंकड़ों में अर्थव्यवस्था की सटीक तस्वीर उभरेगी। वह इसलिए कि अब उन उद्योगों और सेक्टरों के आंकड़े भी वृद्धि दर में प्रतिबिंबित होगे जो कि 2004-05 के बाद से 2011-12 के बीच पनपे और बढ़े हैं। साथ ही ये आंकड़े अब अंतरराष्ट्रीय रूप से तुलनात्मक भी होंगे। सारी दुनिया में जीडीपी को "फैक्टर कॉस्ट" पर न मापकर बाजार भाव पर ही मापा जाता है। पर भारत लंबे समय से जीडीपी को फैक्टर कॉस्ट पर ही मापता आ रहा था। अब भारत भी जीडीपी को फैक्टर कॉस्ट पर ही मापेगा। इसलिए अब भारत के आंकड़ों की तुलना दुनिया के किसी भी देश से आसानी से की जा सकती है। इन आंकड़ों का असर मुद्रास्फीति और राजस्व घाटे पर भी दिखेगा। जब पैमाने बदलने से जीडीपी का आकार बदलेगा तो जीडीपी के अनुपात में निकाले जाने वाले आंकड़े जैसे मुद्रास्फीति और राजस्व घाटे भी बदलेंगे।
 
अभी और परिवर्तन करने होंगे
 
पर यह परिवर्तन अभी पूर्ण नहीं हुआ है। इसमें अभी कुछ असंगतियां देखी जा सकती है, जिनकी ओर आलोचकों ने इशारा भी किया है। अभी हमने "इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रॉडक्शन" तथा ग्रॉस फिक्सड कैपिटल फॉरमेशन अर्थात निवेश के पैमाने नहीं बदले हैं। इसलिए जीडीपी तो अपेक्षाकृत बेहतर दिख रहा है पर औद्योगिक उत्पादन और निवेश के आंकड़े उतने सकारात्मक नहीं दिख रहे। दोनों आंकड़ों में संगति नहीं है। इसलिए अभी जीडीपी के नए आंकड़ों की विश्वसनीयता पर कुछ लोगों को भरोसा नहीं हो रहा है और वे इन आंकड़ों पर सवाल उठा रहे हैं। 
 
 
- कुमार आनंद (सेंटर फॉर सिविल सोसायटी)