शिक्षा क्षेत्र में निवेश की बजाए परिणाम आधारित नीति होगी कारगर

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक बार फिर से राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। जून के अंतिम सप्ताह में इस संबंध में नौ सदस्यीय समिति का गठन कर दिया गया। जाने माने वैज्ञानिक व 1994 से 2003 तक इंडियन स्पेश रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के चेयरमैन रहे पद्मश्री व पद्म विभूषण के. कस्तूरीरंगन को समिति की अध्यक्षता सौंपी गई है। एसएनडीटी यूनिवर्सिटी, मुंबई की पूर्व कुलपति डा. वसुधा कामत, केरल के दो जिलों को सौ फीसदी साक्षर बनाने में महती भूमिका निभाने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी के.जे. अलफोंसेए, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, अमेरिका की गणित की प्रोफेसर डा. मंजुल भार्गव, पूर्व आईएएस व बाबा साहेब अंबेडकर सोशल साइंस यूनिवर्सिटी, महू के कुलपति डा. रमाशंकर कुरील, अमरकंटक स्थित ट्राइबल यूनिवर्सिटी के कुलपति डा. टी.वी. कट्टीमानी, उत्तर प्रदेश माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व चेयरमैन कृष्णमोहन त्रिपाठी, गुवाहाटी विश्वविद्यालय के फारसी भाषा के प्रोफेसर डा. मजहर आसिफ व कर्नाटक इनोवेशन काउंसिल, दिव्यांग के पूर्व सदस्य सचिव डा. एम.के. श्रीधर समिति के अन्य सदस्य बनाए गए हैं।

निःसंदेह नामित समस्त सदस्यों का प्रोफाइल अत्यंत प्रभावशाली रहा है और प्रथम दृष्टया यह समिति पूर्व मानव संसाधन एवं विकास मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा गठित टीएसआर सुब्रमण्यम समिति से अधिक सक्षम नजर आ रही है। हालांकि इस समिति के गठन के दौरान भी निजी स्कूलों का प्रतिनिधित्व शामिल करने के लंबे समय से उठ रही मांग की अनदेखी की गई है। निजी स्कूलों विशेषकर छोटे व कम शुल्क वाले बजट स्कूलों; जिनकी हिस्सेदारी कुल निजी स्कूलों की संख्या के 90 प्रतिशत से भी अधिक है, के द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तैयार करने की प्रक्रिया में उनके प्रतिनिधित्व को सम्मिलित करने की मांग लगातार की जाती रही है।

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से देश में स्कूली शिक्षा लगातार चर्चा में रही लेकिन गलत कारणों से। कानूनी जटिलताओं और इसके पूर्वप्रभावी (रेट्रोस्पेक्टिव) होने के कारण एक तरफ जहां देश भर से बड़ी तादात में छोटे निजी स्कूलों के बंद होने की खबरें आयीं वहीं सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में जबरदस्त गिरावट आयी। स्थिति ऐसी हो गई कि बड़ी तादात में सरकारी स्कूलों को बंद (सरकारी भाषा में विलय) करना पड़ा। तमाम सरकारी व गैर सरकारी अध्ययनों ने सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता पर सवालिया निशान उठाएं हैं जबकि प्रति छात्र वहां लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

डिस्ट्रिक्ट इंफोर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (डाइस) द्वारा 21 राज्यों से एकत्रित किए गए आंकड़ों के मुताबिक आरटीई लागू होने के चार साल (2010-2014) बाद सरकारी स्कूलों की संख्या में 13,498 का इज़ाफा हुआ लेकिन सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में 1.13 करोड़ की गिरावट दर्ज हुई। इसके विपरीत इसी दरम्यान निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या 1.85 करोड़ बढ़ गयी। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रो. गीता गांधी किंगडन के एक शोधपत्र के मुताबिक वर्ष 2014-15 में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल ऐसे रहें जिनमें दाखिला लेने वाले छात्रों की औसत संख्या 12.7 रही, जबकि कक्षाओं में प्रति शिक्षक, छात्रों की संख्या औसतन 6.7 रही।

स्कूलों में शिक्षा का स्तर जहां कम हुआ वहीं शिक्षकों के वेतन में भी अंधाधुंध वृद्धि दर्ज की गई। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (न्यूपा) के मुताबिक वर्ष 2014 में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की औसत तन्ख्वाह 4.8 लाख थी जो कि भारत की प्रति व्यक्ति आय की सात गुना है। जबकि हमारे अन्य पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में शिक्षकों की तन्ख्वाह देश की प्रति व्यक्ति व्यक्ति आय के दोगुने से भी कम है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का नियमन इस बीमारी को सुधारने के लिए सदी में एक बार मिलनेवाले मौके की तरह ही अवसर प्रदान करता हैं। अधिकांश मौकों पर गुणवत्ता सुधारने के लिए नीतियां इनपुट (निवेश) तक ही सीमित होकर रह जाती हैं और समितियां अध्यापकों की संख्या बढ़ाने, वेतन बढ़ाने, मेजों और कुर्सियां उपलब्ध कराने जैसे उपायों तक ही उलझ कर रह जाती हैं। दुखद बात ये हैं कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत भारत में इनपुट को बढ़ानेवाली नीतियों को बहुत अधिक विधायी बल मिला हुआ है। ये नीतियां उत्तरदायित्व को अनदेखा करने का काम करती हैं। यह एक स्वर्णिम मौका है और यदि नवगठित समिति नीतियों को अपने पूर्वर्तियों की तरह इनपुट की बजाए आऊटपुट पर केंद्रीत करती है जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाया जाता है तो कोई कारण नहीं कि देश की स्कूली शिक्षा में सुधार न हो। चूंकि छोटे निजी स्कूल सीमित संसाधनों में भी बेहतर परिणाम दे रहे हैं इसलिए उनसे रायशुमारी शिक्षा की बेहतरी का ही काम करेगी।

- अविनाश चंद्र (लेखक आजादी.मी के संपादक हैं)

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