सुधार के लिए तटस्थ एवं स्वतंत्र नियामक जरूरी

पिछले लगभग दो महीनों तक देश ताबड़तोड़ क्रिकेट के 20-ट्वेंटी फार्मेट वाले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के रंग में रंगा है। इस दौरान कई मैच रोमांच की चरम सीमा तक पहुंचे और खेल अंतिम गेंद तक पहुंचा। कई युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने और राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं को प्रभावित करने का मौका भी मिला। मैच दर मैच ऐसे ऐसे इनोवेटिव शॉट्स लगातार देखने को मिलें जो आमतौर पर कम ही देखने को मिलते हैं। गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण सहित सभी क्षेत्रों में खिलाड़ियों के अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिले। ऐसे ऐसे कैच भी पकड़े गए जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक ऐसा ही अकल्पनीय कैच दिल्ली डेयर-डेविल्स के खिलाड़ी ट्रेट बोल्ट ने रॉयल चैलेंजेस बैंग्लोर के कप्तान विराट कोहली का पकड़ा। बोल्ट ने उछलते हुए यह कैच बाऊंड्री के महज 8 सेमी पहले पकड़ा।पहली बार में देखकर न तो कोहली को इसका विश्वास हुआ न ही मैदान पर मौजूद हजारों दर्शकों की भीड़ को। भला हो क्रिकेट के खेल में नित नए तकनीकिगत प्रयोग के उस कमाल का जिसने बाऊंड्री फेंस और बॉल के बीच की अत्यंत सूक्ष्म दूरी का भी पता लगा लिया, अन्यथा अंपायर के विवेक के आधार पर यदि फैसला हुआ होता तो किसी न किसी टीम के साथ अवश्य नाइंसाफी हुई होती। यह बात और है कि इसमें अंपायर की गलती नहीं दी जा सकती थी।

हालांकि एक दौर वह भी था जब क्रिकेट में तकनीकि का प्रयोग तो दूर तटस्थ अंपायर भी रखने का प्रचलन नहीं हुआ करता था। उस दौर में स्थानीय अंपायर घरेलू टीम का सपोर्ट करने और मेहमान टीम के खिलाफ फैसले देने के लिए बदनाम हुआ करते थे। गलत अंपायरिंग के कई मामले तो इतने बिगड़ गए कि दो देशों के बीच आर्थिक और राजनैतिक संबंधों में भी खटास आने लगी थी। ऐसा ही एक उदाहरण इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच 1987 में खेली गई टेस्ट सीरिज का है। पहले टेस्ट में खराब अंपायरिंग का खामियाजा भुगत चुकी इंग्लैंड की टीम ने फैसलाबाद में हुए दूसरे टेस्ट में कड़े तेवर दिखाए। इंग्लैंड के कप्तान माइक गेटिंग और पाकिस्तानी अंपायर शकूर राना के बीच तनातनी का वह वाक्या क्रिकेट के सर्वाधिक कुख्यात विवादों में शुमार है। ऑस्ट्रेलियाई अंपायर डारेल हेयर और श्रीलंकाई फिरकी गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन के बीच नो बॉल का विवाद भी जबरदस्त सुर्खियों में रहा। शुक्र है कि 90 के दशक में अंपायरिंग के लिए तटस्थ देशों के अंपायरों को रखे जाने का चलन शुरू हुआ और ऐसे मामलों को रोकने में कामयाबी मिली।

अर्थशास्त्रियों अभिनव सचेटी, डेविड पैटन और इयान ग्रेगरी स्मिथ द्वारा रॉयल स्टेटिस्टिकल सोसायटी नामक जर्नल में तटस्थ देशों के अंपायरों को रखे जाने के चलन शुरू होने और उसके पूर्व (1986 से 2012 के बीच) के 1000 टेस्ट मैचों की विवेचना और आंकड़ें प्रकाशित किए गए। पाया गया कि जिन मैचों में दोनों घरेलू अंपायरों ने अंपायरिंग की थी उनमें घरेलू टीम के मुकाबले मेहमान टीम के 16% अधिक खिलाड़ी पगबाधा (एलबीडब्ल्यू) आऊट करार दिए गए। जो मैच एक घरेलू अंपायर और एक तटस्थ अंपायर के साथ खेले गए उनमें घरेलू टीम के मुकाबले मेहमान टीम के 10% अधिक खिलाड़ी पगबाधा (एलबीडब्ल्यू) आऊट करार दिए गए। आश्चर्यजनक रूप से जिन मैचों में दोनों अंपायर तटस्थ देशों के रहें उनमें पगबाधा आऊट दिए जाने के मामले मेजबान और मेहमान टीम दोनों के लिए समान रहे। सोचिए, क्या क्रिकेट में अंपायरिंक के दौरान पक्षपात जारी रहता तो यह खेल आज जीवित होता? इस खेल का रोमांच आज भी बरकरार है तो वह इसलिए कि इसमें बिना भेदभाव के श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली टीम को विजयश्री हासिल होती है।

आज खेल का स्तर और खेल में तकनीकि के प्रयोग दोनों उस ऊंचाई पर पहुंच गए हैं जहां तकनीकि व तटस्थ अंपायरों के बिना खेलने की कल्पना कोई टीम तो क्या दर्शक भी नहीं कर सकते। तकनीकि रूप से सुसज्जित अंपायरों और टीवी अंपायर होने के बावजूद यदि खिलाड़ी किसी फैसले से संतुष्ट नहीं है तो उसे अब डीआरएस (अंपायर के फैसले पर रिव्यू) लेने की भी आजादी है। क्योंकि सबको पता है कि एक गलत निर्णय पूरे मैच को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इतना सबकुछ होने के बावजूद किसी तकनीकि खामी या अंपायर के कारण यदि ग्राऊंड पर कोई फैसला गलत ले लिया जाता है तो वैश्विक स्तर पर इसकी चर्चा होती है।

कैसा हो, यदि दो प्रतिस्पर्धी टीमों के बीच खेल का मुकाबला हो और सभी नियम कानून सिर्फ मेहमान टीम के ऊपर ही लागू हो और मेजबान टीम को नियम के दायरे से बाहर रखा जाए? क्या हो, यदि मेजबान टीम का कप्तान ही ये तय करे कि मेहमान टीम में कौन सी योग्यता वाले खिलाड़ी खेलेंगे? क्या हो यदि मेजबान टीम का कप्तान ही ये तय करे कि उनकी टीम की बल्लेबाजी के दौरान विपक्षी टीम के फिल्डर कहां खड़े रहेंगे और कौन सा गेंदबाज कब गेंदबाजी करेगा? क्या हो यदि मेजबान टीम का कप्तान, नॉन प्लेइंग इलेवन के खिलाड़ियों को ग्राऊंड अंपायर, थर्ड अंपायर, मैच रेफरी आदि नियुक्त करे तो..!
उपरोक्त सभी प्रश्नों का एक ही जवाब हो सकता है, और वह है कि ‘खेल, निष्पक्ष नहीं रह जाएगा’ और एक मेजबान टीम के पक्ष में सभी निर्णयों के जाने की संभावना रहेगी।

ऐसा ही 90 के दशक में उदारीकरण के मार्ग को आत्मसात करते हुए बाजार के लिए जब देश के दरवाजे खोले गए तो निष्पक्षता के लिए सर्वाधिक आवश्यक शर्त तटस्तथ नियामक की स्थापना ही थी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि विभिन्न सेक्टर में सरकारी संस्थाएं पहले से कार्यरत थीं, उदाहरण के लिए टेलीकॉम और एविएशन। इस भावना को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने टेलीकॉम सेक्टर के लिए टेलीकॉम रेग्युलेरिटी अथॉरिटी ऑफ इंडिया व एविएशन सेक्टर में एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया का गठन किया। इसके परिणाम स्वरूप दोनों सेक्टर्स में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा शुरू हुई और इसका फायदा उपभोक्ताओं को गुणवत्ता में वृद्धि और कीमतों में कमी के रूप में मिली।

इसी प्रकार किसी तटस्थ नियामक की आवश्यकता शिक्षा के क्षेत्र में भी सिद्दत के साथ महसूस की जा रही है, क्योंकि भारतीय शिक्षा व्यवस्था कई मायनों में अन्य देशों की व्यवस्था से अलग है। यहां स्कूली शिक्षा मुख्यतः सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त निजी व गैर सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में बंटी है। शहरी इलाकों के करीब आधे और ग्रामीण इलाकों के एक तिहाई बच्चे निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सरकारी और निजी स्कूलों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा का लाभ छात्रों एवं अभिभावकों को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इस क्षेत्र में सरकार सेवा प्रदाता भी है, नियामक भी है और वित्त प्रदाता (फाइनेंसर) भी है। अर्थात् सरकार स्वयं स्कूल भी चलाती है, स्कूल चलाने से संबंधित नियम कानून भी स्वयं तय करती है, स्कूलों को प्रोत्साहित अथवा दंडित भी स्वयं करती है और स्वयं ही सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए कोष भी उपलब्ध कराती है। ऐसी दशा में क्या कोई निष्पक्षता की कल्पना कर सकता है? बजट स्कूल संगठनों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) लगातार सरकार द्वारा उनके स्कूलों के साथ दोहरा बर्ताव करने का आरोप लगाया जाता रहा है। यह दोहरा बर्ताव फीस निर्धारण, पाठ्य पुस्तकों के चयन, सुरक्षा व्यवस्था, मान्यता प्रदान करने, शैक्षणकि व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के वेतन तय करने सहित स्कूल प्रबंधन के तमाम पहलुओं के साथ भी है।

महाशक्ति बनने की मंशा पाले देश के लिए यह आवश्यक है कि यहां के नागरिक शिक्षित व कार्यकुशल हों। लेकिन अबतक देश में छात्रों को पड़ोस में अच्छा स्कूल उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। ऐसा तभी संभव है जब सरकारी और निजी स्कूल समान नियमों के तहत प्रतिस्पर्धा करें जिससे नौनिहालों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा उनके पड़ोस में कम से कम खर्च पर उपलब्ध हो सके। और इसके लिए सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में अलग स्वतंत्र एवं तटस्थ नियामक बनाकर अपनी भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

- संपादक

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