प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए पारंपरिक समुदायों के सशक्तिकरण की जरूरत

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

आइए हम जंगलों का उदाहरण लेते हैं।

जिन लोगों ने जंगलों को कृषि भूमि में बदला – उसके बाद आवासीय और व्यावसायिक भूमि में बदला- उन्हें स्वामित्व का हक मिल गया लेकिन जिन्होंने जंगलों को बरकरार  रहने दिया उनसे कहा जा रहा है कि जंगल तो सभी लोगों के हैं केवल उनके नहीं।यह अन्याय है। राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में इस मामले को टीक करने के बारे में और जंगलवासियों को उनके परंपरागत अधिकार देने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। खैर अब तक जो हुआ सो हुआ । फिर कैसे परंपरागत अधिकारों को मान्यता दें। राश्ट्रीय पर्यावरण नीति में समुदायों और वन विभाग से बीच भागीदारी और संयुक्त वन प्रबंधन को सार्वजनीन बनाने के सुझाव दिया गया है।

यह सही है कि संयुक्त वन प्रबंधन समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देता है। लेकिन यह समुदायों को वनों की दशा को सुधारने में कोई दिर्घकालिक दिलचस्पी नहीं पैदा करता। इसके अलावा उस  कानूनी मैकेनिज्म का जिक्र कहां है  जिसमें वन विभाग और समुदायों के बीच राजस्व के विभाजन की गारंटी दी कई हो। संयुक्त वन प्रबंधन को अब सामुदायिक वन प्रबंधन की तरफ आगे बढ़ना चाहिए।वन विभाग को केवल सलाहकार के तौर पर काम करना चाहिए।

मसौदे में माना गया है कि पानी,बिजली और ईंधनों की अनुचित मूल्यनीति ने पानी के दुरूपयोग को प्रोत्साहन दिया लेकिन इसमें इन नीतियों को  रेशनलाइज करने के लिए कोई स्पष्ट समाधान नहीं बताया है।वह यह भी रेखांकित करने में नाकाम रहा है कि मूल्य निर्धारण उपभोगकर्ताके पानी के अधिकार  का सबसेट है।पानी के अधिकार के आवंटन की तरफ बढ़ने के लिए आज की सरकार द्वारा किए जानेवाले  प्रोजेक्ट आवंटन की नीति को मजबूत करना होगा। प्रोजेक्ट आथोरिटिज नगर निगमों और अन्य सरकारी निगमों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध करते हैं एक निश्चित मात्रा में पानी की सप्लाई के लिए।इन मात्रात्मक आवंटनों को रूपांतरित किया जाना चाहिए और ये इन अधिकारों का विनिमययोग्य बनाया जाना चाहिए।यह नजरिया वर्तमान नदी के  पानी के निजीकरण के कथित उभरते समाधान से अलग है जिसमें कई किलोमीटर नदी के पानी को प्रायवेट कंपनियों को लीज पर दे दिया जाता है। हमारा तरीका मौजूदा दावों को औपचारिक रूप दे देगा।

लेकिन उन  परिवारों का क्या जो भुगतान नहीं कर सकते ? सरकार या तो प्रति व्यक्ति या प्रति परिवार  मुफ्त आवंटन करे और फिर उस पानी के लिए सामान्य कर राजस्व से भुगतान करें।जो परिवार इस कोटा से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करेगा उसे उसका भुगतान करना होगा। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकार केवल गरीबों को सस्ते दामों में पानी दे और अमीरों से उनके द्वारा इस्तेमाल की गई हर बूंद का पैसा वसूल करें।

आर्थिक विकास का तकाजा है कि हम सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यावरण के संसाधनो का उपयोग करें। इससे निगरानी और अमल के बेहतर तरीके निकलेंगे। लेकिन यहां हम पीछे हैं। हमें एक संस्तायीकृत ढांचा बनाना होगा जो पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रियाओं  और गारंटियों के लिए  और पारंपरिक समुदायों कीजीविका को विस्तार देनेवाले प्रोत्साहन तैयार करे।

 

- पार्थ जे शाह और एच बी सौम्या (प्रकाशन वर्ष 2005)