बैंकों का राष्ट्रीयकरणः किसका फायदा, किसका नुकसान

पंजाब नेशनल बैंक के मुताबिक नीरव मोदी महाफ्रॉड की रकम 11 हजार चार करोड़ से 1300 करोड़ रूपये और ज्यादा हो सकती है। यानी कुल 12 हजार सात करोड़ का चूना बैंक या सरकार को लग चुका है। इस फ्रॉड के बाद लोगों की जुबान पर बड़ा सवाल यह है कि सरकार हर वो काम क्यों करती है जिससे टैक्स के रूप में वसूली गई लोगों की खून पसीने की कमाई पानी में बह जाए। सरकार का काम देश चलाना है, विदेश नीति और रक्षा मामलों पर ध्यान देना है। बैंक चलाने के लिए प्राइवेट संस्थाएं है जो पहले से ही बैंकों को चला रही है। सरकार प्राइवेट बैंकों पर सेवा शर्तों के लिए निगरानी रख सकती है जिसके लिए उसके पास रिजर्व बैंक जैसी संस्था पहले से ही मौजूद हैं।

लोगों का गुस्सा जायज है। जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिये । पिछले 11 सालों में देश के तीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, पी चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपये लगा चुके हैं। यह आंकड़ा 2जी के अनुमानित घाटे से भी ज्यादा है। यह सरकार की इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है।

बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन के लिए इस वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष निकाले गए 1.45 लाख करोड़ रुपये के अलावा सरकार 2010-11 से 2016-17 के बीच बैंकों को 1.15 लाख करोड़ दे चुकी है। एसबीआई समेत अन्य पब्लिक सेक्टर बैंक एनपीए के कारण पिछले दो वित्त वर्षों से घाटे में हैं। इस वित्त वर्ष भी बैंकों के अच्छे दिन नहीं आने वाले। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया है। बैंक ऑफ बड़ौदा का हाल भी ऐसा ही है। रेटिंग एजेंसी केयर के मुताबिक, 'एनपीए की बात करें तो ऐसा नहीं लगता कि पब्लिक सेक्टर बैंकों का बुरा दौर समाप्त हो गया है।

सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान 20 सरकारी बैंकों को 88000 करोड़ रुपये देने की घोषणा इस साल जनवरी में की। इसके साथ ही सरकार ने इन बैंकों को ज्यादा जवाबदेह बनाने के लिए कड़े रिफॉर्म्स भी तय किए। योजना के तहत 80000 करोड़ रुपये रीकैपिटलाइजेशन बॉन्ड्स के जरिए और 8139 करोड़ रुपये बजटरी सपोर्ट के रूप में दिए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा बैंक मार्केट से 10312 करोड़ रुपये जुटाएंगे। इस तरह कुल कैपिटल सपोर्ट एक लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा लेकिन बैंकिग फ्रॉड को देखते हुए ये बेकार की कवायद है। जनता का पैसा एनपीए के जरिये धन्नासेठ की जेबों में पहुंच रहा है और मध्यम वर्ग खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

एक तरफ विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे डिफॉल्टर अरबपति पूंजीपतियों की वजह से बैंकों का एनपीए बोझ बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ, सरकार टैक्सपेयर्स के पैसे से इनको अपना बहीखाता ठीक करने के लिए लगातार मदद कर रही है। पीएनबी घोटाले के बाद अब इस पर भी सवाल उठने लगे हैं।

आलम ये है कि देश में सरकारी बैंको का एनपीए 9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। मार्च 2017 के अंत में सरकारी बैंकों की ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स 12.47 पर्सेंट पर पहुंच गई थीं, जो मार्च 2014 के अंत में 4.72 पर्सेंट पर थीं। इससे पिछले कुछ सालों से वित्त मंत्रियों को भारी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें एनपीए से जूझ रहे सरकारी बैंकों में भारी पूंजी डालने की जरूरत होती है। फंसे कर्जों और कॉरपोरेट के बढ़े फ्रॉड की वजह से बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है। सरकार लोगों से वसूले टैक्स से बैंकों की मदद कर रही है लेकिन दूसरी तरफ विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे हजारों करोड़ रुपये लेकर फरार हो रहे हैं।

सरकारी बैंकों की दलील है कि नौकरशाही के बेवजह अड़ंगें के कारण उनको दिक्कत पेश आ रही है। इसके अलावा मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए सरकारी बैंकों को कर्ज भी देना पड़ रहा है और इससे भी स्थिति बिगड़ी है। साथ ही किसान कर्जमाफी जैसी तमाम योजनाओं का बोझ भी उनके सिर ही आता है।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने समय में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का अहम फ़ैसला किया था। उन्होंने 19 जुलाई, 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इन बैंकों पर अधिकतर बड़े औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा था। आरोप था कि ये सिर्फ बड़े उद्योपतियों को कर्ज देते हैं और गरीब इन तक नहीं पहुंच पाता। इसके बाद राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर 1980 में हुआ जिसके तहत सात और बैंकों को राष्ट्रीयकृत किया गया। इसके पहले केवल एक बैंक- भारतीय स्टेट बैंक राष्ट्रीयकृत था। इसका राष्ट्रीयकरण 1955 में कर दिया गया और 1958 में इसके सहयोगी बैंकों को भी राष्ट्रीयकृत कर दिया गया। कुछ समय पहले तक देश में 27 बैंक राष्ट्रीयकृत थे लेकिन कुछ छोटे बैंकों को एसबीआई समेत कई बड़े बैकों में विलय कर दिया गया। फिलहाल इनकी संख्या 21 हैं।

बैंकों में हो रहे फ्रॉड से आम आदमी हिल गया है और वो बैंक के पास पैसा जमा करवाने से कतराने लगे हैं। पिछले साल बैंक में पैसा जमा करने वाले लोगों की संख्या में कुल चार प्रतिशत का उछाल आया, जबकि उससे पिछले साल यह आंकड़ा 14.7 प्रतिशत था। मिली जानकारी के मुताबिक, पिछले एक साल में बैंकों में कुल 4.1 करोड़ रुपये जमा हुए वहीं लोन की डिमांड 7.8 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। बता दें कि बैंक उनके पास जमा हुआ सारा पैसा भी लोन पर नहीं दे सकते। जमा हुए हर 100 रुपये में से चार को कैश के तौर पर अपने पास रखना होता है। साथ ही 19.5 रुपये को सरकारी बॉन्ड में भी देना होता है। इस तरीके से बैंक हर 100 रुपये में से कुल 76.5 रुपये ही लोन पर दे सकता है।

आने वाले दिनों में बैंक उनके पास जमा पैसों पर ज्यादा ब्याज (रिटर्न) दे सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन दिनों बैंक के पास कैश की काफी कमी है और लोन की डिमांड करने वाले लोग लगातार बढ़ रहे हैं। बैंक से लोन लेने वालों की संख्या दिसंबर 2017 में 10.7 प्रतिशत बढ़ी और 81 लाख करोड़ तक पहुंच गई।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीयकरण के बाद भारत के बैंकिंग क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। भारत में अब विदेशी और निजी क्षेत्र के बैंक सक्रिय हैं। एक अनुमान के अनुसार बैंकों की सेवाएं लेने वाले लगभग 90 फ़ीसदी लोग अब भी सरकारी क्षेत्र के बैंकों की ही सेवाएं लेते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि बाकी के दस फीसदी लोग प्रिवलेज हैं। सरकार की निगरानी एजेंसी भारतीय रिजर्व बैंक अगर प्राइवेट बैंकों में खाता खोलने की शर्तों को आसान बना दे तो बाकी के 90 फीसदी लोगों के खातें भी इन बैंकों में खोले जा सकते हैं। प्राइवेट क्षेत्र के भी कई बैंक जीरो बैलेंस पर खाता खोलने की सुविधा देते हैं।

देश के 21 सरकारी बैंक आज मुल्क की वित्तीय हैसियत में बड़ा मुकाम रखते हैं। कुल भारतीय बाजार में उनका हिस्सा 55 से 60 फीसदी तक है। इनमें अधिकतर शेयर बाजारों में सूचीबद्ध हैं। लेकिन इस दिलचस्प तथ्य पर गौर कीजिए कि सम्मानित भारतीय स्टेट बैंक समेत इन सबकी कुल बाजार पूंजी एचडीएफसी बैंक की बाजार पूंजी से आज 50,000 करोड़ रु. से भी कम है जबकि एचडीएफसी बैंक बने अभी 23 साल ही हुए हैं।

बैंको के राष्ट्रीयकरण के पचासवें साल में ये ही बैंक दिवालिया होने को हैं क्योंकि उन्होंने अमीरों को बिना जांच पड़ताल के भारी रकम दे दी और कंगाल हो गए। अगर आप आलसी हैं तो भाग्य को दोष दे सकते हैं लेकिन इस नीति को जारी रखने की गलती को और इसके पीछे करदाताओं के 2.11 लाख करोड़ रु. बर्बाद करने को क्या कहेंगे? बीस जुलाई 2015 को मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा था कि 1960 के दशक में बैंको का राष्ट्रीयकरण करना सरकार की सबसे बड़ी गलती थी। फिर मौजूदा सरकार गलतियों को ढ़ोना क्यों चाहती है? गलती को सुधारने की दिशा मे काम किया जा सकता है। माना कि ये काम एक दो दिन का नही है लेकिन इस दिशा में काम तो आरंभ किया ही जा सकता है।

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नवीन पाल

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