संविधान दिवस विशेषः समय की जरूरत नेशनल रिपील ऑफ लॉ डे

भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून ऐसे हैं, जो लागू हैं। इनमें से कई कानून ऐसे हैं जो वर्तमान समय में अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होते हैं तो कई कानून ऐसे भी हैं जिनके ठीक उलट कानून भी उसी कानून की किताब में मौजूद है।

अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को लेकर सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के शोधकर्ताओं ने जब अध्ययन किया, तो उन्हें हैरतअंगेज जानकारियां मिली। सोसायटी ने हाल ही में महाराष्ट्र और दिल्ली में लागू ऐसे अप्रासंगिक 25-25 कानूनों की सूची जारी की है। इससे पहले भी संस्था ने 100 ऐसे अप्रासंगिक हो चुके कानूनों की सूची सरकार को सौंपी थी जिसमें से 25 कानूनों को समाप्त कर दिया गया। थिंकटैंक द्वारा तैयार दिल्ली व महाराष्ट्र के कानूनों की सूची पर सरसरी तौर पर भी निगाह डालने से पता चल जाता है कि ये कानून कितने गैरजरूरी और अप्रासंगिक हैं। सबसे पहले देखते हैं दिल्ली में लागू कुछ कानूनों को।

दिल्ली में एक कानून लागू है पंजाब लाइव स्टॉक इंप्रूवमेंट एक्ट 1940। इस कानून के मुताबिक दिल्लीवासी के पास अगर गाय है और वह गाय बछड़े को जन्म देती है तो वह बछड़ा बैल बनेगा या सांड़, यह तय करने का अधिकार सरकारी अधिकारियों को है। जब यह कानून लागू किया गया था, तब कृषि के लिए बैलों की ज्यादा जरूरत थी। इसके साथ ही उन दिनों अगली पीढ़ी की तैयारी के लिए सांड़ों की कमी हो गई थी। लेकिन आज हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दिल्ली शहर में पशु रखे ही नहीं जा सकते। दिल्ली के शहरीकृत गांवों तक में अब गाय-भैंस कम दिखती है। फिर तकनीक इतना आगे बढ़ गई है कि अब बैल ही अप्रासंगिक हो गए हैं। इसलिए इस कानून की कोई जरूरत ही नहीं है। इसी तरह दिल्ली में एक ऐसा कानून आज भी लागू है, जिसकी जरूरत बरसों पहले खत्म हो चुकी है। यह कानून है ईस्ट पंजाब एक्सचेंज ऑफ प्रिजनर्स एक्ट 1948। इस कानून को आजादी के तुरंत बाद इसलिए लागू किया गया था, क्योंकि तब भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ की जेलों में विचाराधीन कैदी थे। लेकिन उनमें से कोई पाकिस्तान जाना चाहता था तो कोई हिंदुस्तान। इसलिए उनके लिए यह कानून लागू किया गया था। लेकिन अब इस कानून की प्रासंगिकता ही नहीं है।

दिल्ली में 1918 में एक कानून लागू हुआ था, पंजाब स्माल टाउन्स पेट्रोल एक्ट। तब प्रथम विश्वयुद्ध का जमाना था। पुलिस और सेना की मौजूदगी ना का के बराबर थी। तब इलाकों में पहरेदारी की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों पर ही डाली गई थी। इसके लिए हर घर से बारी-बारी से अपने इलाके में पहरेदारी करने के लिए सदस्य चाहिए था। आज कम से कम ऐसे हालात नहीं हैं। फिर भी यह कानून अब भी दिल्ली में लागू है। इसी तरह का एक और कानून है पंजाब कॉपीइंग फीस एक्ट 1936। इसके तहत अदालती और सरकारी दस्तावेजों की कॉपी या नकल के लिए फीस का प्रावधान था। लेकिन भारतीय साक्ष्य कानून और सूचना के अधिकार कानून 2005 के लागू होने के बाद इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की सूची में महाराष्ट्र के भी एक हास्यास्पद कानून की मौजूदगी हैरत में डालने के लिए काफी है। जिस तरह घोड़ों की रेस कुछ प्रमुख शहरों में होती है, अंग्रेजों ने महाराष्ट्र में कुत्तों की ऐसी ही रेस कराने की तैयारी की थी। इसके लिए भी उन्होंने कानून बनाया था। वह कानून आज भी लागू है। महाराष्ट्र डॉग रेसकोर्स लाइसेंसिंग एक्ट 1976 आज भी लागू है। यह बात और है कि न तब और न ही अब, महाराष्ट्र में कुत्तों की कोई रेस यानी दौड़ आयोजित की गई। प्लेग की महामारी का पृथ्वी से ही नाश हो चुका है। लेकिन इस महामारी को रोकने के लिए जरूरी कानूनी प्रावधान वाले एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 आज भी महाराष्ट्र में लागू है। मुंबई महानगरपालिका आज दुनिया की कमाऊ महापालिकाओं में गिनी जाती है। बीएमसी का बजट तो देश के ही कई छोटे राज्यों से ज्यादा है। लेकिन उसके लिए कोष जुटाने वाला कानून सिटी ऑफ बांबे म्यूनिसिपल एक्ट 1898 आज भी लागू है। महाराष्ट्र में आज भी लागू एक कानून को लेकर गैरसरकारी संस्थाएं खासा सवाल उठा चुकी हैं। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की महाराष्ट्र राज्य की सूची में भी यह कानून शामिल है। बांबे बेगर एक्ट 1946 के मुताबिक भिखारियों को भीख मांगने के लिए दंडित करने और उन्हें भीख मांगना छुड़ाने के लिए ट्रेनिंग देने वाले इस कानून पर आरोप है कि इसने भिखारियों को अपराधी बनने में मदद दी है। फिर यह भिखारियों से अपराधी जैसा सलूक करता है। 

भारत में गैरजरूरी कानूनों को हटाने की शुरूआत संभवत: पहली बार वाजपेयी शासन के दौरान तत्कालीन विधि आयोग ने की थी। उस आयोग के सदस्य रहे एनएम घटाटे ने तब कई कानूनों को हटाने और छह महीने तक की सजा के प्रावधान वाले कानूनों के तहत जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों को छोड़ने की सिफारिश की थी। दरअसल भारतीय विधि आयोग को खुद संज्ञान लेकर गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है। बेहतर होगा कि हमारे यहां भी ऑस्ट्रेलिया के विधि आयोग को मिले अधिकारों की तरह अपने विधि आयोग को लैस किया जाए। ऑस्ट्रेलिया में कोई भी नागरिक गैरजरूरी कानूनों को लेकर अपनी राय विधि आयोग के समक्ष रख सकता है और उस पर विधि आयोग समय-समय पर विचार करके उन्हें हटाने की सिफारिश करता रहता है। कई पश्चिमी देशों में भी ऐसी व्यवस्था लागू है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कानूनों का अपना संदर्भ और अपना कालखंड होता है। इसलिए उनमें भी बदलाव होना ही चाहिए। दुर्भाग्यवश भारत में अभी ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है, जिसके तहत गैरजरूरी और अप्रासंगिक कानूनों पर विचार किया जाए और उन्हें खत्म कर दिया जाए।

भारत में हर साल 26 नवंबर को विश्व कानून दिवस मनाया जाता है। इस दिन कानून के शासन को लोकतांत्रिक और तार्किक बनाने पर विचार किया जाता है। बेहतर होता कि सरकार गैरजरूरी कानूनों पर विचार के लिए प्रतीकात्मक तौर पर ही सही, एक तिथि निर्धारित करती। फिर ऐसी व्यवस्था बनाती ताकि जनता को बेवजह परेशान और प्रताड़ित करने वाले कानूनों पर विचार किया जाता। ऐसी व्यवस्था आज के दौर की जरूरत है, ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले अपने देश के लोगों को सामयिक, आधुनिक और लचीले लोकतांत्रिक अधिकार हासिल हो सकें।

- उमेश चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)