एक दिन अप्रासंगिक कानूनों के समापन के नाम

क़ानून क्या है? इस बारे में ऑस्टिन का कथन है कि क़ानून संप्रभु की आज्ञा है। राज्य के सन्दर्भ में अगर बात करें तो राजतंत्र वाली व्यवस्था में राजा का आदेश ही क़ानून होता था। शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी क़ानून की परिभाषा कमोबेस वही है। सवाल है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में क़ानून लोकहित के लिए हैं या लोकहितों को ही क़ानून के मापदंड पर रखकर देखना होगा? निश्चित तौर पर लोक का हित सर्वोपरी हो, उसके साथ अन्याय न हो, क़ानून का उद्देश्य इतना भर है। क्या हम कानूनों को तैयार करते समय उन मानकों का ध्यान रखते हैं जो उक्त क़ानून के भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों नजरिए से लोकहित के खिलाफ न जाए? अगर इस सवाल का जवाब देश के भीतर खोजने का प्रयास किया जाए तो घोर अनिश्चितता एवं भ्रम की स्थिति देखने को मिलती है। कई ऐसे क़ानून जो कभी इतिहास की जरूरत थें, आज भी कायम हैं। कई ऐसे क़ानून जो वर्तमान के अनुकूल बदलने या खत्म होने चाहिए, आज भी पुराने प्रारूप में ही लागू हैं। कई ऐसे क़ानून जिनके विरोधाभाषी क़ानून समय के साथ-साथ लागू किये गए लेकिन पुराना क़ानून आज भी कायम है, उन्हें खत्म किया जाना चाहिए! सूचना का अधिकार क़ानून, बांस को पेड़ का दर्जा देकर उसे काटने पर पाबंदी लगाने वाला क़ानून अथवा तांबे के पतले तारों को घर में रखने को अवैध मानने वाला क़ानून सहित तमाम उदाहरण हैं।

गैर-जरुरी कानूनों की जटिलता एवं उनकी अप्रासंगिकता पर अनेक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खुलकर बोलते रहे हैं। ऐसे तमाम कानूनों को वर्तमान की केंद्र सरकार द्वारा समाप्त भी किया गया है। बावजूद इसके अभी भी तमाम ऐसे तमाम क़ानून हैं जो समाप्त किए जाने चाहिए अथवा जरूरत के अनुरूप उनमे सुधार किए जाने चाहिए। गैर-जरुरी एवं अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने की दिशा में देश में कई रिसर्च संस्थान काम कर रहे हैं। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के अंतर्गत कानूनों पर काम करने वाली आई-जस्टिस की टीम ने ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कानूनों की सूची तैयार की है। कानूनों का मकड़जाल किस कदर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब आईजस्टिस के शोधार्थियों की टीम द्वारा दिल्ली के क़ानून सचिव से यह जानकारी मांगी गयी कि अभी दिल्ली में कुल कितने क़ानून लागू हैं, तो उनके पास आंकड़ों में कोई जवाब नहीं था। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउन्डेशन द्वारा भी हाल में ही एक रिपोर्ट जारी की गयी है जिसमे उन तमाम कानूनों पर शोधपरक जानकारी दी गयी है, जिन्हें हाल में समाप्त किया गया है। 

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा दिल्ली एवं महाराष्ट्र राज्य लागू में गैर-उपयोगी कानूनों की सूची तैयार की गयी है। इनमे से कई क़ानून ऐसे हैं जो किन्हीं दूसरे राज्यों से लिए गये थे। हालांकि उन राज्यों में इन कानूनों को समाप्त किया जा चुका है लेकिन दिल्ली में अभी भी लागू है। उदाहरण के लिए अगर देखें तो एक क़ानून है Punjab Village and Small Towns Patrol Act 1918, इसके तहत छोटे कस्बों एवं गांवों के निवासियों रात में अपने गाँव की निगरानी के लिए गश्त ड्यूटी करना पड़ता था। यह उस दौरान की व्यवस्था का हिस्सा था जब इसकी जरूरत रही होगी। दिल्ली के लिहाज से अब इस कानून को लागू रखने का कोई औचित्य नहीं है। लिहाजा इस क़ानून को क़ानून-पुस्तिका से हटा दिया जाना चाहिए। एक और क़ानून है Punjab Copying Fees Act 1936, जो कि आज भी लागू है लेकिन इसका औचित्य नहीं है। इसके तहत अगर कोई नागरिक सरकार से कोई जानकारी लेता है तो इसके दस्तावेजों के खर्चे का भुगतान करना होगा। चूँकि सूचना का अधिकार क़ानून में इसको अलग से तय कर दिया गया है तो अब इस क़ानून के लागू रहने का कोई औचित्य नहीं है। लिहाजा इस क़ानून को समाप्त किया जाना चाहिए। कई क़ानून तो ऐसे हैं जो चलन में बेशक न हों लेकिन क़ानून-पुस्तिका में आज भी कायम हैं, जिसका फायदा अगर कोई संबंधित अधिकारी गलत ढंग से उठाना चाहे तो उठा सकता है। नजीर के तौर पर एक बेहद हास्यास्पद क़ानून है कि अगर आपके पास गाय का नवजात बछड़ा है तो वो बैल बनेगा या सांड बनेगा, ये बछड़े का मालिक होने के नाते आपको तय करने का अधिकार नहीं है. इसके लिए भी आपको सरकारी प्रक्रिया के तहत जाना होगा. बेशक समय के साथ-साथ ये क़ानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं लेकिन आज भी क़ानून-पुस्तिका में बने हुए हैं। लिहाजा इन कानूनों को हटा दिया जाना बेहद जरुरी है।

चूँकि गैर-जरुरी कानूनों का मकडजाल बेहद उलझा हुआ है लिहाजा एकबार में सबको समाप्त करना बेहद मुश्किल काम है। तमाम शोधार्थी इस विषय पर अपने सुझाव प्रस्तुत कर चुके हैं। बड़ा सवाल है कि आखिर क़ानून बनाने की प्रक्रिया में ही सुधार क्यों न हो? क़ानून बनाते समय क्यों न उससे जुड़े भविष्य और लागत सहित व्यवहारिक शोध को भी तरजीह दी जाए। कोई क़ानून लागू होने के बाद किस ढंग से काम करेगा इसको लेकर उससे जुड़े कुछ बहुआयामी पूर्व-शोध कार्यों पर क्यों न गौर किया जाय। क़ानून की ड्राफ्टिंग टीम में शोधार्थियों को भी तरजीह देकर एक स्वायत्त प्री-रिसर्च भी कराया जाना चाहिए। जिस क़ानून को लाया जा रहा है, उसका प्रमुख उद्देश्य क्या है, यह स्पष्ट शब्दों में तय होना चाहिए और उन्हीं उद्देश्यों के मानदंडों पर आगे चलकर उस क़ानून का सतत मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। क़ानून अपने तय उद्देश्य को प्राप्त कर रहा है अथवा नहीं कर रहा है, इसका समय-समय पर मूल्यांकन करके ही उसको आगे जारी रखना ठीक प्रतीत होता है। क़ानून को लागू कराने में लागत के सवाल पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं होती है। लागत का प्रश्न इसलिए कि हमे यह स्पष्ट पता हो कि क्या देकर क्या हासिल करने की नीति हम बनाने जा रहे हैं। लागत का सही मूल्यांकन किए बिना हम क़ानून को सफल नहीं बना सकते हैं। ये तमाम सुझाव आई-जस्टिस टीम द्वारा दिए जा रहे हैं। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने 26 नवम्बर को ‘नेशनल रिपील ऑफ लॉ डे’ के तौर पर मनाने की मांग रखी है। यानी कि वर्ष में एक दिन विशेष रूप से निर्धारित हो जिस दिन कानून के निर्माता (कार्य पालिका), उसके संरक्षक (न्याय पालिका) व अनुपालन (व्यवस्थापिका) के जिम्मेदार लोग एक साथ बैठें और अप्रासंगिक एवं बेकार पड़े कानूनों को खत्म करने पर विचार करें। नीतिगत रूप से अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त किए जाने का प्रयास पिछली संप्रग सरकार में भी हुआ था लेकिन मोदी सरकार ने इस दिशा में जिस आक्रामक तरीके से काम किया है और 11 सौ से अधिक कानून समाप्त किए हैं उसकी सराहना अवश्य होनी चाहिए। लिहाजा यह उम्मीद बंधती है कि गैर-जरुरी कानूनों को समाप्त तो करने के साथ ही साथ क़ानून बनाने की नीति में भी सुधार देखने को मिलेगा।

- शिवानन्द द्विवेदी
लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो एवं नेशनलिस्ट ऑनलाइन डॉट कॉम के सम्पादक हैं।