राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

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पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

लेकिन इस पूरी बहस के दौरान किसी ने यह नहीं पूछा कि एेसा क्यों है कि चीन सहित दुनियाभर के दर्जनों देश रिटेल में विदेशी निवेश का खुलकर स्वागत करते हैं? सरकार की हार का यह मतलब है कि भारत के उपभोक्ताओं ने कम कीमतों पर किराना पाने का मौका गंवा दिया। किसानों ने बेहतर रिटर्न पाने का मौका गंवा दिया।

अब भारत की पचास फीसदी से लेकर दो तिहाई तक खाद्य सामग्री पहले की तरह सड़ती रहेगी और लाखों ग्रामीण बेरोजगार आधुनिक अर्थव्यवस्था में सहभागिता करने से वंचित रह जाएंगे। यह मनमोहन सिंह के नेतृत्व को भी एक निजी क्षति है और आगामी सुधारों को भी इससे ठेस पहुंचेगी। यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब राजनीतिक अक्षमता के कारण हमारी अर्थव्यवस्था की गति नाटकीय रूप से मंद हुई है।

यह तर्क तो विचित्र ही लगता है कि जनतंत्र की जीत हो लेकिन जनता की हार हो, क्योंकि जनतंत्र तो जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन तंत्र है। बहरहाल, समस्या हमारे जनतंत्र के मूल दोषों में से एक में निहित है और वह है : न्यस्त स्वार्थो द्वारा सरलता से उसका अपहरण। 1980 के दशक के अंत तक लेबर यूनियनों और वामपंथी दलों ने हमारे लोकतंत्र पर कब्जा जमा रखा था और वे सरकारी दफ्तरों, बैंकों और बीमा कंपनियों में कंप्यूटरों पर पाबंदी लगाने में कामयाब रहे थे।

आज बीस से भी अधिक वर्षो बाद सशक्त किराना कारोबार ने विपक्ष के साथ मिलकर एक ऐसी नीति को परास्त कर दिया है, जो भारतवासियों के एक बड़े वर्ग के हित में थी। किराना लॉबी ने देश में एक भय का वातावरण निर्मित किया। 1991 में जब आर्थिक सुधार शुरू हुए थे, तब भी विदेशियों का ऐसा ही भय बताया गया था।

लेकिन यदि तब सरकार ने उनकी सुन ली होती तो आज 20 करोड़ लोगों को गरीबी की स्थिति से नहीं उबारा जा सका होता, 30 करोड़ लोगों को मध्य वर्ग की श्रेणी में न लाया जा सका होता और आज भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था न होता।

भारतीय आज भी पुरातन ‘मंडी सिस्टम’ के शिकार हैं, जो भुगतान और लाभ के बीच दुनिया का सबसे बड़ा गैप निर्मित करता है। किसान जो चीज एक रुपए में बेचता है, वह मंडी में दो रुपए में बिकती है, किराना स्टोर पर जाकर यह तीन रुपए हो जाती है और उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते वह चार रुपए की हो जाती है।

खेत से मंडी और मंडी से दुकान तक यात्रा करने वाले टमाटर से हर बिचौलिया मुनाफा कमाता है। अध्ययन बताते हैं कि आधुनिक रिटेल प्रणाली अपनाने वाले देशों में यह गैप कम है और इसका कारण यह है कि विदेशी रिटेलरों का एक बड़ा वर्ग किसानों से सीधे माल खरीदता है और उपभोक्ताओं को सीधे बेचता है। इस तरह वे किसान को उसी टमाटर के 8 से 10 रुपए चुकाते हैं और इसके बावजूद मुनाफा कमाते हैं।

यह सच है कि रिटेल में विदेशी निवेश से बिचौलियों की दुकान बंद हो जाएगी, लेकिन जैसा कि कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन के महासचिव पी चेंगल रेड्डी कहते हैं : ‘भारत में 60 करोड़ किसान और 120 करोड़ उपभोक्ता हैं, जबकि ट्रेडर्स आधा करोड़ ही हैं।

जाहिर है, ऐसे में सरकार को एक व्यापक वर्ग यानी किसानों और उपभोक्ताओं का ही समर्थन करना चाहिए।’ एक अच्छी सरकार यह सुनिश्चित करती है कि उसकी नीतियां एक बड़े वर्ग के हित में हों, किसी एक समूह के हित में नहीं। रिटेल में विदेशी निवेश से महंगाई कम होगी, जो सभी के हित में है।

भारत में खाद्य पदार्थो के खराब होने की एक बड़ी वजह ‘कोल्ड चेन’ का अभाव है। नई नीति के कारण करोड़ों टन खाद्य पदार्थ भी सड़ने से बच जाता, क्योंकि वैश्विक रिटेलर्स ने एक बेहतरीन कोल्ड डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम विकसित किया है। हजारों कोल्ड स्टोरेज और वातानुकूलित ट्रकों में निवेश करने के कारण वे अपने नुकसान पर नियंत्रण लगा देते हैं।

इस मायने में उन्होंने ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया है और 1990 के दशक के बाद मल्टी ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी देने वाले अर्जेटीना, ब्राजील, चिली, चीन, इंडोनेशिया, मलयेशिया, रूस और थाइलैंड जैसे देशों में इसके सकारात्मक परिणाम देखे जा सकते हैं।

लेकिन इनमें से किसी भी देश में छोटे स्टोर्स पर ताला नहीं लगा और न ही सुपरमार्केट द्वारा वहां अनाप-शनाप दाम पर चीजें बेची जा रही हैं। वास्तव में कीमतें तो घटी हैं और छोटे आउटलेट्स में भी इजाफा ही हुआ है। किराना कारोबार अब भी इसलिए सफल है, क्योंकि वह वैयक्तिकृत सेवाएं प्रदान करता है, उधार देता है और होम डिलीवरी की सुविधा भी मुहैया कराता है। पश्चिमी शैली के निर्वैयक्तिक सुपरमार्केट इस क्षेत्र में उसकी बराबरी नहीं कर सकते।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र नई विदेशी निवेश नीति को लागू नहीं कर रहा था, बल्कि उसे प्रस्तावित कर रहा था और यह राज्य सरकारों पर निर्भर था कि वे इसे मंजूरी देते हैं या नहीं। यह भारत के नीति निर्माण की एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि वह ऐसी नीति पर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाती थी, जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर सर्वसम्मति नहीं है। सवाल केवल रिटेल में विदेशी निवेश का ही नहीं है।

सवाल यह है कि क्या हमारा जनतंत्र ऐसे नेताओं के प्रति सहिष्णु है या नहीं, जो संकीर्ण हितों के स्थान पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हैं? सवाल यह भी है कि क्या हमारे नेता विपक्ष को मनाकर उसे देश की आर्थिकी के लिए अहम एक नीति के लिए राजी कर सकते हैं? प्रधानमंत्री ने एक साहसी और महत्वपूर्ण निर्णय लिया था, लेकिन अफसोस की बात है कि वे अपने इस कदम पर अडिग नहीं रह सके और आलोचकों के भयादोहन के समक्ष उन्होंने हथियार डाल दिए।

Gurcharan Das- गुरचरन दास
साभार: दैनिक भास्कर