मोदी प्रधानमंत्री बने तो सहयोगी दलों की दया पर निर्भर होंगे

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जैसे गुजरात  का चुनाव अभियान अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है कई पर्यवेक्षक भाजपा के नरेंद्र मोदी की भारी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं कुछ तो मानते हैं कि 2007 से भी ज्यादा बड़ी जीत हो सकती है। इससे वह अगले आमचुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बन सकते हैं।

कांग्रेस पार्टी की हालत खस्ता है । वह भारी महंगाई,गिरती आर्थिक विकास दर और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। इससे भाजपा को कई दलों के गठबंधन के अगुवा के तौरपर1998 और 1999 की तरह फिर से सत्ता में आने का मौका मिल सकता है। इसका मतलब है कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

यह संभावना कई विश्लेषकों को डरा रही है। यहां एक उदाहरण देता हूं – इकानामिक टाईम्स के टीके अरुण ने लिखा है – नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए क्योंकि इससे भारत की राष्ट्र के रूप में संकल्पना नष्ट हो जाएगी जो विविधता में एकता का उत्सव मनाती है। जहां सामंजस्य और गरिमा के साथ कई अस्मिताएं फलती फूलती है। इसके अलावा मोदी के राज में लोकतंत्र और कानून के शासन पर प्रहार  होगा। भाजपा के लिए मोदी के शिखर पर पहुंच जाने का अर्थ है कि भाजपा की हिन्दू बहुसंख्यकवाद विहीन दक्षिण मध्यमार्गी पार्टी के रूप में विकसित होने की उम्मीद का खत्म हो जाना।

मैं इस सोच के साथ ज्यादा असहमत नहीं हो सकता। लेकिन यह मुझे लगता है कि मोदी को लेकर डर अवांछित और अनावश्यक  में हौव्वे परिवर्तित होता जा रहा है।  यदि मोदी प्रधानमंत्री बनते भी हैं जो एक बहुत दूर की संभावना है तो भी एक ऐसे क्षत विक्षत गठबंधन के प्रधानमंत्री होंगे जिस तरह के प्रधानमंत्री वाजपेयी  1998और 1999 में थे। वाजपेयी भाजपा का उदारवादी चेहरा थे और उनमें ऐसा आकर्षण और क्षमता थी जिसके कारण वे लोगों को साथ लेकर चल सके। इस कारण वे कई दलों के ढीले ढाले समूह को इतने समय तक हांक सके।

लेकिन मोदी में इसी तरह के कौशल का अभाव है। उनमें प्रशासनिक कौशल तो है जिसके कारण गुजरात के आर्थिक चमत्कार के निर्माता होने का दावा कर सके। लेकिन वे अच्छे टीम बनानेवाले नहीं हैं। वे न केवल अन्य दलों में वरन अपने सहयोगियों में भी डर पैदा करते हैं।

“मोदी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रिश्तें बहुत अच्छे नहीं है इसकी वजह यह नहीं है कि संघ मानता है कि मोदी विचारधारा से भटक गए हैं। वरन मोदी संघ की सोच के साकार रूप हैं। समस्या यह है कि मोदी इतने ज्यादा अधिनायकवादी है कि कि वे संघ के अनुशासन को भी स्वीकार नहीं करते। उनकी यह अधिनायकवादी सोच असहमति को कुचलने और मुठभेड़ों और वसूली रैकेट चलाने  के आरोपी अमित शाह जैसे नेता को थोपने के रूप में प्रगट होती है।“ ऐसा व्यक्ति राष्ट्रीय स्तरपर गठबंधन के प्रमुख के तौरपर बुरी तरह असफल होगा। बह अपनी ताकत दिखाने का आदि है  यह राज्य के नेता के लिए तो संभव है जिसके पास भारी बहुमत और सफल अर्थव्यवस्था हो।लेकिन ताकत दिखाने का यह नुस्खा राष्ट्रीय स्तरपर लंबे दायरेवाले गठबंधन के प्रमुख के लिए नुक्सानदेह साबित होता है।उसे गठबंधन के सहयोगी रोज अपमानित करते हैं और उसे आखिरकार दुम दबाकर भागना पड़ता है।

जो मोदी से नफरत करते हैं उन्हें मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर इस तरह होने की संभावना का स्वागत करना चाहिए न कि उससे डरना चाहिए। यह निश्चित ही मोदी के करिश्में को तोड़ देगा।

हालांकि अगले चुनाव में भाजपा के सत्ता में आने के अवसर ज्यादा नहीं हैं।1998 में उसने बहुमत के लिए जरूरी 273 सीटों में केवल 182 सीटें हासिल की थीं।और बहुमत जुटाने के लिए उसे कई सहयोगी बनाने पड़े थे।1999 में उसके पास कारगिल युद्ध का इतना फायदा होने के बावजूद भाजपा नीत राजग को 273 के जादुई आंकड़े से कम ही सीटें मिलीं थी और उसे स्पष्ट बहुमत पाने के लिए उसे तेलुगुदेसम का सहयोग लेना पड़ा था।

उस समय भाजपा सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक ताकत थी लेकिन अब वह राज्य में चौथे नंबर पर चली गई है।उसकी ओडिशा की सहयोगी पार्टी बीजद ने  उसका साथ छोड़ दिया है इसलिए यदि उसे 2014 में 150 सीटे मिल जाएं तो वह भाग्यशाली होगी। यदि वह किसी तरह सत्ता में आ जाती है। तो वह बहुत बड़ा और अनुसासन विहीन गठबंधन होगा जिसमें छोटे सहयोगी दल हमेशा प्रधानमंत्री से नाक भौं सिकोड़ते रहते हैं। ऐसे गठबंधन के पास तो बहुमत भी नहीं होगा और 1996-1999 की तरह अल्पसंख्य सरकार तरह शासन करेगा लेकिन हमेशा पर सत्ताच्युत किए जाने का खतरा मंडराता रहेगा।

1996 में देवगौड़ा कर्नाटक के ताकतवर मुख्यमंत्री थे।वे खुशी-खुशी दिल्ली प्रधानमंत्री बनने आए और उन्होंने यह पाया कि प्रधानमंत्री के पास शानो शौकत और और चमक दमक है मगर वास्तविक ताकत नहीं है और वे एक वर्ष से भी कम समय के लिए प्रधानमंत्री रहे।इस बीच कर्नाटक में उनका जनाधार खिसक गया और लौटने के बाद वे उस तरह शक्तिशाली नहीं बन पाए जैसे वे कभी थे।यह निश्चित ही मोदी के लिए एक सबक होगा।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर
(टाइम्स आफ इंडिया में छपे लेख से अनुवादित)