सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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पिछले कई दशकों के दौरान दुनिया ने ऐसे तमाम तरीके देखे हैं, जिसमें एक सक्रिय बाजार व्यवस्था के चलते भौतिक और सामाजिक प्रगति हुई है और साथ ही साथ उसी वक्त पर नैतिकता भी मजबूत हुई है। इसके ठीक उलट, वैसे लोग जो खुली बाजार व्यवस्था के विरोधी आदर्शवादी और योजनाबद्ध व्यवस्था में रहे हैं, उनका आर्थिक विकास एक ही जगह अटक गया। सिविल सोसायटी की हालत और खराब हुई और नैतिकता का पतन हुआ। हाल के दशक में योजनाबद्ध अर्थवयवस्था अपने ही विरोधाभासों के बीच खत्म हो गई। इस तरह के प्रयोग पूरी तरह से व्यवस्थागत नाकामी साबित हुए। तबाही को काफी लंबे समय तक झेलनेवाले लोग इससे छुटकारा पाने के लिए

खुली बाजार व्यवस्था प्रतिस्पर्धा की एक ऐसी जगह है, जहां इंसान का सबसे बेहतरीन बाहर आ सकता है। कंपीटिशन जोरदार है और जब अस्तित्व दांव पर लगा होता है,उस वक्त नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं बचती,लेकिन तमाम तरह की कमियों के बावजूद खुली बाजार व्यवस्था अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए अब तक आजमाई गए तमाम व्यवस्थाओं में सबसे बेहतर हैं।

शुरुआत में ऐसा लगता था कि आत्म-रुचि के आधार पर बनी व्यवस्था व्यक्ति को नैतिक पतन की ओर ले जाएगी। अगर कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के संघर्ष के दौरान आप अपने भाई की मदद करने के लिए पल भर भी रुकते हैं तो कंपीटिटर आपको पीछे छोड़

खुली बाजार व्यवस्था नैतिकता के कुछ पहलुओं को बर्बाद भी करती है और कुछ को बेहतर भी बनाती है। अब इसके नतीजे अच्छे हैं या बुरे या संतुलन में हैं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अच्छी जिंदगी को कोई किस तरह से देखता है।

बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या कोई यह मानने के लिए तैयार है या नहीं कि दूसरी आर्थिक व्यवस्था अच्छा कर सकती है। इस सवाल का सही जवाब केवल तभी मिल सकता है, जब हम उनकी तुलना असल विकल्पों से करें और समझें कि किस तरह अलग-अलग व्यवस्था अलग-अलग तरह के मानवीय चरित्र का विकास करती है।

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मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आज के जमाने में अगर आप किसी यूनिवर्सिटी कैंपस में खुली बाजार व्यवस्था की बात करेंगे तो आप वैश्वीकरण की आलोचनाओं के तले दब जाएंगे। छात्रों और फैकल्टी के बीचअंतरराष्ट्रीय बाजार की मुखालफत की मुख्य वजह दूसरों के हितों की चिंता है। इसके पीछे सामाजिक और नैतिक कारण है। अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो वे मानते हैं कि वैश्वीकरण का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता, लेकिन मैं इसके उलट सोचता हूं। मेरा मानना है कि वैश्वीकरण के चलते न केवल धन संपदा का निर्माण और विस्तार हो रहा है, बल्कि इसमें शामिल पक्षों में बेहतर नैतिक मूल्यों का विकास भी हो

बर्लिन की दीवार को 13 अगस्त 1961 की रात को खड़ा कर दिया गया था। दीवार से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जो 31 जुलाई 1989 तक के हैं-

  • पश्चिमी बर्लिन के ईद-गिर्द बॉर्डर की कुल लंबाई थीः 155 किमी.
  • पश्चिमी और पूर्वी बर्लिन के मध्य बॉर्डर थाः 43.1 किमी.
  • पश्चिमी बर्लिन और पूर्वी जर्मनी के मध्य बॉर्डर थाः 111.9 किमी.
  • बर्लिन के आवासीय इलाकों से निकलने वाला बॉर्डर थाः 37 किमी.
  • बर्लिन दीवार पर मारे गए लोगों की संख्याः 192
  • गोलीबारी में घायल हुए लोगों की संख्याः 200

 

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने की बात की तो कई विश्लेषकों को यह लगा कि बुश अमेरिकी परमाणु उपकरण निर्माताओं के लिए कई अरब डॉलर के ऑर्डर का रास्ता साफ करने में जुटे हैं। कई भारतीय वैज्ञानिकों ने इस करार का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्र में अमेरिकी दखल बढ़ेगा।

भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए दौड़ की शुरुआत हो चुकी है। इस रेस में रूस काफी आगे है। फ्रांस की कंपनी अरेवा दूसरे नंबर पर है। अमेरिकी-जापानी उपक्रम (जीई-हिताची और तोशिबा-

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

हांगकांग 1947 में भी एक उपनिवेश बना रहा। भारतीय नेताओं ने उसके साम्राज्य के बोझ तले दबे होने को लेकर अफसोस भी जताया था। आज

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