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बर्लिन की दीवार को 13 अगस्त 1961 की रात को खड़ा कर दिया गया था। दीवार से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जो 31 जुलाई 1989 तक के हैं-

  • पश्चिमी बर्लिन के ईद-गिर्द बॉर्डर की कुल लंबाई थीः 155 किमी.
  • पश्चिमी और पूर्वी बर्लिन के मध्य बॉर्डर थाः 43.1 किमी.
  • पश्चिमी बर्लिन और पूर्वी जर्मनी के मध्य बॉर्डर थाः 111.9 किमी.
  • बर्लिन के आवासीय इलाकों से निकलने वाला बॉर्डर थाः 37 किमी.
  • बर्लिन दीवार पर मारे गए लोगों की संख्याः 192
  • गोलीबारी में घायल हुए लोगों की संख्याः 200

 

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने की बात की तो कई विश्लेषकों को यह लगा कि बुश अमेरिकी परमाणु उपकरण निर्माताओं के लिए कई अरब डॉलर के ऑर्डर का रास्ता साफ करने में जुटे हैं। कई भारतीय वैज्ञानिकों ने इस करार का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्र में अमेरिकी दखल बढ़ेगा।

भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए दौड़ की शुरुआत हो चुकी है। इस रेस में रूस काफी आगे है। फ्रांस की कंपनी अरेवा दूसरे नंबर पर है। अमेरिकी-जापानी उपक्रम (जीई-हिताची और तोशिबा-

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

हांगकांग 1947 में भी एक उपनिवेश बना रहा। भारतीय नेताओं ने उसके साम्राज्य के बोझ तले दबे होने को लेकर अफसोस भी जताया था। आज

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