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बर्नाड हेनरी लेवी फ्रांसीसी विचारक हैं। उन्होंने तीस से ज्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें बेस्टसेलर अमेरिकन वर्टिगो भी शामिल है। हाल में उनकी किताब लेफ्ट इन डार्क प्रकाशित हुई है।

माइकल नोवाक अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टिट्यूट में रिलिजन, फिलॉसफी एंड पब्लिक पॉलिसी के जॉर्ज फेडरिक जुइट स्कॉलर हैं। वह 25 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं।

माइकल वाल्जर प्रिंस्टन, न्यू जर्सी में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस में प्रोफेसर एमेरिट्स है। उन्हें इकोनॉमिक्स पर कई किताबें लिखी हैं और वह न्यू रिपब्लिक मैगजीन के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर भी हैं।

ही चीनी अर्थशास्त्री हैं वो शेनझान लीगल डेली के पूर्व सीनियर एडिटर हैं। उन्होंने चीनी अर्थव्य्वस्था पर कई किताबें भी लिखी हैं.

शतरंज के पूर्व विश्व चैंपियन गैरी कास्पोरोव लोकतंत्र समर्थक गठबंधन - द अदर रशिया - के नेता है।

जॉन ग्रे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमेरिटस प्रोफेसर हैं।

जगदीश भगवती कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स और लॉ के यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वह इन डिफेंस ऑफ ग्लोबलाइजेशन नाम की किताब के लेखक भी है और आम नीतियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लिखते हैं।

बर्लिन की दीवार को 13 अगस्त 1961 की रात को खड़ा कर दिया गया था। दीवार से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जो 31 जुलाई 1989 तक के हैं-

  • पश्चिमी बर्लिन के ईद-गिर्द बॉर्डर की कुल लंबाई थीः 155 किमी.
  • पश्चिमी और पूर्वी बर्लिन के मध्य बॉर्डर थाः 43.1 किमी.
  • पश्चिमी बर्लिन और पूर्वी जर्मनी के मध्य बॉर्डर थाः 111.9 किमी.
  • बर्लिन के आवासीय इलाकों से निकलने वाला बॉर्डर थाः 37 किमी.
  • बर्लिन दीवार पर मारे गए लोगों की संख्याः 192
  • गोलीबारी में घायल हुए लोगों की संख्याः 200

 

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

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