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दलबदल का दंश

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सहकारिता आंदोलन से खुलेंगे आर्थिक लोकतंत्र के द्वार

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वर्ष 2012 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहकारिता के अंतराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इससे संबंधित सबसे बड़ा सम्मेलन कनाडा के क्यूबेक सिटी में हाल ही में 8 से 11 अक्टूबर के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। विश्व स्तर पर विभिन्न तरह के सहकारी उपक्रमों के लगभग 100 करोड़ सदस्य हैं, जबकि लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

खाली-पीली ईमानदारी

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महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों का केवल व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार होना पर्याप्त नहीं, यह एक बार फिर साबित हो रहा है रक्षामंत्री एके एंटनी की नाकामी से। वह चौतरफा नाकामियों से घिरे हैं। खराब बात यह है कि वह न तो रक्षा सामग्री की खरीद में घपले-घोटाले रोक पा रहे हैं और न ही सेनाओं के आधुनिकीकरण को गति दे पा रहे हैं। इससे भी खराब बात यह है कि उनके कार्यकाल में भारतीय सेना

नए नेतृत्व का एजेंडा

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दुनिया आशावाद और निराशावाद में बंटी हुई है। आर्थिक आशावादियों का विश्वास है कि यदि सरकार बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश करे और उद्यमियों के समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर करे तो बड़ी तादाद में नौकरियों के सृजन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का विकास संभव होगा। इससे कर राजस्व बढ़ेगा, जिसका निवेश गरीबों पर किया जा सकेगा। यदि कुछ दशक तक हम इस नीति का अनुकर

जीएम फसलों पर पूर्वाग्रह

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वर्ष 2013 की शुरूआत में जीएम फसलों के महत्व को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक तौर पर अपने विचार देश के सामने रखे थे। कुछ उसी तरह वर्ष 2014 की शुरूआत भी एग्रीबायोटेक उद्योग के लिए खुशनुमा है। हमारे तमाम वैज्ञानिक प्रधानमंत्री डॉ.

व्यंग्यः काकभुसुण्डि और वित्तमंत्री

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एक राज्य का नया वित्तमंत्री काकभुशुण्डजी से मिलने गया और हाथ जोड़कर बोला कि मुझे शीघ्र ही बजट प्रस्तुत करना है, मुझे मार्गदर्शन दीजिए. तिस पर काकभुशुण्ड ने जो कहा सो निम्नलिखित है:
 

भारत को गरीब बनाया गया है

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जब भी वापस आती हूं वतन किसी विदेशी दौरे के बाद, तो कुछ दिनों के लिए मेरी नजर विदेशियों की नजरों जैसी हो जाती है। बिल्कुल वैसे, जैसे आमिर खान के नए टीवी इश्तिहार में दर्शाया गया है। मुझे भी जरूरत से ज्यादा दिखने लगती हैं भारत माता के 'सुजलाम, सुफलाम' चेहरे पर गंदगी के मुहांसे, गंदी आदतों की फुंसियां और गलत नीतियों के फोड़े।