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अमीरों पर अधिक कर या व्यवस्था में सुधार?

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देश में 'अत्यधिक अमीर' लोगों पर अलग से कर लगाने की बात ने भारी चर्चा को जन्म दिया है लेकिन कोई भी इसके पक्ष में आवाज नहीं उठा रहा है। मैं पूरी ईमानदारी से एक बात कहना चाहूंगा कि वित्त मंत्री के साथ बजट पूर्व चर्चा में मौजूद 10 अर्थशास्त्रियों में से भी मैंने किसी को इसका समर्थन करते नहीं देखा। मुझ समेत चार लोग तो स्पष्ट रूप से इसके विरुद्घ थे। ऐसे में हम अखबारों में इस तरह की

असली मुद्दे से भटकते हम

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वाघ बनाम आदिवासी – अनुसूचित जनजाति (वन अधिकार मान्यता) बिल 2005 पर बहस को इसी रूप में पेश किया जा रहा है। आप अगर वाघ के पक्ष में हैं तो आपको आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए। और यदि आप आदिवासियों के पक्ष में हैं तो इसका मतलब यह है कि वाघ आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। यह पूरीतरह से झूठी दुविधा है।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए पारंपरिक समुदायों के सशक्तिकरण की जरूरत

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केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती

तो फिर अल्का याज्ञनिक, कुमार सानू, सन्नी लियोनी, शबाना आजमी, रेखा सहित औरों पर भी लगाओ प्रतिबंध

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दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा तमाम तरह की मांगे की जा रही हैं और सुझाव दिए जा रहे हैं। हालांकि उनमे से अधिकांश बेहद बेतुके और बेसिर पैर के भी हैं। मजे की बात यह है कि बेतुके और बेसिर पैर की मांगें और सलाह सभी पक्षों (राजनैतिक दलों, अध्यात्मिक गुरुओं, प्रशासन और प्रदर्शनकारी) की ओर से समान रूप से प्रस्तुत किए जा रहे हैं। कोई लड़कियों को मर्यादा में

क्या है मोदी का विकास का माडल? -----(3)

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गुजरात ने इस दलील को गलत साबित कर दिया है कि लोगों को कम दाम में बिजली चाहिए होती है और वह ज्यादा दामों का भुगतान नहीं करना चाहते। गुजरात का अनुभव बताता है कि लोग भुगतान करने को तैयार होते हैं बशर्ते बिजली सप्लाई बेहतर हो। यह ज्योतिग्राम योजना के साथ भी हुआ है। एक बार जब बिजली पूर्व निर्धारित समय पर उपलब्ध हो जाती है तो कृषि के लिए मिलनेवाली सब्सिडाइज्ड रेटवाली बिजली को घरेलू

क्या है मोदी का विकास का माडल? ---(2)

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वैसे मोदी के विकास माडल पर सवाल खड़े करनेवालों की कोई कमी नहीं है। उनकी सबसे बड़ी दलील यह है कि गुजरात में विकास कोई नई बात नहीं है मोदी से पहले के दो दशकों में भी अन्य मुख्यमंत्रियों के शासन में भी तेजी से विकास हुआ इसलिए केवल मोदी को विकास का श्रेय नहीं दिया जा सकता। दूसरा मोदी गुजरात के विकास की बात करते हैं लेकिन उस कालखंड में सारे देश में तेजी से विकास हो रहा था इसलिए दे

क्या है मोदी का विकास का माडल? -----(1)

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विकास, विकास और विकास यही है गुजरात में नरेंद्र मोदी की तीसरी बार शानदार जीत का राज – ऐसा बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है। बात कुछ हद सही भी है क्योंकि इस बार गुजरात विधानसभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया गुजरात का विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा था जिस पर काफी तीखी बहस भी हुई। एक तरफ नरेंद्र मोदी और उनके समर्थक थे जो  गुजरात के असाधारण विकास का पुरजोर

आर्थिकी में सुधार की कोई उम्मीद नहीं!

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आर्थिक जानकारों की मानें तो सन 2013 में यूपीए सरकार से आर्थिकी में सुधार की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। इस लिहाज से सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बसु को सबसे समझदार मानना चाहिए, जिन्होंने कई महीनों पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि 2014 में नई सरकार बनने से पहले किसी बड़े आर्थिक सुधार की उम्मीद नहीं रखें। हालांकि अपवाद के तौर पर सरकार ने कुछ फैसले किए हैं, लेकिन वे प्रतीकात्म

सबसे बेहतर विकल्प है नकद हस्तांतरण

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नकद नारायण के दिव्य दर्शन तो हमेशा ही लोगों को आनंदित करते रहे है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि नकद हस्तांतरण की सरकारी योजना आने के बाद से वह लोग गदगद है जिन्हें इस योजना का लाभ मिलनेवाला है।लेकिन उनसे ज्यादा गदगद यूपीए के नेता हैं जिन्हें लग रहा है कि उनके हाथों में तो गोया जादू की छड़ी लग गई है जिससे अगले चुनाव में उसके पास वोट खींचे चले आएंगे और उसकी जीत सुनिश्चित हो गई है।

आधुनिक मनुष्य अभी तक अस्तित्व में आया ही नहीं: ओशो

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दिल्‍ली गैंग रेप के बाद कोई भारत-इंडिया में भेद को इसका कारण बता रहा है, कोई बॉलिवुड को गाली दे रहा है, कोई अश्‍लीलता तो कोई महिलाओं के कपड़े और उसकी जीवनशैली पर ऊंगली उठा रहा है, कोई पश्चिमीकरण को इसका दोषी ठहरा रहा है, कई खुद को महिला स्‍वतंत्रता के पैरोकार साबित करने में जुटे हैं। सच तो यह है कि अभी ये खुद ही समकालीन मनुष्‍य नहीं हैं। आइए जानते हैं इस सदी के प्रबुद्ध चेतना