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नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च क

किसी देश का भविष्य वहां के बच्चों को मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक शिक्षा जिस प्रकार की होगी देश का भविष्य भी उसी प्रकार निर्धारित होगा। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति आजादी के बाद इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना था। 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। 

ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी सरकारें यह नहीं समझ सकी हैं कि देश के नौनिहालों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए बच्चों को केवल स्कूल तक पहुंचा देने भर से ही काम नहीं बनेगा। तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सा

अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज परिस

पिछले कुछ वर्षों के भीतर देश में छोटे छोटे पब्लिक स्कूलों की संख्या अचानक से बढ़ी हैं। ऐसे स्कूल जिनमें 20 या उससे भी कम छात्र होते हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था के त्रासदीपूर्ण आंकड़ों से परेशान होना एक सामान्य-सी बात हो गई है। स्कूली छात्रों की अध्ययन की उपल्बधियां दयनीय ढंग से कम हो रही हैं और लगातार नीचे ही गिर रही हैं। इसके साथ ही बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बढ़ती सार्वजनिक रूप से होनेवाली नकल और शिक्षकों की अनुपस्थित भी इसकी एक वजह है। हालांकि, शिक्षा के लिए बनी जिला सूचना प्रणाली यानि कि डायस के आंकड़े ये जाहिर करते हैं कि इसके पीछे कि वजह

वर्ष 2016 के अंत के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। अतः मध्यावधि समीक्षा के लिये यह अच्छा समय है। मगर ऐसी किसी भी समीक्षा पर विमुद्रीकरण आघात से जुड़ी घटनाओं का प्रभुत्व तो रहेगा ही। इस एक अल्पावधि के घटनाचक्र को छोड़कर सरकार को अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में किस एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार पर जोर देना चाहिये? तो मैं यह कहूँगा कि यह हमारी विफल शिक्षा नीति है जिसमें सुधार की जरुरत है। आगे पूरा आलेख इसी बात की व्याख्या करेगा कि ऐसा क्यों जरुरी है?

सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सरकार की अनुमति को आवश्यक बताया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूली फीस एक बड़ा मुद्दा है; सामाजिक मुद्दा भी और राजनैतिक मुद्दा भी। एक तरफ स्कूल प्रबंधन अपने खर्चे का हवाला देते हुए फीस वृद्धि को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश करता है वहीं अभिभावक और उनके साथ साथ सरकार इसे स्कूलों की मनमानी बताती है। अभिभावक चाहते हैं कि स्कूली फीस के मामले में सरकार दखल दे और स्कूलों की मनमानी से उन्हें निजात दिलाए। शिक्षा के क्षेत्र मे

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