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स्वतंत्रता होने पर ही समता के लिए संघर्ष संभव - ओशो

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समाजवाद कहता है कि हम समानता लाना चाहते हैं। लेकिन बड़ा मजा यह है कि और इसलिए समाजवाद कहता है कि समानता लाने के पहले स्वतंत्रता छीननी पड़ेगी। तो हम स्वतंत्रता छीनकर सब लोगों को समान कर देंगे। लेकिन ध्यान रहे कि स्वतंत्रता है तो समानता के लिए संघर्ष कर सकते हैं लेकिन अगर स्वतंत्रता नहीं है तो समानता के लिए संघर्ष करने का कोई उपाय आदमी के पास नहीं रह जाता है।

राजनीति में हैं नई आर्थिक सक्रियता की जड़ें

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छह महीने पहले सरकार निराशा और पंगुता की शिकार नजर आ रही थी। लगता था कि यह किसी को भी (खासकर ममता बनर्जी को) नाराज करने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाएगी। लेकिन जब से चिदंबरम वित्तमंत्री बने हैं तब से सरकार किसी ऐसे सुधारवादी कार्यकर्ता जैसी लग रही है, जो किसी भी सूरत में अपने लक्ष्य से कम किसी भी चीज पर राजी नहीं होने वाला। संसद में हार का खतरा उठाकर भी मल्टीब्रांड रिटेल का मामला

कंगाली में उड़नखटोला

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क्या आप मुझे बता सकते हैं कि वीवीआइपी हेलिकॉप्टर क्या होता है? इस वाहन पर सवार होने का किसे अधिकार होगा? और भारत देश की गरीब जनता को इस वीवीआइपी सवारी पर क्यों छत्तीस सौ करोड़ रुपए खर्च करने की जरूरत है?

विदेशों से हथियार खरीदने से अच्छा है रक्षा उत्पादन में प्रायवेट सेक्टर को मौका दिया जाए

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रक्षा सौदों और घोटालों का चोली दामन का साथ रहा है। रक्षा सौदा हो उसमें घोटाला होने  के आरोप न लगें यह संभव नहीं है। हालांकि बोफर्स घोटाले से सबक लेकर सरकारें बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखती हैं इतना फूंक-फूंक कर कि सेना के विभिन्न अंगों की हथियारों और सुरक्षा प्रणलियों की खरीद के मामले में हम पिछड़ते जा रहे हैं। इसके बावजूद घोटाले हैं कि पीछा नहीं छोड़ते। जब अरबों रूपयों के स

संघर्ष से मिली पहचान अब मिल रहा सम्मान

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इस साल जब कमानी ट्यूब की चेयरपर्सन कल्पना सरोज अपना पद्म श्री पुरस्कार राष्ट्रपति से ग्रहण करने जाएंगी तो वह उस अवसर पर हीरों का हार और कांजीवरम साड़ी पहनेंगी। हालांकि इस सम्मान को ग्रहण करने के लिए वह अपने हवाई जहाज से दिल्ली आना चाहती हैं लेकिन खरीद के लिए बातचीत तब तक पूरी होगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता है।  वह पूछती हैं, 'आप क्या सोचते हैं?'  हालांकि उनकी आवाज थ

औद्योगिकीकरण से ही मिलेगी गरीबी से मुक्ति – महादेव गोविंद रानडे

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अठारहवी सदी में अंद्रेजों के समय में जस्टिस के तौर पर काम करनेवाल महादेव गोविंद रानडे  बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे ऊचे दर्जे के उदावादी चिंतक थे तो जुझारू समाज सुधारक भी। वे भारत की औद्योगिक क्रांति के स्वप्नद्रष्टा थे जिन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने की भरपूर कोशिश की। उनकी दृढ़ मान्यता थी यदि भारत की गरीबी को दूर करना है तो उसका एक ही उपाय है तीव्रगति से औद्योगिक विक

विकास की पटरी

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बिल्कुल वैसे जैसे अलग आईनों में कभी अपनी ही शक्ल अलग दिखती है वैसे ही मैंने जैसे किसी दोमुंहे आईने में भारत के दो अक्स देखे पिछले हफ्ते। कोलकाता के साहित्य सम्मेलन में जाने-माने अर्थशास्त्री डाक्टर अमर्त्य सेन को सुना तो लगा कि उन्होंने अपने शब्दों से दर्पण में ऐसा चित्र बनाया इस देश का, जिसमें न उम्मीद थी, न रंग और न कोई समृद्धि की संभावना। दिल्ली पहुंची तो गुजरात के मुख्यमं

प्रधानमंत्री का ध्यान कृषि की तरफ आकर्षित करने के लिए किसान और क्या करें ?----(1)

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बारहवी पंचवर्षीय योजना के मसौदे को दिल्ली में हुई राष्ट्रीय विकास परिषद में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपनी स्वीकृति दी। लेकिन उनके सामने प्रधानमंत्री ने कृषि नीति के बारे में जो मार्गदर्शन किया वह बहुत भयावह है।

आरक्षण के मुकाबले दलितों के उत्थान में मुक्त बाजार ज्यादा कारगरः चंद्रभान प्रसाद

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दलित विचारक व चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा है कि देश के दलितों के उत्थान की प्रक्रिया में आरक्षण के मुकाबले मुक्त बाजार व्यवस्था ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा है कि आरक्षण की व्यवस्था महज 10 प्रतिशत लोगों का फायदा कर सकती है जबकि मुक्त बाजार व्यवस्था में 90 प्रतिशत दलितों के उत्थान की क्षमता है। बाजारवाद के फायदों को गिनाते हुए चंद्रभान ने कहा कि यह बाजारवाद की ही देन है कि स