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आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी।

प्राचीन काल से ही भारत व्यापार एवं व्यवसाय को प्राथमिक स्तर की वरीयता देने वाला देश रहा है। चाणक्य की अर्थनीति में भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा में भी अर्थ को प्रथम वरीयता पर रखा गया है। ऋग्वेद में भारत को कृषि एवं पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मध्य-युगीन भारतीय इतिहास को देखें तो वहां भी भारत की स्थिति व्यापार एवं व्यवसाय के अनुकूल नजर आती है। चूँकि इस दौरान अरब व्यापारियों का भारत में व्यापार के लिए आगमन हो चुका था और यूरोप के लोग भी समुद्री मार्ग से भारत आने का रास्ता खोजने लगे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी भ

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में की जा रही मनमानी वृद्धि को लेकर पैरंट्स मे खासा आक्रोश है। हर नए साल में 30-40 प्रतिशत फीस बढ़ाना सामान्य बात हो गई है। पैरंट्स की मांग है कि सरकार स्कूल मालिकों की इस मनमानी पर अंकुश लगाए। उनकी मांग सही है। शिक्षा को पूरी तरह बाजार पर नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन, सरकारी दखल की अलग समस्याएं है। पूरे देश में सरकारी स्कूलों की बदहाली बताती है कि सरकारी दखल से प्राइवेट स्कूलों का भी यही हाल हो जाएगा।

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट?

भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून ऐ

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

9 नवंबर को पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी को बांटने वाली बर्लिन की दीवार को वहां के नागरिकों के द्वारा ढहाए जाने की घटना के 27 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 1989 में इसी दिन दो भागों में बंटा जर्मनी देश फिर से एक हो गया था। मार्क्सवादियों द्वारा साम्यवाद के जरिए स्वर्ग हासिल करने और पूंजीवादियों के चंगुल से श्रमिकों को आजादी दिलाने का सब्ज़बाग लोगों को ज्यादा दिनों तक फुसलाकर रखने में सफल नहीं रहा। बंदूक की नोंक पर थोपी गई स्वर्ग की इस परिकल्पना से ऊबरते हुए नागरिकों ने जो भी औजार दिखा उसी से न केवल दीवार ढहाई बल्कि साम्यवाद की नींव भी हिलाकर रख दी। प्रस्तु

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

देश में बढ़ते कालेधन (ब्लैक मनी), आतंकवादियों की फंडिंग और जाली करेंसी की समस्या के समाधान के लिए मोदी सरकार ने बीते 8 नवंबर 2016 की रात से 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद से काले धन का मुद्दा लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया है। तमाम विशेषज्ञ इसे कालेधन पर रोक लगाने के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा उठाया गया मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं वहीं कुछ लोग इसके कारगर साबित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।

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