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भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून ऐ

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

9 नवंबर को पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी को बांटने वाली बर्लिन की दीवार को वहां के नागरिकों के द्वारा ढहाए जाने की घटना के 27 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 1989 में इसी दिन दो भागों में बंटा जर्मनी देश फिर से एक हो गया था। मार्क्सवादियों द्वारा साम्यवाद के जरिए स्वर्ग हासिल करने और पूंजीवादियों के चंगुल से श्रमिकों को आजादी दिलाने का सब्ज़बाग लोगों को ज्यादा दिनों तक फुसलाकर रखने में सफल नहीं रहा। बंदूक की नोंक पर थोपी गई स्वर्ग की इस परिकल्पना से ऊबरते हुए नागरिकों ने जो भी औजार दिखा उसी से न केवल दीवार ढहाई बल्कि साम्यवाद की नींव भी हिलाकर रख दी। प्रस्तु

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

देश में बढ़ते कालेधन (ब्लैक मनी), आतंकवादियों की फंडिंग और जाली करेंसी की समस्या के समाधान के लिए मोदी सरकार ने बीते 8 नवंबर 2016 की रात से 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद से काले धन का मुद्दा लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया है। तमाम विशेषज्ञ इसे कालेधन पर रोक लगाने के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा उठाया गया मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं वहीं कुछ लोग इसके कारगर साबित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।

भारत में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाने वाले दीपावली के त्यौहार को मनाने के मुख्यतः दो कारण हैं। पहला कारण, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लंकापति रावण का संहार कर अयोध्या के राजा राम, भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ अपने राज्य वापस लौटे थे। पुष्पक विमान से रात के अंधेरे में अयोध्या पहुंचे राम के स्वागत के लिए अयोध्यावासियों ने घर के बाहर दिए जलाए और रौशनी कर विमान को यथास्थान उतरने की राह दिखाई। कालांतर में यह उस घटना को याद करने और खुशी मनाने की परंपरा के तौर पर प्रचलित हुआ। दूसरा कारण, धन, सुख और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना कर धनार्

डेनमार्क की पहचान आमतौर पर यूरोप के खूबसूरत देश के तौर पर हैं लेकिन यहां की एक खासियत एक और है जिसे कम ही लोग जानते हैं। यहां दुनिया में सबसे तेजी से अदालती कार्रवाई पूरी होती है। डेनमार्क ही नहीं उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और फिनलैंड की गिनती भी ऐसे ही देशों में होती है जहां तेजी से मुकदमों का निपटारा होता है।

एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

- फ्रेजर इंस्टिट्यूट व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा जारी वैश्विक रैंकिंग में 102 से फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंचा भारत
- आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भूटान (78), नेपाल (108) व श्रीलंका (111) से पिछड़ा पर चीन (113), बांग्लादेश (121) व पाकिस्तान (133) से रहा आगे
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र देशों की सूची में हांगकांग शीर्ष पर, सिंगापुर व न्यूजीलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे पायदान पर

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

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