लोकतंत्रों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता को जरूरी मानते थे फ्रीडमैन

इस साल 31 जुलाई को विश्वविख्यात नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की सौंवा जन्मदिन मनाया जाएगा। फ्रीडमैन न केवल आर्थिक वरन सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्व देनेवाले व्यक्ति थे।उनकी सोच  भारत के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है इस पर विचार करने की जरूरत है।

इस संदर्भ में एक बहुत दिलचस्प बात यह है कि फ्रीडमैन का भारत से बहुत गहरा रिश्ता था।1967 में उनके नोबल पुरस्कार जीतने से बहुत पहले1955 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस जाने माने अर्थशास्त्री को भारत में यहां की आर्थिक योजनाओं को मार्गदर्शन देने के लिए बुलाया था। उनके साथ गालब्रैथ नामक एक दूसरे प्रमुख अमेरिकी अर्थशास्त्री को भी बुलाया गया।गालब्रैथ की विचारधारा जान मेनार्ड केंज के सिद्धांतों से प्रभावित थी और सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में काफी योगदान दिए जाने के पक्ष में थी। इसलिए उनकी सोच नेहरूजी की रूस की क्रांति की समाजवादी दार्शनिकता से प्रभावित सोच से मेल खाती थी।

दूसरी तरफ फ्रीडमैन पूंजीवाद के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। लेकिन तब के भारत की वास्तविकताओं को देखते हुए उन्होंने पूर्णरूप से पूंजीवाद की मांग तो नहीं की लेकिन निजी उद्योगों के लिए स्वतंत्रता की मांग अवश्य की। 1955 में सरकार को दिए गए 5000 शब्दों के एक स्मरण पत्र फ्रीडमैन ने कम शब्दों में ऐसी बातें कही है जिनमें स्पष्ट होता है कि उनकी सोच कितना दूरदर्शितापूर्ण थी।

फ्रीडमैन ने उस स्मरणपत्र में कहा था कि सरकार अर्थव्यवस्था को जितना ज्यादा  हाथ में ले रही थी उतना वह संभाल नहीं पाएगी। उन्होंने पश्चिम यूरोप की तंगहाली में सरकारी कंपनियों की नाकामयाबी पर प्रकाश डालते हुए भारत को चेतावनी दी कि इस राह पर चलना कभी भी उचित नहीं होगा। इस बात का एहसास हमें 1991 में हुआ और आज भी एयर इंडिया की डूबती हुई हालत से हो रहा है। इस सरकारी विमान सेवा से सस्ती विमान सेवा अपलब्ध करानेवाली कंपनियां हैं जिनसे कम धनी लोग यात्रा करते हैं। तो यह महंगी डूबती हुई सरकारी कंपनी को चलाने का क्या औचित्य है।

निवेश के बारे में भी फ्रीडमैन की सोच बहुत व्यावहारिक थी। उनके अनुसार उस पर यह सोचकर कड़े नियंत्रण लगाना सही नहीं होगा कि  सरकार निर्धारित कर सकती है कि   किस तरह का निवेश देश के लिए लाभकारी है। उन्होंने कहा कि सरकार तो क्या विदेशों में निजी कंपनियों ने भी इस विषय पर जब अनुमान लगाने की सोची तो बहुत सी कंपनियां असफल रहीं।

आजादी के बाद शुरूआत में भारत की अर्थव्यवस्था का सारा जोर या तो भारी उद्योगों या ग्रामोद्योगों पर था और दोनों ही प्रकार के उद्योगों के लिए सरकारी सहायता के प्रावधान थे। फ्रीडमैन इससे सहमत नहीं थे।उनका मानना था कि इससे दोनों की कार्य़क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा और यह बात सही निकली।

नए-नए आजाद हुए भारत में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध होना ठीक था लेकिन जिस हद तक ऱूपये की कीमत तय करने में सरकार का दखल था फ्रीडमैन उसके कड़े विरोधी थे।आज भी रूपये की गिरती हुई कीमत इस यथार्थ को को सिद्ध करती है। फ्रीडमैन ने अपने स्मरण पत्र में कहा था कि भारत की कड़कती थकावट पैदा कर देनेवाली धूप और बहुत से लोगों के रूढ़ीवादी विचारों के बावजूद यदि हम सही नीतियां अपनाएं तो पांच प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकते हैं।और 1991 के बाद ठीक ऐसा ही हुआ।

इस स्मरण पत्र को दुनिया के सामने लाने का काम उसे लिख जाने के 37 साल बाद मेरे एक परिचित और जानेमाने अर्थशास्त्री सुब्रोतो राय ने किया।1998 में फ्रीडमैन ने सुब्रोतो को लिखा – यदि आज मैं यह स्मरण पत्र लिख रहा होता तो 43 साल में हुए बहुत से परिवर्तनों को देखते हुए अंतर तो होता परंतु मुख्य रूप से बातें वहीं रहतीं। लेकिन फ्रीडमैन का भारत पर लेखन केवल स्मरण पत्र तक सीमित नहीं है।1963में अपनी दूसरी भारत यात्रा के दौरान फ्रीडमैन ने एक निबंध लिखा जिसमें उन्होंने पाया कि कुछ भारतीय बुद्धिजीवी अब उतने कट्टर समाजवादी नहीं  रहे जितने वे आठ साल पहले थे जब उन्होंने स्मरण पत्र लिखा था। उन्होंने लिखा कि गरीबी में भी कोई खास कमी नहीं आई थी और पंचवर्षीय योजनाएं अब भी नागरिकों को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं दे रही थी।

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा था कि अमेरिका में सेकंड हैंड गाड़ी 22 डालर की बिकती है वह भारत में 7500 से 10000 रूपये में बिक रही है।यदि उस गाडी के व्यापार पर इतने प्रतिबंध न होते तो वह बाहर से बेचकर खरीदने में सस्ती पड़ती।इस निबंध में भी फ्रीडमैन ने सरकारी कंपनियों को चलाने की आलोचना की थी। फ्रीडमैन ने अपने लेखन में जो लिखा उसे अमल में लाने की शुरूआत 1991 में हुई। लेकिन अब भी बहुत कुछ करना बाकी है। उसी साल फ्रीडमैन ने एक भाषण में भारत की दुर्दशा का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रजातंत्रों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता आवश्यक है।

फ्रीडमैन की प्रासंगिकता को केवल उनके द्वारा भारत के बारे में लिखी बातों या कही गई बातों से नहीं आंका जा सकता। आज भारत में शिक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस विषय पर फ्रीडमैन कट्टर उदारवादी आयन रैंड की सोच नहीं अपनाई क्योंकि उनका मानना था कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सरकार की जिम्मेदारी बनती है। उसका काम केवल फौज और पुलिस के द्वारा सीमाओं की रक्षा करना, कानून व्यवस्था को बनाए ऱखना नहीं है।लेकिन शिक्षाा के मुद्दे पर फ्रीडमैन की सोच बहुत अनोखी थी। उनकी सोच यह थी सरकार गरीब बच्चों को वाउचर द्वारा उनकी फीस देकर उन्हें निजी स्कूलों में पढ़ाए और जहां तक हो सके खुद स्कूल न खोले। अपने देश में हम देख रहे हैं कि निजी स्कूल सराकारी स्कूलों से बेहतर हैं। बहुत से देशों ने फ्रीडमैन का यह वाउचर को जरिया अपनाया है और उन देशों में गरीब बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा मिली है।ऐसे देशों के उदाहरण है-अमेरिका .स्वीडन और हालैंड।हमारे पडोसी देश पाकिस्तान में भी कुछ क्षेत्रों में इस तकनीक ने अच्छे रंग दिखाए हैं और यह हमारे देश के कई इलाकों में कामयाब रहा है। अब भारत सरकार ने शिक्षा केअधिकार कानून की धारा12 के तहत गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण तय करके विश्व की सबसे हड़ी वाउचर स्कीम का उद्घाटन कर दिया है और उम्मीद है कि वह रंग लाएगी।

पर्यावरण की समस्या पर अपने विचार प्रगट करते हुए उन्होंने आदिवासी समुदायों को जंगल के इलाकों पर पूरे अधिकार देने की राय दी क्योंकि पर्यावरण उनके जीवन आधार है और वे पारंपरिक रूप से उसके साथ रहना जानते हैं। उनका मानना था कि सरकार को उसमें दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। हमने कुछ ही सालों पहले आदिवासियों को इस तरह के अधिकार दिए हैं। अगर हम यह बात पहले ही समझ गए होते तो हमारे देश को नक्सलवाद रूपी दहशत का सामना नहीं करना पड़ता। वैसे नए कानूनों पर अछ्छी तरह से कार्य़ान्वयन नहीं हो रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बांबू के जंगलों पर आदिवासियों को अधिकार देने में हुई रूकावटों का पता चलता है। जबकि सच्चा पूंजीवाद अमीर व्यापारी और गरीब आदिवासी को उतनी ही आर्थिक स्वतंत्रता देता है।

इस 31 जुलाई को पूरा विश्व फ्रीडमैन की सौंवी जयंती मनाएगा। भारत में फ्रीडमैन के बहुत से विचारों पर अमल की जरूरत है।

- कर्मण्य थडानी

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.