माइक्रोफाइनेंस को बुरा ना माने

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हमारे देश में एक अद्भुत घटना घट रही है। तीन करोड़ गरीब महिलाओं ने छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ऋण लिए हैं।

इस राशि से वे या तो एक गाय खरीदती हैं, ताकि दूध का व्यवसाय कर सकें, या वे इस राशि का निवेश एक सिलाई मशीन में करती हैं, ताकि कपड़े बेच सकें या फिर वे एक किराना दुकान खोल लेती हैं। जो कार्य गैरसरकारी संगठनों द्वारा चैरिटी के रूप में प्रारंभ किया गया था, वह अब आत्मनिर्भर व्यवसाय का रूप ले चुका है। इस परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं पेशेवर माइक्रोफाइनेंस कंपनियां, जो धीरे-धीरे देहाती साहूकारों को दृश्य से बेदखल करती जा रही हैं। कई जिलों में तो माइक्रो-क्रेडिट अब इतना आम हो गया है, जैसे मोबाइल फोन या पान की दुकान।

लेकिन सफलता ईर्ष्या को भी जन्म देती है। माइक्रोफाइनेंस के साथ भी यही हुआ। समस्या की शुरुआत अक्टूबर में हुई, जब आंध्रप्रदेश में राजनेताओं ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को ‘लोन शार्क’ की संज्ञा देते हुए उन्हें किसानों की आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया। ब्याज की दरों को नियंत्रित करने को कहा गया और महिलाओं से कह दिया गया कि वे ऋण न चुकाएं। माइक्रोफाइनेंस कर्मचारियों को कैद किया जाने लगा।

सरकार ने अध्यादेश जारी किया कि अब माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को ऋण देने से पहले सरकार की अनुमति लेना होगी। इसका मतलब था 1.3 करोड़ छोटे-छोटे ऋणों के लिए सरकारी मंजूरी, जो कि तकरीबन नामुमकिन था और लाइसेंस राज की याद दिलाता था। नतीजा यह रहा कि एक दशक में जिस क्रेडिट कल्चर का धीरे-धीरे विकास हुआ था, वह नष्ट हो गई। इसके साथ ही तीन करोड़ लघु उद्यमियों की उम्मीदें भी धूमिल होने लगीं।

माइक्रोफाइनेंस कंपनियां 24 से 32 फीसदी तक ब्याज लेती हैं। यह दर अधिक लग सकती है, लेकिन क्रेडिट कार्ड पर भी हमें 30 फीसदी की दर से ब्याज चुकाना पड़ता है, जबकि देहाती साहूकार 60 से 100 फीसदी तक सूद वसूलते हैं। यहां तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ग्रामीण बैंक भी 20 फीसदी की दर से ब्याज लेती है। सच्चाई यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में साप्ताहिक रूप से ऋण देना और संकलित करना महंगा काम है। माइक्रोफाइनेंस का यह दुर्भाग्य रहा कि कुछ खराब छवि के लोग उसमें प्रवेश कर गए और जबरिया वसूली करने लगे। किसानों की आत्महत्या भीषण त्रासदी है, लेकिन पेशेवर माइक्रोफाइनेंसरों के कारण किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा हो, यह संभव नहीं है।

माइक्रोफाइनेंस के विरुद्ध अभियान इसलिए चलाया गया, क्योंकि वह सरकारी अनुदान योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। लेकिन जहां सरकारी योजनाओं में काम कराने के लिए गरीब महिलाओं को शहरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, वहीं उन्हें अधिकारियों को घूस भी खिलानी पड़ती थी। माइक्रोफाइनेंस इस लाइसेंस राज प्रणाली से मुक्त है। इस बात से इनकार नहीं कि माइक्रोफाइनेंस को नियंत्रित किया जाना चाहिए, लेकिन उसके बेहतर तरीके हैं। गरीबों को चैरिटी नहीं, अपॉचरूनिटी (अवसर) चाहिए।

-गुरचरन दास

Micro finance is a

Micro finance is a great success wherever it is started. Its sad and shocking to see that any such move at macro level is ever opposed by institutional forces. Anoop

माइक्रो फाइनेंस

मै कुछ दिन पहले ही आजाद मी का प्रशंसक बना जब पहली बार आपका लेख पढा तो मुझे अपनी मानसिक विचारधाराओ मे परिवर्तन अनुभव हुआ , और जब आपका लेख माइक्रो फाइनेंस पढा तो अपने को टिप्पणी करने से न रोक पाया । मै भी एक माइक्रो फाइनेंस कमेटी का सदस्य हूँ और ये कमेटियाँ लगभग हर गांव मे है पर ये कमेटियाँ माइक्रो फाइनेंस कंपनियो से अलग है ये कमेटियाँ आर डी प्लान चलाती हैं जिस पर ये सदस्य को लगभग इक्कीस प्रतिशत का लाभ देते है और जब कोई लोन लेना चाहता है तो सो रुपए की आर डी पर दसहजार रुपए तक देते है और ब्याज़ दो प्रतिशत मासिक होता है जिसे छः माह मे जमा करना जरूरी है और पहले तो लोन ही आर डी के हिसाब से देते है फिरभी यदि किसी सदस्य पर लोन का कुछ बकाया रह जाता है तो उसकी एक आर डी और खोल दी जाती है कुलमिलाकर सदस्य अपनी ज़रूरत के हिसाब से आर डी चलाते है और जो ब्याज़ उन्हे कमेटी को देना होता है उसका अधिकतर वापस मिल जाता है क्योकि कमेटी का प्रबंधन गांव के ही कुछ लोग करते है और अगले साल दूसरे इच्छुक लोगो को मौका मिलता है लोन के लिए ज्यादा कार्यवाही भी नही है और ये गांव काफी तरक्की कर रहे है मैने भी अपने घर के लिए लोन लिया है अब बात करता हूँ बैंक लोन की मै अपने घर के लिए बैंक से दो लाख का लोन कराना चाहता था बैंक गया तो पता लगा जल्दी और पूरा लोन कराना है तो कुछ यानि पांच हजार रुपए खर्च करने होंगे वरना बैंक के नियम ही पूरे नही होंगे कहने को ब्याज़ दस से भी कम लेकिन पैसे जब मिलेंगे जब सामान का बिल जमा करेंगे राजमिस्त्री का भी बिल जमा होगा जबकि कोई भी दुकानदार बिल माँगने पर टैक्स अतिरिक्त माँगता है और औसत टैक्स दस प्रतिशत है दो लाख रुपए दो साल के लिए लेने पर पांच हजार सुविधा शुल्क पँद्रह हजार ब्याज़ और बीस हजार बिल का टैक्स यानि चालीस हजार ज्यादा देने होंगे और जब गणना करें तो ब्याज़ इन फाइनेंस कम्पनियो से भी ज्यादा बैठता है अब इसे कोई क्या कहेगा ।बैंको की दरियादिली या सरकार की गरीबनवाज नीति जो इन ग्रामीण कमेटियों को भी तिरछी निगाह से देखा जा रहा है