एक अच्छी कल्पना को साकार कीजिए

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नंदन नीलेकणी की अगुआई में सशर्त नकद हस्तांतरण (कंडीशनल कैश ट्रांसफर या सीसीटी ) के लिए एक मंत्रीस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जो मुख्य तौर पर केरोसिन, एलपीजी (रसोई गैस) और खाद में सीसीटी आजमाने पर विचार करेगा। अगले चार महीनों में हमारे सामने एक योजना होगी। इस वित्त वर्ष के अंत तक प्रायोगिक स्तर पर आरंभिक परीक्षण शुरू हो जाएगा और फिर 2012-13 के बजट में इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। कुछ इसी हिसाब से काम के आगे बढ़ने की उमीद की जानी चाहिए।

यहां टास्क फोर्स जैसे शब्द का इस्तेमाल एक मायने में रोचक है। टास्क फोर्स मूल रूप से सैन्य शब्दावली का हिस्सा है। लेकिन सब्सिडी को लक्षित करने के लिए सैन्य या तकनीकी जैसी कोई समस्या नहीं है। ये एक टास्क (करने योग्य कार्य) जरूर है, क्योंकि अब मौजूदा सब्सिडी प्रक्रिया की खामियों को स्थापित करने के लिए किसी नए शोध की जरूरत नहीं रह गई है। लेकिन क्या इन सब्सिडी को लक्षित करने के लिए हमारे पास समुचित फोर्स (बल) भी है?

आइए पहले विशिष्ट पहचान (यूनीक आइडेंटिटी) और आधार संख्या की बात कर लें। क्या यह अनिवार्य है या वैकल्पिक? यूआईडीएआई के वेबसाइट पर लिखा गया है ‘‘निजी अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू करने में आधार नींव की तरह काम करेगा। राज्य के पास एक व्यक्ति की स्पष्ट पहचान और पंजीकरण कर ही उसके निजी अधिकारों- जैसे कि रोजगार, शिक्षा और भोजन, इत्यादि- को सुनिश्चित किया जा सकता है। इस तरह पहचान और पंजीकरण को सुनिश्चित करने वाली यह आधार संख्या निजी अधिकारों को लागू करने में राज्य के लिए काफी मददगार साबित होगी।’’ इस तरह आधार एक शक्तिशाली साधन है, लेकिन मूल मुद्दा यह है कि हम इसका इस्तेमाल किस काम के लिए करते हैं। यह तय करने से पहले कम-से-कम इतना तो निश्चित है कि इससे दोहरी और फर्जी पहचान (एक ही जैसे पहचान पत्र दो लोगों के पास होना या एक आदमी के पास दो अलग पहचान पत्र होना) के मामलों में कमी आएगी। ये महत्वपूर्ण है, लेकिन ये आधार संख्या के कई संभावित फायदों का एक छोटा हिस्सा भर है।

मूल रूप से आधार का विचार सुरक्षा की दृष्टि से सामने आया। एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या राजग) शासन काल में, भारत के निवासियों की बजाय भारतीय नागरिकों को पहचान संख्या देने की बात सोची गई थी। इसमें सब्सिडी की बात तो बाद में आकर जुड़ गई। चूंकि यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन या संप्रग) सरकार सुरक्षा और आप्रवासी मुद्दे को ज्यादा तूल देने के हक में नहीं थी, हमने अपना ध्यान सब्सिडी की ओर कर दिया और इसे नागरिक से निवासी केंद्रित कर दिया। इस योजना के तहत ली जा रही अत्यधिक सूचनाओं (नाम, उम्र, निवास, आदि) के साथ इन्हें व्यवस्थित करने और इनकी गोपनीयता बनाए रखने जैसी दूसरी गंभीर समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं। यूआईडीएआई के कुछ सदस्य गुपचुप तरीके से ये प्रस्ताव भी रख चुके हैं कि लोगों के जमा डाटा (आंकड़े) बेच कर यूआईडीएआई के लिए धन भी जुटाया जा सकता है। फोटोग्राफ और बायोमेट्रिक मशीनों की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन अभी इन बात छोड़ देते हैं। दावोस में योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा, ‘‘हम सरकारी कार्यक्रमों के लाभार्थियों के लिए यह अनिवार्य करने जा रहे हैं कि वे यूआईडी नंबर या आधार संख्या के लिए अपना पंजीकरण कराएं।’’ उनके इस बयान को ध्यान में रखते हुए हमें इधर-उधर की बातें करनी बंद कर देनी चाहिए। आधार सब्सिडी पाने के लिए अनिवार्य है और नीलेकणी की टास्क फोर्स को इसी आधार पर सीसीटी के लिए योजना को तैयार करना है और उसकी प्रायोगिक जांच करनी है।

लेकिन अब हम उस समस्या की बात करते हैं जिसका हल कोई टास्क फोर्स नहीं ढूंढ सकती। इसका हल सरकार को करना है, लेकिन यूपीए सरकार अभी तक इस मामले में नाकाम रही है। सीसीटी की कामयाबी भी काफी हद तक इस मुद्दे पर भी निर्भर है। सब्सिडी के पात्र वो हैं जो गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) हैं। लेकिन हमारे सामने समस्या ये है कि जिन्हें बीपीएल कार्ड जारी होना चाहिए था, उनमें से कइयों को ये नहीं मिला और जिन्हें बीपीएल कार्ड नहीं दिया जाना चाहिए था, उनमें से कइयों को यह मिल गया। अगर अध्ययन से ये बात सामने आ रही है कि जनवितरण प्रणाली का फायदा गैर-बीपीएल लोगों को मिल रहा है तो हमें सतर्क होना होगा। हालांकि यह हो सकता है कि जिन लोगों तक इसका फायदा अनुचित रूप से पहुंच रहा उनमें से कई बीपीएल कार्ड के याग्य भी होंगे, लेकिन उन्हें कार्ड मिल नहीं पाया।

गरीबी के आंकड़ों का अभी तक हमने क्या किया? एनएसएस के 61वें सर्वे के बाद 2004 में जो डाटा सामने आया, उसके आधार पर हमने गरीबी रेखा में कुछ सुधार किया और गरीबों की तादाद बदल गई। हम लोग ऐसा ही कुछ 2009-10 के एनएसएस के 66वें सर्वे का डाटा सामने आने के बाद भी करेंगे। इससे कोई सार्थक नतीजा नहीं निकलने वाला, क्योंकि एनएसएस एक सर्वे है कोई जनगणना नहीं। नौवीं पंचवर्षीय योजना से विकेंद्रीकृत और सहभागितापूर्ण तरीके से बीपीएल परिवारों की पहचान की बात उठने लगी है और दसवीं पंचवर्षीय योजना में इसके संकेतक तय कर दिए गए।

यहां एक और बयान पेश करते हैं, जून 2009 में संसद में राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण के 32 वें अनुच्छेद में कहा, ‘‘लक्षित पहचान पत्र बीपीएल की मौजूदा बहुउद्देशीय सूची की जगह ले लेंगे। अभी तक सभी कार्यक्रमों के लिए एक ही बीपीएल सूची का इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन अब हर कार्यक्रम के उद्देश्य के मुताबिक लाभार्थियों का चयन किया जाएगा, और एक सामान्य सिद्धांत के तहत ये चयन ग्राम सभा और नगर निकायों के द्वारा किया जाएगा... लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाएगी, ताकि कोई उसे चुनौती देना चाहे तो दे सके।’’ हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अनुच्छेद 32 को यूपीए-2 के पहले सौ दिनों के अंदर ही लागू किया जाना था। अगर सीटीटी टास्क फोर्स के पास सिर्फ एक टास्क न होकर वाकई में कोई फोर्स भी होता तो अब तक ये योजना लागू हो चुकी होती। और न केवल खाद और पेट्रोलियम उत्पाद बल्कि खाद्य सब्सिडी भी इस सूची में शामिल कर ली जाती।

खाद्य सब्सिडी को अलग रखने का मतलब यह है कि सरकार बीपीएल पहचान और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सिफारिशों में तालमेल नहीं बैठा सकती। इसके साथ ही ये बात भी महत्वपूर्ण है कि साल 2002 में पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य प्रणाली को हटाने के बावजूद क्या हम पूरी तरह बाजार आधारित मूल्य प्रणाली को लागू कर पाए? अभी तक पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत पूरी तरह बाजार पर आधारित नहीं हो पाई है। अप्रत्यक्ष कर के अलावा इम्पोर्ट पैरिटी प्रिंसिपल पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। इसलिए केरोसिन और एलपीजी के मूल्य और उसकी सब्सिडी निर्धारण में कोई साफ नीति नजर नहीं आती। कुछ लोग एलपीजी को शहरी मध्यवर्ग के उपभोक्ता उत्पाद के तौर पर व्याख्यायित कर सकते हैं। दूसरे लोग हालांकि यह कह सकते हैं कि एनएसएस के आंकड़ों के मुताबिक ये बात बिलकुल सही नहीं है। केरोसिन को गरीब लोगों के उपभोक्ता उत्पाद के तौर पर देखा जाएगा, जबकि खाद्यान्न को इससे अलग कर दिया गया है। इससे कुछ भिन्न तर्कों के साथ पेट्रोलियम उत्पादों को भी इस से अलग कर दिया जाएगा। इसके बाद सिर्फ खाद बच जाता है, जहां हमने पोषक तत्व आधारित डायरेक्ट ट्रांसफर को स्वीकार कर लिया है।

इसका ये मतलब कतई नहीं है कि सीसीटी के विचार में कोई खराबी है। एशिया और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देश सीसीटी का सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुके हैं। खास तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में, कई तरह के शिक्षा कूपन (एजुकेशन वाउचर) का प्रयोग भी हो चुका है। हालांकि सवाल ये है कि नंदन नीलेकणी की टास्क फोर्स किस बात के परीक्षण में जुटी है- कैश ट्रांसफर या वाउचर? टास्क फोर्स की शब्दावली देखकर कहा जा सकता है कि हम कैस ट्रांसफर (नकद हस्तांतरण) की बात कर रहे हैं। लेकिन आइए हम पहले वाउचर पर विचार करें। वाउचर हमें विकल्प, प्रतियोगता और बेहतर तरीके से काम करने का मौका देते हैं। हालांकि वाउचर तभी कारगर हो सकते हैं जब आपूर्ति के मोर्चे पर कई विकल्प हमारे सामने मौजूद हों। अगर 10 किलोमीटर के दायरे में एक ही जनवितरण प्रणाली की दुकान हो तो कोई शख्स फूड स्टाम्प का बेहतरीन इस्तेमाल नहीं कर सकता। हां, ये सच है कि इससे आपूर्ति बढ़ेगी, लेकिन यह तुरंत नहीं बढ़ जाएगी।

अब नकद हस्तांतरण की बात करें, अगर ये सशर्त होते हैं तो वस्तुतः ये वाउचर से बहुत अलग नहीं होंगे और इन्हें बिना किसी शर्त का बनाने की बात की जाएगी, तो यह तय है कि इस प्रस्ताव पर व्यापक विरोध होगा। क्या सीसीटी के मामले में हमें नरेगा की गलती से सबक नहीं लेना चाहिए, जहां बैंक और पोस्ट ऑफिस के जरिए भुगतान अनिवार्य कर दिया गया? इसके लिए जिस तरह के वित्तीय समावेशन की जरूरत होती है, वो हमारे यहां नहीं है। अगर हम वाकई सीसीटी को सफलतापूर्वक लागू करना चाहते हैं, तो इसकी प्रायोगिक जांच (पायलट) हमें तथाकथित संभ्रांत और शहरी क्षेत्रों में करनी होगी, जहां वितरण कोई समस्या नहीं है।

- बिबेक देबरॉय