सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड

दलितों-मुसलमानों के घर तक पहुंची ग्रोथ
 
 
साल 2000 के दौरान देश में आर्थिक विकास ने तेज रफ्तार पकड़ी। इस दौरान गरीब अल्पसंख्यकों पर क्या असर हुआ? कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पनगढ़िया और मोरे ने एक पेपर तैयार किया है, जिसके मुताबिक इस बीच गरीबी भारत के दलित-आदिवासी समुदायों में अगड़ी जातियों के मुकाबले, और मुसलमानों में हिंदुओं के मुकाबले अधिक तेजी से कम हुई है। इस पेपर में 2004-05
गरीबों के नाम पर सरकारों द्वारा बनायी जाने वाली लोक लुभावनी नीतियां, लाभकारी कम और नुकसान दायक ज्यादा होती हैं। सरकारें टैक्स के नाम पर पहले तो करदाताओं के खून पसीने से अर्जित की गई गाढ़ी कमाई की उगाही करती हैं और बाद में विभिन्न सेवाओं को निशुल्क उपलब्ध कराने के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करती हैं। यह तब है जबकि दुनियाभर के उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि मुफ्त चीजें उपलब्ध कराने की योजनाओं ने समस्या को कम करने की बजाए उन्हें बढ़ाया ज्यादा है। कल्याणकारी सरकारों द्वारा जन कल्याण के नाम पर बनायी जाने वाली योजनाओं और उनके परिणामों से

इतिहास के सबसे बड़े सबकों में से एक यह है कि केवल औद्योगिक क्रांति ही किसी गरीब राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। हर सफल राष्ट्र मैन्यूफैक्चरिंग से ही समृद्ध हुआ है। केवल इसी तरह कोई राष्ट्र लाखों अकुशल युवाओं को काम दे सकता है, लेकिन दो दशकों के सुधारों के बाद भी भारत अब तक औद्योगिक क्रांति नहीं ला पाया है। इसकी अर्थव्यवस्था अब भी उत्पादन क्षेत्र की बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। त्रासदी यह है कि 90 फीसदी भारतीय अच्छी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में काम करने की बजाय अनियमित किस्म की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। हालत यह है कि गणेशजी की

खाद्य सुरक्षा गारंटी अध्यादेश से सस्ते अनाज की आस लगाए बैठे लोगों पर अब दोहरी मार पड़ रही है। पूर्व की तुलना में समान मात्रा में अनाज पाने के लिए अब उन्हें दो से तीन गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। यह सब हो रहा है सरकार द्वारा मुफ्त अथवा लगभग मुफ्त प्रदान करने के नाम पर। इस सरकारी गुणा-गणित से अंजान मुफ्त में सबकुछ पाने की आस लगाए बैठे लोगों को अब शायद कुछ सदबुद्धि प्राप्त हो। विस्तार से जानने के लिए पढ़ें...

35 किलो गेहूं के लिए

केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून को लोकसभा और राज्यसभा में पारित करा लेने के साथ अर्थव्यवस्था में कोहराम मचा है। यह ठीक ही है। सरकार के पास वर्तमान खर्च को पोषित करने के लिए राजस्व नहीं हैं। ऋण के बोझ से सरकार दबी जा रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार का कुल खर्च लगभग 12 लाख करोड़ रुपये है, जबकि आय मात्र सात लाख करोड़ रुपये। लगभग आधे खर्चे को ऋण लेकर पोषित किया जा रहा है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा कानून का लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का बोझ अपने सिर पर लेना अनुचित दिखता है। फिर भी गरीबों को राहत देने के इस प्रयास का समर्थन करना चाहिए

- शेफर्ड ऑफ पैराडाइज, बोटल मसाला इन मोइली, द डंकी फेयर, इन सिटी लाइट्स, हैव यू सीन द अराना को विभिन्न वर्गों की सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का खिताब

- डॉक्यूमेंट्री देखने पहुंचे केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोयली, टेस्ट क्रिकेटर मुरली कार्तिक, पत्रकार कुलदीप नैय्यर व समाज सेविका अरूंधति रॉय

- चार दिनों तक चले फिल्म फेस्टिवल के दौरान दस देशों की 38 डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का हुआ प्रदर्शन, फोटो प्रदर्शनी ने भी किया आकर्षित

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

स्थानीय लोगों की परेशानी को सुन अतुल ने अपने कुछ अन्य उत्साही मित्रों के साथ लेह जाकर वहां के

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