सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

अधिक जानकारी के लिये देखें :

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के आजीविका पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

ताकत हासिल कर लेना एक बात है और उसका इस्तेमाल करना दूसरी। पिछले दिनों जब दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भेंट हुई तो यह दो निराश नेताओं की भेंट थी। ओबामा जहां अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में नाटकीय हार से हैरान थे, वहीं मनमोहन सिंह एक के बाद एक हो रहे घोटालों के खुलासों से परेशान थे।

लगता है ये दोनों नेता उस बुनियाद को भूल गए, जिस पर उनके देशों के लोकतंत्र का निर्माण हुआ। जिस तरह स्वतंत्रता के विचार के बिना अमेरिका की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह धर्म के बिना भारत को

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

अर्थशास्त्र आर्थिक प्रतिमानों, सैद्धांतिक प्रमाणों और अविवेकपूर्ण बुद्धिशीलता का विज्ञान बनने से पहले एक नैतिक दर्शन के नाम से जाना जाता था तथा इस बात से संबद्ध था कि व्यक्ति अपना जीवन कैसे बिताता है। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध के दौरान एडम स्मिथ द्वारा जीवन का एक व्यापक दर्शन प्रस्तुत किया गया। अपनी अनूठी कृति दि वेल्थ ऑफ नेशंस में एडम स्मिथ ने स्व-हित पर आधारित एक अर्थव्यवस्था का वर्णन किया है। यह व्यवस्था जो बाद में पूंजीवाद के नाम से जानी गई, इस प्रसिद्ध उद्धरण में वर्णित है:

हम अपने भोजन की

    राजस्थान के कोटा और आसपास के जिलों में इन दिनों दारा राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) की खूब चर्चा है। कोटा जिला के दारा वन्य जीव अभ्यारण्य के छोटे से संकरे हिस्से को राष्ट्रीय उद्यान बनाने का प्रस्ताव राजस्थान सरकार के वन विभाग अधिकारियों के फाइलों में पड़ा है। अधिकारीगण इसे राज्य सरकार से स्वीकृत कराकर गजट में छपवाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं क्योंकि गजट में छपने के बाद ही सरकारी मंजूरी की घोषणा को वैधानिक मान्यता मिलेगी। एक बार पहले भी सन् 2003 में यह प्रस्ताव हर जगह से स्वीकृति पाते हुए गजट में प्रकाशन के मुहाने तक पहुँच गया था। लेकिन ऐन

    देश आज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, बेरोजगारी उनमें से एक है, इसलिए रोजगार योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इस वर्ष का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि सरकार का लक्ष्य विभिन्न योजनाओं के तहत गरीबी खत्म करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है। लेकिन यदि हम सरकार के काम-काज के तरीकों पर गौर करें तो पाएंगे कि स्वयं सरकार बेरोजगारी की समस्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। इस सच्चाई को जानने-समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। रोजगार के लिए पहला कदम बढ़ाने के साथ ही हमें इसका आभास हो जाता है। यदि कोई गरीब और

Pages