रहना ही होगा बढ़ती असमानता के बीच

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असमानता को लेकर हमें अपना नजरिया साफ करने और पाखंड से दूर रहने की जरूरत है।  गरीबी एक निरपेक्ष धारणा है, जबकि असमानता सापेक्ष। गरीबी को घटाना वांछनीय है। लेकिन असमानता में कमी लाना एक स्वयंसिद्ध उद्देश्य नहीं है। ऐसी धारणा है कि बढ़ती असमानता, चाहे वह असल हो या काल्पनिक, बुरी होती है।

बीते साल शंकर आचार्य और राकेश मोहन ने मोंटेक सिंह अहलूवालिया के सम्मान में एक पुस्तक का संपादन किया था। इस किताब में स्वर्गीय सुरेश तेंदुलकर का असमानता पर एक लेख था। इस लेख में बैंकाक में हुए एक सम्मेलन के बेहद रोचक किस्से का जिक्र था। उस वक्त मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे।

बाजार अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को लेकर तमाम अन्य प्रतिनिधियों द्वारा अपने अनुभव साझा किए गए। इसी दौरान चीनी उपमंत्री ने चीन के सुधार कार्यक्रमों का ब्यौरा दिया। उनकी इस प्रस्तुति की समाप्ति पर मनमोहन सिंह ने बड़े सहज लेकिन प्रभावपूर्ण ढंग से सवाल किया कि आप जो करने की कोशिश कर रहे हैं, क्या उससे चीन में और अधिक असमानता नहीं बढ़ेगी? इसके जवाब में मंत्री ने बड़े विश्वास के साथ कहा, “निश्चित तौर पर हमें भी ऐसी ही उम्मीद है!”

भौतिक, सामाजिक, इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय उत्पाद, न्यायिक प्रक्रिया, इत्यादि जैसे इनपुट तक पहुंच में असमानता और आय की गैरबराबरी में फर्क है। सभी चाहेंगे कि भारत में समानता हो, लेकिन इस समानता को इनपुट तक पहुंच के तौर समझा जाना चाहिए और अगर इसमें गैरबराबरी (परिणामी असमानता) है तो निश्चत तौर पर हमारा गुस्सा जायज है।

गरीबी एक बहु-आयामी संकल्पना है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत बताने वाले आंकड़े केवल खर्च के आधार पर गरीबी की तस्वीर पेश करते हैं। यह आधार योजना आयोग के विचार मंथन से निकला है।

चूंकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) आय के आंकड़े एकत्र नहीं करता, इसलिए हमारे पास आय के आधार पर गरीबी के आंकड़े नहीं है। हर साल यूएनडीपी एक मानव विकास रिपोर्ट (एचडीआर) जारी करता है। हाल में एचडीआर ने बहु-आयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) की भी शुरुआत की है, जिसे ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव (ओपीएचडीआई) की अवधारणा पर तैयार किया गया है।

मानक आय या उपभोग आधारित गरीबी के पैमानों के अलावा इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य परिसंपत्तियों से वंचित रहने के रूप में होने वाला नुकसान भी शामिल है। लोगों को कैसे इनसे वंचित रखा जाता है, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश इसका सटीक उदाहरण पेश करते हैं।

निश्चित रूप से हमें शिक्षा और कौशल, स्वास्थ्य सेवाएं, बाजार सूचना, तकनीकी, वित्तीय उत्पाद, बिजली, पानी, सीवर और साफ-सफाई जैसे इनपुट तक न पहुंच पाने की समस्या को दूर करने की जरूरत है। ये या तो सार्वजनिक वस्तुएं हैं या फिर सामूहिक निजी वस्तुएं और ऐसे इनपुटों के वितरण में किसी भी तरह की असमानता को हर हाल में हटाना चाहिए। 

लेकिन यह परिणामी असमानता को दूर करने से बिल्कुल अलग है। हर विद्यार्थी को अच्छी शिक्षा मिले और प्रत्येक छात्र को बराबर अंक मिलने चाहिए, दोनों बातों में बहुत अंतर है। परिणामी असमानता को लेकर जिद समाजवाद का खुमार है, जिसे संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया गया है।

इसी का नतीजा है कि किसी भी राजनीतिक दल का तब तक पंजीकरण नहीं हो सकता, जब तक कि वह समाजवाद के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता न जाहिर करे। समाजवाद की धारणा काफी अस्पष्ट है, जिसकी सटीक व्याख्या नहीं की जा सकती। वास्तव में, बुद्धिमत्ता के तौर पर स्वीकार किए जाने वाले अधिकतर मुहावरे और अभिव्यक्तियां मजेदार चुटकुले मात्र हैं। संविधान में किए गए इस नुकसान के फलस्वरूप हम लोगों ने नीति निर्देशक तत्वों से जुड़े अनुच्छेद 38 को अक्षरशः लेना शुरू कर दिया है।

यह अनुच्छेद कहता है, “राज्य खासतौर पर आय में असमानता को न्यूनतम करने का प्रयास करेगा और दर्जे, सुविधाएं व अवसरों में असमानताओं को हटाने के लिए तत्पर रहेगा। यह बात केवल व्यक्तियों के मामले में ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले या अलग-अलग व्यवसायों वाले जनसमूहों पर भी लागू होगी।" दूसरा हिस्सा तो ठीक है, लेकिन आय में असमानता को न्यूनतम करने की बात ही विनाशकारी है। 

यह बात सिद्धांत और अनुभवों से साबित होती है। भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास का कोई भी दौर ले लीजिए, इसका नतीजा बढ़ती आय असमानता के रूप में ही सामने आया है। सिमोन कुजनेट्स बहुत पहले ही इसके समर्थन में तर्क दे चुके हैं और कई साल पहले अहलूवालिया ने भी इस पर लेख लिखे हैं। इसका स्वागत किया जाना चाहिए, न कि निंदा। हालांकि, इसके साथ ही हमें इनपुट तक पहुंच में असमानता का ध्यान रखना होगा।

रिकॉर्ड के लिए बता दें कि आय वितरण में असमानता का एक मानक पैमाना गिनी गुणांक है। इसका मूल्य जितना अधिक होगा, समाज में उतनी ही असमानता होगी। आय वितरण में भारत का गिनी गुणांक 36.8 है। यह ऊंचा जरूर है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। 

ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि असमानता की कोई भी तस्वीर हमें केवल यही दिखाती है कि किसी समय विशेष में समाज में कितनी गैरबराबरी है। लेकिन इस ठहरी हुई तस्वीर से चलती-फिरती और बोलती फिल्म कहीं बेहतर है।

चलो मान लेते हैं कि मैं गरीब हूं। क्या मैं अधिक असमानता को बर्दाश्त करने के लिए तैयार रहूंगा, अगर मुझे पता है कि विकास की यह तेज रफ्तार और असमानता मुझे भविष्य में बेहतर मौके मुहैया कराएगी? मुझे यकीन है कि 1991 के बाद का जवाब इससे पूर्व वाले से अलग होगा।

चलो थोड़ा और सावधानी से सोचते हैं। वास्तव में भारत की विकास दर ने 80 के दशक में जोर पकड़ा। इस सूरत में 1981 के बाद वाला जवाब इससे पहले वाले उत्तर से भिन्न होगा। विकास के चलते आए बदलाव ने पंजाब, हरियाणा, गुजरात, आंध्र प्रदेश और असम के लोगों की संभावनाएं बेहतर की हैं। वास्तव में सूबों की सीमाएं भ्रामक हैं, क्योंकि राज्यों के भीतर ही बहुत ज्यादा बदलाव हुए हैं। निश्चित रूप से ये हर जगह एक समान ढंग से नहीं हो रहे हैं।

क्या भारतीय संविधान में कुछ ऐसे खंड हैं, जो इस तरह के एकीकरण को रोक सकते हैं? उदाहरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 370 और 371 को ही ले लीजिए। ये दोनों अनुच्छेद यह सुनिश्चित करते हैं कि देश के कुछ हिस्सों का कभी भी एकीकरण नहीं होगा और न ही इन्हें मुख्यधारा में लाया जा सकेगा। यही वे सवाल है, जिन्हें हमें उठाना चाहिए। परिणामी असमानता को दूर करने पर जोर देना भ्रामक और अन्यायपूर्ण है। यह खतरनाक भी है, क्योंकि इससे हमारे अंदर गलतफहमी पैदा होती है कि कुछ तो किया जा रहा है।

- बिबेक देबरॉय, प्रोफेसर,
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
साभार: इकोनोमिक टाइम्स