शराबबंदी की बजाय संतुलित शराब नीति की ज्यादा जरूरत

राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे दोनों तरफ पांच सौ मीटर की दूरी पर से शराब की दुकानें हटाने का सुप्रीम कोर्ट ने आदेश क्या दिया, राज्य सरकारों ने शराब की दुकानें आबादी में लगाने की तैयारियां शुरू कर दीं। इसकी वजह से महिलाएं गुस्से में हैं। लेकिन इस फैसले ने कई सवाल भी खड़े किए हैं। मसलन यह कि क्या गारंटी है कि पांच सौ मीटर दूर होने के बावजूद शराब पीकर लोग गाड़ियां नहीं चलाएंगे। सवाल यह भी है कि क्या शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोग हाईवे से पांच सौ मीटर दूर स्थित दुकानों पर नहीं जाएंगे। इस फैसले की काट ढूंढ़ी जाने लगी है। कुछ राज्यों में तो सरकारों ने शराब की दुकानें बने रहने देने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग की सूची से कई सड़कों को हटा दिया है। ताकि वहां शराब की पहले से स्थित दुकानें बनी रह सकें।

इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों में शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले और इससे होने वाले हादसों की संख्या में इजाफा हुआ है। सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक देश में हर साल करीब पांच लाख सड़क हादसे होते हैं, उनमें करीब डेढ़ लाख जानें जाती हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले शराब पीकर गाड़ी चलाने के होते हैं। कम्युनिटी अगेंस्ट ड्रंकन ड्राइविंग के मुताबिक सड़क हादसों के पीछे सबसे बड़ी वजह शराब है। इसके आंकड़ों के मुताबिक 2010 में हुए सड़क हादसों में 62 फीसद की वजह शराब थी, जो 2011 में बढ़कर 65.1 प्रतिशत हो गई। अगले साल यह 66 और 2013 में 67.8 प्रतिशत और 2014 में 70 प्रतिशत हो गई। इस लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट का हाईवे से शराब के ठेके हटाना अच्छा फैसला लगेगा। लेकिन क्या गारंटी है कि पांच सौ मीटर दूर होने के बाद ठेके से गाड़ी चलाने वाले शराब नहीं खरीदेंगे। ड्रंकन ड्राइविंग पर लगाम कड़े कदमों से ही लगाई जा सकती है। शराब की बिक्री पर ऐसी लगाम लगाने से एक और खतरा रहता है। अवैध शराब की बिक्री बढ़ जाती है। जिसके जरिए गलत और जहरीली शराब भी बिकने लगती है। जिससे कई बार निर्दोष जानें भी चली जाती हैं। 

जिन राज्यों में शराब पर प्रतिबंध है, उन राज्यों में किस तरह शराब माफिया शराब बेचता है, यह देखना हो तो गुजरात राज्य में जाकर देखना चाहिए। जहां से गुजरने वाली रेल गाड़ियों के यात्रियों द्वारा स्टेशनों पर वेंडरों से सामान्य कोल्ड ड्रिंक मांगने पर जवाबी सवाल पूछा जाता है कि किस रंग का कोल्ड ड्रिंक चाहिए। उनका इशारा सीधे तौर पर शराब की ब्रांड से होता है। अभी बिहार में कड़ाई है, इसलिए वहां ऐसी घटनाएं सामने नहीं आईं। लेकिन पिछली सदी के नब्बे के दशक में महिलाओं की मांग पर जब हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने शराब पर प्रतिबंध लगाया था, तो राज्य में शराबबंदी की अधिकारियों और माफिया ने मिलकर बखिया उधेड़ दी थी।

शराब राज्यों की कमाई का बड़ा जरिया भी है। आज हालात यह है कि शराब और बीयर की खपत देश के ज्यादातर लोगों के शराब न पीने की आदत के बावजूद बीयर और शराब की खपत बढ़ रही है। साल 2013-14 में देश में बीयर की खपत करीब पौने सात अरब लीटर और स्प्रिट यानी दूसरे तरह के शराब की खपत पौने चार अरब लीटर रही। इसमें लगातार इजाफा भी हो रहा है। इसे पीने वाले भी मानते हैं कि पीना बुराई है। इसीलिए लोकलाज के लिहाज से देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने इसके लिए शब्द भी तलाश लिए गए हैं। उत्तर प्रदेश में जहां इसे संझा की दवाई बोला जाता है तो कर्नाटक में इसे लोग ऑयल यानी तेल के तौर पर मांगते हैं तो तमिलनाडु में पानी बोलकर बोलते हैं। शराबबंदी वाले राज्य गुजरात में तो रंगीन पानी कहते हैं। फ्यूचर मार्केट इनसाइट के मुताबिक 2015-16 में देश में शराब का कारोबार करीब 1564.8 अरब रूपए का था। कुछ राज्यों में इसके कारोबार पर डेढ़ सौ प्रतिशत तक टैक्स है, लिहाजा राज्यों को शराब की बिक्री से राजस्व की भारी कमाई हो रही है।

राज्यों की शराब से होने वाली कमाई का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है। राज्यों के एक्साइज विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015-16 में शराब से राजस्व हासिल करने वाले राज्यों में तमिलनाडु पहले नंबर पर रहा। जिसे 29 हजार 672 करोड़ रूपए की आय हुई। दूसरे नंबर पर हरियाणा रहा, जिसे 19 हजार 703 करोड़ की कमाई हुई। तीसरे नंबर पर रहे महाराष्ट्र ने 18 हजार करोड़ की कमाई की। इसी तरह कर्नाटक ने 15 हजार 332 करोड़, उत्तर प्रदेश ने 14 हजार 83 करोड़, आंध्र प्रदेश ने 12 हजार 739 करोड़, तेलंगाना ने 12 हजार 144 करोड़, मध्य प्रदेश ने सात हजार 926 करोड़, राजस्थान ने पांच हजार पांच सौ 85 करोड़ और पंजाब ने पांच हजार करोड़ की कमाई की। शराब से मिलने वाले राजस्व का ही दबाव है कि संस्कृति बदलने और शराब की दुकानें बदलने का वादा करके दिल्ली की सत्ता में आई केजरीवाल सरकार ने उल्टे शराब की दुकानों को बढ़ावा दिया।

एक बात और है। शराब पर पाबंदी लगाने से अवैध रूप से शराब बिक्री की भी गुंजाइश माफिया और अपराधी तत्व हासिल कर लेते हैं। इसकी वजह से जहां सरकार को राजस्व का बड़ा नुकसान होता है वहीं पीने वालों को शराब के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इसके साथ ही चुंकि अवैध रूप से बिकने वाली शराब की गुणवत्ता पर नियंत्रण नहीं रह जाता इसलिए जहरीली शराब भी बिकने लगती है, और मासूम लोगों को उससे अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। कोर्ट व नीति निर्धारकों को यह समझना चाहिए कि सड़क हादसे शराब पीने के कारण नहीं शराब पीकर वाहन चलाने से होते हैं। इसलिए सरकार को शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ ज्यादा सजग और सख्त होना पड़ेगा। हमें ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिससे कि शराब पीकर सड़क पर निकलने वालों को रोका जा सके। साथ ही कड़ी व त्वरित सजा का प्रावधान होना चाहिए जिससे लोगों के मन में कानून व सजा का भय पैदा हो सके और वे ऐसा करने की हिम्मत न कर सकें। इसलिए होना तो यह चाहिए कि शराब की राजमार्गों पर बिक्री के फैसले पर पुनर्विचार होता और शराब को संतुलित तरीके से राजकीय निर्णय के मुताबिक वैधानिक तरीके से बेचने का तरीका अख्तियार किया जाए।

- उमेश चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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