लेस'कैश' बाजार के सहयोग से पूरा होगा कैशलेस इकोनॉमी का सपना

- तमाम व्यवहारिक दिक्कतों के बावजूद बाजार द्वारा देश में कैशलेस इकोनॉमी की ठोस नींव रखी जा चुकी है। अब आवश्यकता है कि सरकार उस नींव के सहारे अपने बहु-उद्देशीय और महत्वकांक्षी योजना वाले भवन का निर्माण करे।

8 नवंबर की देरशाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 500 और 1000 के नोट को कानूनी लेनदेन की प्रक्रिया को (लीगल टेंडर) के लिए अयोग्य घोषित करने के बाद से विमुद्रीकरण और कैशलेस इकोनॉमी जैसे भारी भरकम माने जाने वाले विषय पर होने वाले गंभीर विमर्श का दायरा आर्थिक विशेषज्ञों और बौद्धिक समूहों के गोलमेज सम्मेलन से बाहर निकलकर हर आम-ओ-खास द्वारा नुक्कड़-चौराहों पर होने वाली चर्चा तक विस्तारित हो गया। कैशलेस इकोनॉमी को लेकर प्रधानमंत्री की दृष्टि जहां स्पष्ट है और वह इसे समानांतर चलने वाली भ्रष्टाचार आधारित अर्थव्यवस्था, आतंकवाद की फंडिंग और फर्जी मुद्रा (जाली नोटों) की समस्या को साधने के उपाय के तौर पर देखते हैं वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों के मन में इसकी सफलता को लेकर संशय भी है।

मूलरुप से यह संशय देश में कैशलेस इकोनॉमी के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी को लेकर है। हालांकि बाजार ने इन्हीं कम संसाधनों के बावजूद लेस'कैश' की परिकल्पना को काफी हद तक साकार करते हुए सरकार को देश की कैश आधारित इकोनॉमी को कैशलेस इकोनॉमी में परिवर्तित के लिए मजबूत लांचपैड उपलब्ध करा दिया है। आज ठीक वैसी ही बदलाव की स्थिति है जैसी कि देश में निजी बैंकों के प्रवेश के बाद बैंकिंग क्षेत्र की हुई थी। निजी बैंकों द्वारा उपलब्ध करायी जाने वाली सुविधाओं को हिचकते हुए ही सही सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने भी आत्मसात किया और उसका परिणाम सबके सामने है।

आज भारतीय बैंकिंग प्रणाली सार्वजनिक क्षेत्र के 26 बैंकों, निजी क्षेत्र के 20 बैंकों, 43 विदेशी बैंकों, 56 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, 1,589 शहरी सहकारी बैंकों व 93,550 ग्रामीण सहकारी बैंकों से सुज्जित है। सितंबर 2016 तक नॉन बैंकिंग फाइनेंसियल कम्पनियों (एनबीएफसी) द्वारा देश में कुल 55.27 यूएस डॉलर का ऋण वितरीत किया जा चुका था। यह क्षेत्र 25 प्रतिशत वार्षिक दर की गति से विस्तारित हो रहा है और विगत तीन वर्षों के दौरान एनबीएफसी ने सफलता की नई ऊंचाईयों को छुआ है।   

आरबीआई द्वारा वर्ष 2012 में नॉन बैंकिंग संस्थाओं को व्हाइट लेबल एटीएम (डब्लूएलए) स्थापित करने की अनुमति वाले प्रावधान के बाद इंडिकैश नामक कंपनी ने अक्टूबर 2016 तक देश भर में 21000 से अधिक डब्लूएलए स्थापित किए। अच्छी बात यह है कि अन्य बैंकों के द्वारा मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में स्थापित किए जाने वाले एटीएम के इतर ये डब्लूएलए अधिकतर छोटे शहरों अथवा ग्रामीण इलाकों में स्थापित किए जा रहे हैं। इन मशीनों से किसी भी बैंक के एटीएम कार्डधारियों को पैसे निकालने की सुविधा होती है। 

पेटीएम, मोबिक्विक, फ्रीचार्ज, जस्टपे, ऑक्सीजेन जैसे ऐप सहित लगभग सभी बैंकों द्वारा आज ऑनलाइन ट्रांजैक्शन और डिजीटल वॉलेट को प्रोत्साहित करते देखे जा सकते हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) एटीएम की संख्या के मामले में अग्रणी पंक्ति में खड़ा है जबकि भारत में इसकी शुरूआत 1996 में निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक के द्वारा ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के साथ की गई थी। इसकी सफलता और लोकप्रियता के बाद सभी बैंकों ने अपने यहां ऑनलाइन ट्रांजैक्शन सेवा शुरू की। इस माध्यम से पैसों का लेनदेन, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ट्रांसफर इत्यादि का काम काफी आसान हो गया।

हालांकि देशवासियों को ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के माध्यम से ई-कॉमर्स की सुविधा यानी कि किसी वस्तु की खरीद फरोख्त अथवा सेवा हासिल करने से रूबरू कराने का श्रेय भारतीय रेल की आईआरसीटीसी सेवा को जाता है। वर्ष 2002 में आईआरसीटीसी ने रेल टिकटों की ऑनलाइन बिक्री शुरू की। आईआरसीटीसी की यह सेवा क्रांतिकारी साबित हुई। उड्डयन क्षेत्र में टिकटों की ऑनलाइन बुकिंग सेवा प्रदान करने का पहल निजी क्षेत्र की हवाई कंपनी एयर डेक्कन ने सबसे पहले की जिसके तुरंत बाद इंडियन एयरलाइंस ने भी यह सेवा शुरू कर दी। बाद में मेकमायट्रिप, यात्रा, रेडबस आदि कंपनियों ने ऑनलाइन माध्यम से होटल बुकिंग, बस बुकिंग आदि की सेवाएं प्रदान करनी शुरू की। कैशलेस माध्यम से खरीद फरोख्त के इस शुरूआती दौर में उपरोक्त सभी सेवाओं को हासिल करने के लिए बैंक के डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड की सहायता लेनी पड़ती थी।

वर्ष 2007 में देश में निजी क्षेत्र की कंपनी फ्लिपकार्ट का आगमन हुआ और ईटेलिंग के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इस कंपनी ने देश में खरीददारी के परंपरागत तरीके को एक झटके में बदल दिया। इस कंपनी ने माल को दुकानों और शो-रूम से निकालकर लैपटॉप और मोबाइल के स्क्रीन पर पहुंचा दिया। यह तरीका भी इतना सफल हुआ कि फ्लिपकार्ट के बाद एमेजन, स्नैपडील, जाबोन्ग, ई-बे जैसी अनेक कंपनियों की झड़ी लग गई। वर्ष 2010 में ओला व इसके बाद आयी ऊबर जैसी ऐप बेस्ड कैब कंपनियों ने भी बाद में ओलामनी व अन्य ऐप आधारित वालेट से किराया अदा करने की सुविधा शुरू कर कैशलेस यात्रा कराने का काम शुरू किया। वर्ष 2010 में ही भारतीय आंत्रप्रेन्योर विजय शेखर शर्मा ने नोएडा से पेटीएम नामक ऐप आधारित बटुए का काम शुरू किया। इस ऐप के माध्यम से मोबाइल स्क्रीन से डिजीटल पेमेंट कहीं भी कभी भी करने की सुविधा मिली। इसके बाद तमाम अन्य ऐप आधारित वॉलेट कंपनियों का उद्भव हुआ। इस सुविधा की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मोबाइल वॉलेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों की सेवाओं को हासिल करते हुए लोगों ने वर्ष 2015-16 में 22.41 मिलियन यूएस डॉलर का लेनदेन कर लिया। उम्मीद जताई जा रही है कि वर्ष 2022 तक लेनदेन का यह आंकड़ा 4.37 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंच जाएगा। हालांकि इस आंकड़े में नोटबंदी के कारण मजबूरी में डिजीटल पेमेंट की ओर रूख करने वाले लोगों की संख्या को शामिल नहीं किया गया है।

इन सभी सुविधाओं की देन है कि वित्त वर्ष 2015 के दौरान कैशलेस लेनदेन की मात्रा ने पेपर (चेक) के माध्यम से होने वाले लेनदेन को पीछे छोड़ दिया। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2015 से मार्च 2016 के दौरान चेक के माध्यम से जहां देश में 85,43,414 करोड़ (1.33 ट्रिलियन यूएस डॉलर) का लेन देन हुआ वहीं क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, एनईएफटी व ऑनलाइन वैलेट आदि के माध्यम से 92,02,892 करोड़ (1.43 ट्रिलियन यूएस डॉलर) का लेनदेन हुआ। इस प्रकार उक्त वित्त वर्ष में 177,46,306 करोड़ (2.76 ट्रिलियन यूएस डॉलर) की भारी भरकम धनराशि का लेनदेन कैश रहित माध्यम से हुआ। ये आंकड़ें अपने आप में प्रोत्साहित करने वाले हैं। कैश रहित लेनदेन की इस प्रक्रिया में सर्वाधिक 71% हिस्सेदारी ई-टेलिंग कंपनियों की रही। इसमें से 27% लेनदेन कार्ड के माध्यम से किए गए। विभिन्न मोबाइल वैलेट के माध्यम से 1 लाख करोड़ रूपए से ज्यादा का लेनदेन किया गया।

बाजार के विशेषज्ञों के मुताबिक अगले 5 वर्षों में देश में लेनदेने के लिए स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वालों की संख्या में 100 गुने से ज्यादा की वृद्धि का अनुमान है। इंटरनेट सेवाओं में सुधार के साथ इसकी संख्या में और वृद्धि हो सकती है। वित्त वर्ष 2015 के दौरान मोबाइल वैलेट से जिस 1 लाख करोड़ रूपए की धनराशि का लेनदेन हुआ उसमें 50% हिस्सेदारी बिल पेमेंट, मोबाइल रिचार्ज, डीटीएच सेवा रिचार्ज, मूवी टिकट की बुकिंग अथवा यात्रा टिकटों की बुकिंग के लिए किए गए पेमेंट की रही। काम के सिलसिले में दूसरे शहर में रहने वाले लोगों द्वारा अपने परिजनों को पैसा भेजने के लिए भी मोबाइल वैलेट के इस्तेमाल में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिली है। इसी प्रकार, मोबाइल कॉमर्स अर्थात मोबाइल के माध्यम से किए जाने वाले लेनदेन में भी काफी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वर्तमान में ई-टेलिंग कंपनी स्नैपडील के प्लेटफार्म पर मोबाइल के माध्यम से खरीद फरोख्त करने वालों की तादात 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है जबकि पिछले वर्ष के दौरान यह तादात 5 प्रतिशत तक ही थी। ऐसा ही कुछ फ्लिपकार्ट प्लेटफॉर्म के साथ भी है जहां मोबाइल के माध्यम से लेन देन करने वालों की संख्या 15 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत तक हो चुकी है। 

इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, एसेसरीज के अलावा ऑनलाइन माध्यम से राशन (ग्रॉसरी) की सामग्री और फल-सब्जियों के खरीददारों की तादात में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है। बिगबास्केट, आटादाल डॉट कॉम, लोकल बनिया डॉट कॉम सहित तमाम छोटे बड़े प्लेटफॉर्म के माध्यम से खरीददारी करने वालों की बढ़ती संख्या ने ऑनलाइन पेमेंट की प्रक्रिया को और ज्यादा लोकप्रियता प्रदान की है। 

इतना होने के बावजूद बाजार के विशेषज्ञ आने वाले वर्षों में ऑनलाइन पेमेंट को लेकर ज्यादा आशान्वित हैं। दरअसल, कैशलेस लेनदेन करने वाला एक बड़ा वर्ग महानगरों से आता है और टू एवं थ्री टीयर शहरों एवं गांवों में अब भी इस क्षेत्र से उम्मीद के मुताबिक लोग नहीं जुड़ सके हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा 20 हजार करोड़ रूपए के निवेश से देश में ब्रॉडबैंड हाइवे के निर्माण करने और देश भर के 2.5 लाख पंचायतों को इससे जोड़ने की घोषणा की है। एक बार ब्रॉडबैंड हाइवे स्थापित हो गया तो ग्रामीण इलाकों को ऑनलाइन सेवाओं से जोड़ने और कैशलेस इकोनॉमी से जोड़ने में तेजी आने की उम्मीद है। 

भारत में पेमेंट इंडस्ट्री मुख्यतः दो भाग में बंटा हुआ है; मोबाइल बैंकिंग और मोबाइल वॉलेट। मोबाइल बैंकिंग में जहां आईसीआईसीआई, एचडीएफसी व एसबीआई जैसे बड़े बैंकों का दबदबा है वहीं मोबाइल वॉलेट कंपनियों ने टेलिकॉम सेवा प्रदाताओं जैसे एयरटेल, आईडिया, वोडाफोन इत्यादि के साथ साझेदारी कर सेवा प्रदान कर रहीं हैं।

मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी में सुधार के परिणाम स्वरूप हाल के वर्षों में मोबाइल की सहायता से लेनदेन करने वालों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिली है। ऑनलाइन पेमेंट के प्रति जागरुकता और कार्ड आधारित डिजीटल लेनदेन ने विभिन्न पेमेंट गेटवेज़ को लोकप्रियता प्रदान की है। वित्तवर्ष 2012-2014 के बीच पेमेंट इंडस्ट्री ने 142.9% की उछाल दर्ज की।
‘केन रिसर्च’ द्वारा प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार वर्ष 2019 तक भारतीय पेमेंट गेटवे सेक्टर का कुल लेनदेन 8,172.7 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। विदित हो कि ये सभी अनुमान देश में नोटबंदी लागू होने से पूर्व के हैं। केन रिसर्च के मुताबिक सुविधाओं से वंचित ग्रामीण आबादी और सख्त सरकारी नियम इस क्षेत्र के विकास में रोड़ा हैं लेकिन  जिस प्रकार वर्तमान सरकार उदारवादी नीतियां अपना रही है उससे यह इंडस्ट्री संभावनाओं से भरी प्रतीत हो रही है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैश रहित अर्थव्यवस्था के सपने को पूरा करने की जमीन बाजार द्वारा 'लेस'कैश प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध करायी जा चुकी है। सरकार, बाजार के कार्य करने की प्रोत्साहित करने वाली प्रणाली को आत्मसात कर लोगों को खुशी खुशी कैशलेस इकोनॉमी की ओर आकर्षित कर सकती है। इसके लिए उसे सिर्फ ऑनलाइन फ्रॉड के संबंध में कड़े कानून, त्वरित निपटारे, ट्रांजैक्शन चार्ज को न्यूनतम अथवा समाप्त करने, देश में इंटरनेट कनेक्टिविटी को तेज करने जैसे कुछ मूलभूत कदम उठाने होंगे।

- अविनाश चंद्र
लेखक पॉलिसी थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी से जुड़े हैं और www.azadi.me के संपादक है। यह लेख भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित योजना पत्रिका के फरवरी 2017 अंक में प्रकाशित हुआ है।