शिक्षा और कैरियर का चयन: जर्मनी की सीख

जर्मनी में किसी ऐसे छात्र को ढूंढना जो शिक्षा को एक बोझ समझता हो, किसी चुनौती से कम नहीं है। हाल ही में संपन्न हुई जर्मनी की मेरी यात्रा के दौरान ऐसे किसी छात्र को ढूंढना मेरी यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया था जबकि मैं वहां एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला ‘क्राइसिस इन एजुकेशन – ए लिबरल वे फॉरवर्ड’ में शामिल होने के लिए गया था। इस कार्यशाला का उद्देश्य पब्लिक पॉलिसी से लेकर नवोचार युक्त खेलों को तैयार करने जैसे शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 16 देशों के 26 प्रतिस्पर्धियों के मध्य परस्पर संवाद स्थापित को प्रोत्साहित करने के लिए एक मंच प्रदान करना था।

जर्मनी के मेरे दो सप्ताह के प्रवास के दौरान, मुझे वहां के स्कूलों में घूमने और छात्रों के साथ कुछ परिचर्चाओं में शामिल होने का अवसर मिला। इन सभी परिचर्चाओं के दौरान मैंने प्रायः वे ही प्रश्न पूछे जो हम भारतीय छात्रों से पूछते हैः आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं? भारत में हमें जो जवाब मिलते हैं उनमें प्रायः उसकी झलक दिखती है जो उनके अभिभावक उन्हें बड़े होकर बनता देखना चाहते हैं। बच्चे प्रायः अपने अभिभावकों की उम्मीदों के बोझ तले दिखाई पड़ते हैं और उनके जवाब सामाजिक तौर पर स्वीकृत ‘स्टेटस सिम्बल’ की प्रतिध्वनि प्रतीत होते हैं। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के पूर्व ही बच्चों से डॉक्टर, इंजीनियर और सिविल सर्वेंट्स बनने की उम्मीदें पाल ली जाती हैं। यद्पि ऐसी उम्मीदें पालना गलत नहीं है, किंतु असल समस्या यह है कि बच्चों को अपने सामर्थ्य को ढूंढने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। जोर बच्चे कि विशिष्ट प्रतिभा को निखारने पर नहीं होता है बल्कि उनपर सामाज में स्वीकृत स्थापित धारणा को चुनने की शर्त होती है। इसलिए, अनूठी प्रतिभा और रूचि होने के बावजूद बच्चे वहीं तक सीमित होकर रह जाते हैं जहां तक उनके अभिभावक चाहते हैं न कि वे स्वयं क्या चाहते हैं।

बच्चे जीवन में जो करना चाहते हैं उसे चुनने की स्वतंत्रता उनसे छीन ली गई है। मेरे प्रश्न का जो जवाब जर्मन छात्रों से मुझे मिला वह भारतीय परिस्थितियों का बिल्कुल विरोधाभासी था। प्रश्न के जवाब में उनके उस प्रकार के रवैये की झलक भी दिखाई पड़ती थी जिस प्रकार के माहौल में वे पले बढ़े हैं। उनकी प्रतिक्रियाएं विचारणीय थीं और अत्यंत ईमानदार प्रतीत होती थीं, यहां तक कि उन छात्रों की भी जो इस बात को लेकर निश्चित नहीं थें कि उन्हें क्या बनना है। कुछ छात्रों ने यह भी उत्तर दिया कि पहले वे स्कूल की पढ़ाई समाप्त करेंगे और उसके बाद विचार करेंगे कि उन्हें क्या बनना है। एक ऐसा माहौल, जो विचारों को प्रोत्साहित करता है और चयन की स्वतंत्रता के भाव को सशक्त बनाता है, वह अपने आप में उपलब्धि है और यह सही भी है।

जर्मनी की शिक्षा प्रणाली का सबसे अधिक रोमांचक हिस्सा मुझे वहां की दोहरी शिक्षण व्यवस्था (डुअल एजुकेशन सिस्टम) लगी जिसकी स्थापना बतौर समालोचक घटक के तौर पर की गई थी। इस व्यवस्था की शुरुआत 1969 में पारित वोकेशनल ट्रेनिक एक्ट के साथ हुई थी जिसे 2005 में संशोधित किया गया। यह कानून विभिन्न समीतियों के सदस्यों को अप्रेंटिसशिप के माध्यम से वोकेशनल ट्रेनिंग का प्रावधान करता है ताकि औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक कुशल कामगार तैयार किया जाना सुनिश्चित किया जा सके। समय बीतने के साथ साथ इस वोकेशनल ट्रेनिंग एक्ट को संहिताबद्ध (कोडिफाइड) और मानकीकृत किया गया जिसने बाद में दोहरी शिक्षण व्यवस्था की नींव रखी। यह व्यवस्था छात्रों को किसी कंपनी में प्रशिक्षण प्राप्त करने और वोकेशनल स्कूल में विशेषीकृत व्यापार आधारित शिक्षा और राजनीति, अर्थशास्त्र, धर्म और खेल आदिक विषयों का सामान्य प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं।

सार्वजनिक शिक्षण कार्यक्रम और विशेषीकृत फर्म (कंपनी) आधारित अप्रेंटिसशिप, दोनों एक दूसरे को बरकरार रखने और दोहरी शिक्षण व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने का कार्य करते हैं। छात्रों से बातचीत ने इस प्रणाली की उपयुक्तता को जाहिर किया जिसके तहत छात्रों को अपने भविष्य की वृत्ति (करियर) के चयन और अपनी योग्यता (एप्टिट्यूड) के अनुसार व्यवसाय चुनने के प्रति जागरुक किया जाता है। वोकेशनल स्कूल में बिताया गये समय के दौरान उनका वास्ता कार्य के वास्तविक अनुभवों से कराया जाता है। ऐसा करने से उनका पेशेगत विकास (प्रोफेशनल ग्रोथ) भी होता है क्योंकि जो कंपनियां उन्हें प्रशिक्षण देती है उन्हीं में उन्हें रोजगार मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

जर्मनी की यह शैक्षणिक प्रणाली छात्रों को अपनी पसंदीदा विषय की शिक्षा हासिल करने में मदद तो करती ही है, अर्थव्यवस्था की जरूरत के साथ तालमेल भी स्थापित करने भी मदद करती है। किसी भी चीज की अधिकता – चाहे छात्रों को सिद्धांत पढ़ाना हो अथवा वोकेशनल पाठ्यक्रम में प्रशिक्षित करना हो – स्नातक छात्रों और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए कठिनाई का सबब साबित हो सकता है। ऐसी शिक्षण प्रणालियां जो उक्त बातों का ध्यान नहीं रखती हैं वह युवाओं की बेरोजगारी अथवा उनकी मनोवृति से तालमेल न खाने वाली नौकरियों का कारण बनती हैं। विभिन्न हिस्सेदारों (स्टेक होल्डर्स) के बीच निर्बाध व्यवस्था, सरकार, कंपनियों और संगठनों द्वारा जिम्मेदारियों के बंटवारे और ऐसी नीतियों के निर्धारण से ही संभव हो सकता है जिसमें सीखने वाले व्यक्ति को केंद्र में रखा जाता है। उदारवादी विचारक प्रायः इन्ही खूबियों को बढ़ावा देते हैं और देश को इसी मार्ग पर बढ़ने की आवश्यकता है।

-थॉमस एंटनी
(यह लेख, लेखक की जर्मनी की यात्रा के अनुभवों पर आधारित है)

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