इन कानूनों का अब क्या कीजिएगा हुजूर

वक्त के साथ-साथ तौर-तरीके बदलते हैं, जरूरते बदलती हैं और उन्हीं के मुताबिक कानून-कायदे भी। वक्त की वजह से पीछे छूट जाने वाले अतीत अथवा संग्रहालय का हिस्सा हो जाते हैं। उनके बारे में जानना व देखना अच्छा लगता है, लेकिन ऐसे पुरातन कानून जिनका अब मतलब नहीं रह गया है, फिर भी वे वजूद में हैं। उनके बारे में आप क्या कहेंगे? दिल्ली में 'पंजाब विलेज एंड स्मॉल टाउंस पेट्रोल एक्ट 1918' आज भी लागू है। इस कानून के मुताबिक दिल्ली के गांवों व कस्बों में हर रात वहां के व्यस्क पुरुषों को बारी बारी से गश्त करना जरूरी है। ऐसा न करने पर उन पर पांच रूपए का जुर्माना किया जा सकता है। चूंकि कानून अब भी अस्तित्व में है, गांवों में गश्त की उस तरह जरूरत है अथवा नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन वहां के पुरूषों पर जुर्माना तो हो ही सकता है।

दिल्ली में ऐसे कानूनों की संख्या तकरीबन 30 है, जिनका अब कोई मतलब नहीं रह गया है। या तो उन कानूनों के बदले और अधिक प्रभावी कानून अस्तित्व में आ गए हैं अथवा कई ऐसे कानून भी हैं, जिनकी अब प्रासंगिकता ही नहीं रही। बानगी के तौर पर एक कानून है- 'द मद्रास लाइव स्टोक इंप्रूवमेंट एक्ट 1940'। इसके मुताबिक कोई बछड़ा आगे चलकर सांड बनेगा या बैल, यह सरकार तय करेगी। सांड अथवा बैल का लाइसेंस उसी के मुताबिक जारी होगा। सांड का तो लाइसेंस सरकार इस आधार पर रद्द कर सकती है कि उस प्रजाति के बछड़ों व बछियों की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसा ही एक और कानून है, जो सौ साल पुराना है। 'पंजाब मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एक्ट 1916'। इस कानून के तहत सेना परिवहन के मकसद से दिल्ली के लोगों के जानवर, वाहन, नाव व अन्य को कब्जे में ले सकती है। बदलते वक्त के साथ क्या अब सेना को दिल्ली के जानवरों की जरूरत है, यह अपने आप में शायद सभी को हास्यास्पद लगेगा। अब तो दिल्ली में तांगे भी नहीं चलते, जानवरों की सवारी तो दूर की बात है।

दिल्ली में एक ही मामले में दो-दो कानून भी लागू हैं। 'दिल्ली प्रोहिबिशन ऑफ स्मोकिंग एंड नॉन स्मोकर्स हेल्थ प्रोटेक्शन एक 1996'। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करना प्रतिबंधित हैं। इसके साथ ही इसके विज्ञापन एवं बच्चों द्वारा तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर जुर्माने का प्रावधान है। यह कानून अब भी बावजूद इसके वजूद में है कि 'द सिगरेट एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट 2003' भी लागू है जिसमें 1996 के एक्ट के समस्त प्रावधान समाहित है और नया कानून अधिक ताकतवर भी है। इसी तरह दिल्ली सरकार ने सबसे पहले 2001 में सूचना का अधिकार कानून लागू किया था। 2005 में केंद्र द्वारा बनाया गया सूचना का अधिकार संबंधी कानून अधिक प्रभावशाली एवं प्रचलन में है, लेकिन दिल्ली में ये दोनों कानून एक साथ अस्तित्व में हैं। बच्चों को मुफ्त शिक्षा संबंधी दो दो कानून हैं। 'दिल्ली प्राइमरी एजुकेशन एक्ट 1960' जिसके तहत छह साल से चौदह साल के बच्चे को मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। यह कानून अभी खत्म नहीं हुआ है और उसके साथ-साथ अधिक व्यापक और ताकत वाला कानून 'बाल अधिकार 2009' भी अस्तित्व में है।

केंद्र सरकार हो अथवा दिल्ली सरकार, सरकारी कामकाज का सरलीकरण की दिशा में प्रयास भी कर रही है, तमाम बदलाव भी किए जा रहे हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार को उन कानूनों की समीक्षा भी करनी जरूरी है, जिन कानूनों का अब मतलब नहीं रह गया है अथवा नए व अधिक प्रभावी कानून अस्तीत्व में आ गए हैं। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने कानूनविदों के साथ व्यापक विचार-विमर्श व शोध के बाद ऐसे 30 कानूनों की सूची तैयार की है और उसे दिल्ली सरकार को सौंपी है, जिनका अब भी अस्तित्व में रहना हास्यास्पद लगता है अथवा सरकारी उदासीनता को प्रमाणित करता है। हालांकि इन 30 कानूनों के बने रहने पर भी व्यवस्था पर शायद फर्क न पड़ता हो, लेकिन कानून तो अस्तित्व में वही होने चाहिए, जिनकी प्रासंगिकता हो और जरूरत भी। गैर-जरूरी कानून कहीं न कहीं समूची व्यवस्था के लिए बोझ ही हैं। ऐसे बोझ अतीत के आइने में तो सुंदर दिखते हैं पर वर्तमान में तो व्यवस्था के लिए तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

 

- रत्नेश मिश्रा
साभारः राष्ट्रीय सहारा

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