ज्यादा कानून से भी आता है कुशासन

भारत की आर्थिक विकास दर 9 फीसदी सालाना से घटकर 4.5 फीसदी हो जाने की एक बड़ी वजह यह है कि इन्क्लूसिव ग्रोथ के नाम पर न्यायपालिका और विधायिका ने पूरी तरह जायज कारोबार को भी बेहद मुश्किल बना दिया है। अभी एक नई कोयला खदान शुरू करने में 12 साल लग जाते हैं। यह इन्क्लूसिव ग्रोथ नहीं है। इसे ठहराव या गतिहीनता कहते हैं। नए भूमि अधिग्रहण कानून का मकसद है किसानों से जल्दी और विधिसम्मत तरीके से जमीन लेना।
 
लेकिन औद्योगिक नीति और उत्पादन विभाग के सचिव का कहना है कि इस कानून ने सड़क, बंदरगाह और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों के लिए भूमि का अधिग्रहण लगभग नामुमकिन बना दिया है। ऊंचा मुआवजा अच्छी बात है, लेकिन इस कानून के तहत हर प्रोजेक्ट के सामाजिक प्रभाव आकलन करना भी जरूरी है। एक्सपर्ट ग्रुप की मंजूरी इसके बाद ही मिलेगी। और यह काम हो जाने के बाद प्रभावित व्यक्तियों में से 80 फीसदी लोगों की सहमति भी लेनी होगी। इस तरह त्वरित और न्यायसंगत कार्रवाई के बदले हमने विलंब और अनिश्चितता को अपना लिया है।
 
कंपनियां चलीं विदेश
नई दवाओं के परीक्षण के क्षेत्र में भारत विश्व स्तर पर एक अहम मुकाम हासिल कर चुका है। लेकिन कुछ कंपनियों द्वारा तरह-तरह की गड़बड़ियां (जैसे मरीजों को संभावित खतरों के बारे में जानकारी न देना, उन्हें बीमा कवर या मुआवजा न देना आदि) करने की शिकायतें काफी बढ़ गई हैं। इसका सीधा जवाब यह है कि दोषियों की पहचान कर उन्हें जेल भेजा जाए। लेकिन भारत में अदालतें फैसला सुनाने में अंतहीन समय लगा देती हैं। इसलिए गलती करने वालों को अदालती फैसलों का डर नहीं होता।
 
त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की कोशिशों के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने क्लिनिकल ट्रायल के लिए नई और लंबी प्रक्रिया निर्धारित कर दी। इससे वैध गतिविधियां भी अब ज्यादा खर्चीली और ज्यादा समय साध्य हो गई हैं। टीका बनाने वाली टॉप ग्लोबल कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को रोटावायरस टीके के फेज 3 ट्रायल की मंजूरी लेने में एक साल से ज्यादा समय लग गया। तंग आकर कंपनी ने रोटा वायरस ही नहीं, डेंगू के टीके का भी क्लिनिकल ट्रायल किसी और देश में कराने का फैसला कर लिया है।
 
लौह अयस्क और कोयले का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा भंडार होने के बावजूद भारत ने इन दोनों चीजों का आयात शुरू किया है। कोर्ट ने कुछ राज्यों में लौह अयस्क की खुदाई पर बैन लगा दिया है, जबकि ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार की अदालती जांच के दौरान कोयले की ताजा खुदाई पर रोक लगा दी गई है। अब, अवैध खुदाई पर तो रोक जरूर लगनी चाहिए, लेकिन सही तरीका यह है कि दोषियों की पहचान कर उन्हें दंडित किया जाए ,न कि सभी वैध गतिविधियों पर रोक लगा दी जाए। अवैध खुदाई करने वाले किसी भी शख्स को अंतिम तौर पर दोषी साबित नहीं किया जा सका है, लेकिन बहुत सारे वैध खुदाई करने वालों को जबरदस्त घाटा उठाना पड़ा है।
 
नदियों से गैरकानूनी ढंग से रेत निकालना भी एक आम बात है। किसी भी तरह के निर्माण के लिए कंक्रीट बनाने में इसकी जरूरी होती है। लेकिन अदालतों ने लगातार कड़े फैसले देते हुए पर्यावरणीय आधारों पर नदी से रेत निकालना बंद करवा दिया। इससे रेत की जबरदस्त किल्लत हो गई। कई राज्यों में तो यह 1800 रुपए प्रति टन बिकने लगा, जो कुछ साल पहले तक कोयले का भाव था। अदालत की फटकार और कार्रवाई के डर से कई कलेक्टरों ने नया रेत लाइसेंस जारी न करने और खत्म होने वाले लाइसेंसों का नवीनीकरण न करने का सुरक्षित रास्ता चुन लिया है।
अवैध खुदाई पर लोगों के गुस्से को देखते हुए ग्रीन ट्राइब्यूनल ने रेत के छोटे से छोटे हिस्से के लिए भी पर्यावरण संबंधी मंजूरी आवश्यक बना दी है, जिसका मतलब है और देरी। क्या इन सबसे अवैध खुदाई पर अंकुश लगता है? जी नहीं। उलटे, इससे लीगल माइनिंग और मुश्किल हो जाती है और रेत माफिया पर निर्भरता बढ़ जाती है।
 
अदालतों की जवाबदेही
अदालतों का काम नीतियां तैयार करना नहीं, सिर्फ यह देखना है कि काम कानून के मुताबिक हो रहा है या नहीं। उत्पादन और सामाजिक सुरक्षा की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना मूलत: राजनीतिक कार्य है, जिसमें उनकी विशेषज्ञता नहीं है। खराब नीतियों के लिए राजनेता मतदाताओं के सामने जवाबदेह होते हैं। लेकिन प्रशासन को पंगु बनाने, ईमानदार कंपनियों का दीवाला निकालने और आर्थिक विकास को धीमा करके गरीबी बढ़ाने के लिए अदालतों की किसी के आगे कोई जवाबदेही नहीं होती।
 
इसीलिए कोर्ट का एक्टिविज्म कुछेक बेहद गंभीर मामलों तक ही सीमित रहना चाहिए। पुराना न्यायिक नुस्खा है कि भले ही कई अपराधी छूट जाएं, पर एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए। बावजूद इसके, जुडिशल एक्टिविज्म का शिकार ज्यादातर बेकसूर उद्यमी और ऑफिसर ही हो रहे हैं। भारत में कुशासन की जड़ में सिर्फ धूर्त राजनेता और उद्योगपति ही नहीं, अच्छी नीयत से बनाए गए बुरे कानून भी हैं। अदालतों में लंबे खिंचते मुकदमे हर क्षेत्र में कानून तोड़ने वालों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन इसका इलाज तीव्र न्याय है। यह नहीं है अदालतें खुद ही नीतियां बनाने में जुट जाएं। 
 
स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर
- साभारः नवभारत टाइम्स
स्वामीनाथन अय्यर

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